पहले मुफ्त उपहार का धंधा : फिर गले में फंदा

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रवीन्द्र वाजपेयी

बुजुर्ग बताते रहते हैं कि किस तरह अंग्रेजों के दौर में चाय कम्पनियां वाले मोहल्लों में घूम फिरकर चाय मुफ्त में बाँटकर उसका प्रचार किया करते थे। जब लोगों को उसका चस्का लगा तब वह ऊँचे दाम पर बाजार में बिकने लगी और आज आलम ये है कि ज्यादातर आम हिन्दुस्तानी बिना चाय के नहीं रह पाते। इस उदाहरण की प्रासंगिकता आज मोबाइल फोन पर बातचीत और इंटरनेट की दरों में अच्छी खासी वृद्धि के रूप में साबित हो गयी। हमारे देश में मोबाइल और इंटरनेट के दरें दुनिया में सबसे कम बताई जाती हैं। बीते कुछ सालों में खासकर मुकेश अम्बानी की कम्पनी जियो द्वारा शुरू की गयी धमाकेदार प्रतिस्पर्धा ने शेष टेलीकॉम कंपनियों की कमर तोड़कर रख दी। वे अरबों-खरबों के नुकसान में आ गईं। कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण फैसले के बाद कुछ कम्पनियों पर हजारों करोड़ रूपये की देनदारी निकल आई जिसके बाद उनके दिवालिया होने के आसार बढ़ गए और उस घाटे की पूर्ति के लिए उनके पास दाम बढ़ाने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं बचा था। कुछ दरियादिली सरकार की तरफ से भी दिखाई गयी जिसके बाद आज से दर्रों में वृद्धि का बोझ ग्राहकों पर पडऩे जा रहा है। जियो ने 6 दिसम्बर से दर बढ़ाने के संकेत दिए हैं। हालांकि उसी ने कुछ दिन पहले मोबाइल पर बातचीत के अलावा इंटरनेट के इस्तेमाल की दरें बढ़ाते हुए असीमित बात करने या डाटा उपयोग को सीमित करने की पहल की थी। वैसे जानकारों के अनुसार जियो ने ही टेलीकाम बाजार को खराब किया। अब चूंकि सभी कम्पनियां दरें बढ़ाने के रास्ते पर आगे बढ़ गईं हैं इसलिए अब हर ग्राहक का खर्च बढ़े बिना नहीं रहेगा। विपक्षी खेमे द्वारा इस वृद्धि को सरकार की शह बताई जा रही है। हो सकता है सरकार को अपनी वसूली करने के लिए टेलीकॉम कंपनियों की आर्थिक दशा सुधारने के लिए दरों में वृद्धि ही सबसे आसान तरीका समझ आया हो। और फिर बैंकों की मोटी रकम भी इन कंपनियों में फंसी है। अब रही बात उपभोक्ता के नज़रिये की तो उसे ये वृद्धि नागवार लगना स्वाभाविक है क्योंकि टेलीकॉम कम्पनियों ने अंग्रेजों के ज़माने में मुफ्त चाय पिलाने वाली शैली का उपयोग करते हुए ही ऐसे ग्राहकों को भी मोबाइल पर बतियाने और इंटरनेट के उपयोग हेतु उकसाया जिन्हें निजी अथवा व्यवसायिक तौर पर इसकी उतनी जरूरत नहीं थी। अनेक अध्ययनों और सर्वेक्षणों में ये बात सामने आई है कि अधिकांश भारतीय मोबाइल उपभोक्ता बिना आवश्यकता के उसका उपयोग करते हैं। विशेष रूप से किशोर और युवावस्था के ग्राहकों द्वारा मोबाइल फोन और इंटरनेट का जिस तरह बेताहाशा इस्तेमाल किया जाता है वह समय की बर्बादी के अलावा अनेक ऐसी समस्याओं और बुराइयों को जन्म दे रहा है जिन्हें लेकर समाज में चिंता का माहौल है। संचार सुविधाओं के विकास में मोबाइल फोन ने चमत्कारिक परिणाम दिए। भारत जैसे गरीब और विकासशील समझे जाने वाले देश में दुनिया के सबसे ज्यादा मोबाइल उपभोक्ता होना अपने आप में उल्लेखनीय है। इसके बाद जबसे मोबाइल पर इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध हुई तबसे तो वह विलासिता की बजाय एक अनिवार्यता माना जाने लगा। इंटरनेट के जरिये प्राप्त होने वाली जानकारी के साथ ही वह सूचनातंत्र और उससे भी बढ़कर मनोरंजन का साधन बन गया। सोशल मीडिया के आने के बाद से तो मोबाइल का उपयोग बहुआयामी बन गया। प्रधानमन्त्री से लेकर सामान्यजन तक इसका उपयोग कर रहे हैं। राजनेता, फिल्मी अभिनेता, साहित्यकार, पत्रकार और सभी आयु वर्ग के सामान्य लोग भी सोशल मीडिया से जुड़े हैं। ये राजनीतिक और सामाजिक बहस का सबसे आसान मंच जो बन गया है। लेकिन इसका खतरनाक पहलू ये है कि इसके माध्यम से सहज रूप से उपलब्ध होने वाली आपत्तिजनक सामग्री से कम उम्र के लड़के- लड़कियों की मानसिकता पर जो बुरा असर पड़ रहा है वह सांस्कृतिक प्रदूषण के तौर पर सामने आया है। बीते कुछ वर्षों के दौरान यौन अपराधों में किशोर पीढ़ी की बढ़ती लिप्तता के लिए मोबाइल के माध्यम से उपलब्ध उस सामग्री को दोषी माना जा रहा है जो भारतीय परिवेश में निषिद्ध मानी जाती है। लेकिन मोबाइल के उपयोग को व्यापक रूप देने में सस्ती दरें ही जिम्मेदार कहीं जायेंगीं। स्मार्ट फोन आने के बाद से मोबाइल की उपयोगिता वार्तालाप के साथ इंटरनेट के उपयोग में भी बढ़ गई। ऐसा लगता है टेलीकॉम कंपनियों को भी ये उम्मीद नहीं रही होगी कि करोड़ों लोगों के गरीब और अशिक्षित होने के बावजूद शायद स्मार्ट फोन का उपयोग इतना अधिक हो सकेगा। लेकिन पूरी दुनिया ये देखकर अचम्भित रह गई कि रिक्शा और ठेले वाले तक मोबाइल फोन ही नहीं बल्कि डाटा का उपयोग भी करने लगे। ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए टेलीकॉम कंपनियों ने आकर्षक ऑफर भी दे दिए। लेकिन गलाकाट प्रतिस्पर्धा के साथ ही सरकारी नीतियों में दृढ़ता का अभाव होने से टेलीकॉम कम्पनियां घाटे में आ गईं। इसके लिए जियो को भी दोषी ठहराया जा रहा है। मोदी सरकार को मुकेश अम्बानी पर विशेष मेहरबानी के लिए कठघरे में खड़ा किया जाता है। बहरहाल आज से होने जा रही दर वृद्धि के औचित्य पर बहस के बावजूद ये ग्राहकों के अनुशासन से जुड़ा विषय भी है। मोबाइल फोन की उपयोगिता से कोई इंकार नहीं कर सकता लेकिन उसका अनावश्यक उपयोग निश्चित रूप से विचारणीय है। विशेष रूप से किशोर और युवाओं में इसे लेकर जो अति उत्साह है उस पर नियंत्रण करना जरूरी लगता है। वैसे टेलीकॉम कंपनियों की व्यवसायिक नीतियों को लेकर भी सरकार को सख्त रवैया अपनाना चाहिए। पहले ग्राहकों को लालच देकर मोहपाश में फंसाना और फिर उनका शोषण करने के गोरखधंधे पर लगाम लगना जरूरी है। मुक्त अर्थव्यवस्था के अपने लाभ हैं लेकिन वह उन्मुक्त न हो जाए इसका ध्यान रखा जाना भी जरूरी है।