रोटी और बोटी के साथी प्याज का यूं‍ फिर रूठ जाना…

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अजय बोकिल

इस देश में सियासत और सब्जी के बीच कोई डायरेक्ट कनेक्शन है तो वह प्याज है। सत्ता की उठापटक, बेटियों के साथ बेखौफ बलात्कार और आर्थिक मंदी झटकों के बीच जो करंट अमीर से लेकर गरीब तक सबको लग रहा है, वह है प्याज संकट। ये संकट नया नहीं है, लेकिन जब भी आता है सुनामी की तरह आता है। आलम यह कि आज देश में प्याज के भाव पेट्रोल के दाम को भी पीछे छोड़ रहे हैं। मप्र के शहरों में प्याज 90 से 100 रू. किलो तक बिक रही है। होटलों में खाने के साथ मिलने वाली प्याज की मात्रा या तो सिकुड़ गई है या फिर बंद हो गई है। पार्टियों में प्याज को वीआईपी की तरह आम सलाद से अलग कर दिया गया है। प्याज की चोरी हो रही है और कुछ होटलों में तो प्याज से बनने वाले व्यंजनों पर बैन लगा दिया गया है। प्याज के मारे आम हिंदुस्तानी के चेहरे पर एक ही चिंता है कि दाल के साथ रोटी खाना मुश्किल पहले ही था, अब प्याज के साथ वह दूभर होती जा रही है। क्या खाएं, कैसे जीएं? मन में सवाल उठता है कि सरकारें जितनी चिंता सत्ता की करती है, उसका दस फीसदी भी प्याज की सुगम उपलब्धि की क्यों नहीं करती?
मानसून की बेवफाई की तरह हर तीन चार साल में प्याज का संकट शायद इस देश की नियति बन गया है। वरना प्याज जैसी आम आदमी की सब्जी का सुर्खियों में रहना मामूली बात नहीं है। वैसे भी इस देश में बीसियों तरह की सब्जियां उगाई और खाई जाती हैं। लेकिन प्याज के अलावा टमाटर और आलू ही ऐसी सब्जियां हैं, जिन्हें सब्जियों की दुनिया में वीआईपी स्टेटस हासिल है। कारण इन सब्जियों की व्यापक पैदावार और उपयोगिता। प्याज और लहसुन छूने भी न वाले चंद लोगों को दरकिनार करें तो प्याज पर वेज और नाॅन वेज वालों का समान अधिकार है। चाहें तो इसे शाका‍हारियों और मांसाहारियों के बीच ‘काॅमन मिनिमम प्रोग्राम’ भी कह सकते हैं। मतभेद अगर हैं भी तो प्याज कैसे खाई जाए, इस पर हैं। यानी ‍कि कच्ची खाना ज्यादा बेहतर है या पकाकर।
प्याज की व्यापक लोकप्रियता के पीछे कारण दुर्गंध के बावजूद इसका स्वाद और गुणता है। प्याज सिर्फ एक सब्जी ही नहीं औधीह य तत्वों से भरपूर कंद भी है। भारत में इसे ढाई हजार सालों से खाया जा रहा है। एक जानकारी के मुताबिक देश में प्रति 1 हजार पर 908 व्यक्ति प्याज के प्रेमी हैं। नाॅन वेज के 99 फीसदी आयटम प्याज के बिना नहीं बनते, लेकिन वेज में प्याज की अनिवार्यता का प्रमाण भी 50 परसेंट से ज्यादा है। फिर चाहे वह प्याज के भजिए या फिर प्याज की सब्जी ही क्यों न हो। प्याज खुद दवा तो है ही वह दारू का भी पुराना साथी है।
इन तमाम खूबियों के बावजूद अगर देश में फिर प्याज को लेकर हाहाकार मचा है तो इसके कुछ कारण हैं। आंकड़े बताते हैं कि हम दुनिया के दूसरे सबसे बड़े प्याज उत्पादक और चौथे सर्वाधिक प्याज निर्यातक देश हैं। भारत में पिछले साल 2 करोड़ 35 लाख टन प्याज पैदा हुआ। जबकिस देश में इसकी खपत केवल 1 करोड़ 40 लाख टन की थी। बाकी प्याज निर्यात होता है। ऐसे में प्याज के भाव पूरे साल लगभग एक से रहते हैं। घरों में भी वह खामोशी से आता और खपता रहता है। लेकिन प्याज की किल्लत इसलिए बेचैन किए जा रही है, क्योंकि इस साल लगातार बारिश से देश के ज्यादातर राज्यों में प्याज की फसल बर्बाद हो गई। प्याज का उत्पादन 26 फीसदी गिर गया। जबकि मांग वही बनी हुई है। परिणाम स्वरूप भंडारों और पुरानी प्याज के दाम आसमान छूने लगे और अब तो वह लोगों की पहुंच से भी दूर होते जा रहे हैं। उसे खरीदना और खाना अमीरी का लक्षण बनता जा रहा है।
राजनीतिक दृष्टि से प्याज की अहमियत यह है कि प्याज की किल्लत और महंगाई सरकारें तक बदल देती है। इस बार प्याज के संकट की आहट सितंबर में ही मिलने लगी थी। इसके बाद भी केन्द्र सरकार को जितनी गंभीरता से प्याज का इंतजाम करना चाहिए था, वैसा नहीं दिखा। हालांकि सरकार ने प्याज के निर्यात और जमाखोरी पर रोक लगा दी थी। साथ ही मोदी कैबिनेट ने 1 लाख 20 हजार प्याज आयात की मंजूरी भी दी। इसमें से मिस्र से आयात होने वाले 6 हजार 90 टन प्याज की आवक शुरू भी हो गई है। इसके अलावा एमएमटीसी 11 हजार टन प्याज तुर्की से मंगवा रहा है। प्याज अफगानिस्तान से भी आ रही है। लेकिन यह प्याज आम लोगों की थाली तक कब और किस भाव पहुंचेगी, यह स्पष्ट नहीं है।
बुनियादी सवाल यह है कि अमूमन प्याज को लेकर यह किल्लत और परेशानी क्यों होती है? इसके कई कारण हैं, जिन पर प्याज संकट के वक्त तो खूब चर्चा होती है, लेकिन जैसे ही मामला ठंडा पड़ा कि प्याज का मुद्दा फिर ड्राइंग रूम से किचन में कैद हो जाता है। इसकी बड़ी वजह तो देश में प्याज की पर्याप्त भंडारण व्यवस्था का न होना है। दूसरे, प्याज की कीमतें बाजार और चंद बड़े व्यापारियों के हिसाब से तय होती हैं। यानी पैदावार बंपर हुई तो किसानों को मिट्टी के मोल बेचना पड़ता है। यूं भारत सरकार करीब 13 हजार टन प्याज का बफर स्टॉक रखती है। लेकिन इसका बड़ा हिस्सा अक्सर समुचित रखरखाव न होने से सड़ जाता है। लेकिन हमारे इसको गंभीरता से नहीं लिया जाता। मानकर कि प्याज है तो सड़ेगी ही। क्योंकि प्याज को हम प्याज की निगाह से ही देखते हैं। फोड़ के खाया क्या और काट के खाया क्या।
बहरहाल, प्याज की असली कीमत तब पता चलती है, जब वह आम लोगों को रूलाने लगती है। हालांकि कुछ लोग प्याज को आंसू निकलवाने वाली सब्जी मानकर खारिज भी करते हैं। लेकिन प्याज का अनोखा स्वाद, रोटी से लेकर बोटी तक का साथ निभाने का उसका समभाव, तथा सबकी पहुंच में होने की उसकी वृत्ति प्याज को हर दिल अजीज बनाती है। आम आदमी के पास अच्छे या बुरे दिन को नापने का बेरोमीटर केवल प्याज ही है। अगर वो किफायती दाम में और आसानी से उपलब्ध है तो मानिए कि ‘अच्छे दिन’ का जुमला ठीक चाल चल रहा है। अगर प्याज का मिजाज नादुरूस्त है तो समझ लीजिए कि बुरे दिनो का आगाज हो चुका है। हास्य कवि अोम वर्मा की पंक्तियां हैं- लगी मूँछ पर दाल हो, रखा जेब में प्याज।
अच्छे दिन का मैं तभी, मानूँगा आगाज।