आइए आचार्य फिरोज का स्वागत करें

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-जयराम शुक्ल

कबीर ने धर्मों/ पंथों के ऊपर ग्यान और मनुजत्व की प्राणप्रतिष्ठा की। सत्य को भी आत्मा की तरह न तलवार से काटा जा सकता है और न ही अग्नि उसे जला सकती है। सत्य ही ईश्वर का प्रतिरूप है यह कबीर ने बताया। यह उनके विचारों की ही ताकत है कि वे आज भी कालजयी बने हुए हैं। कबीर को मुसलमान जुलाहे ने पाला लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा हिंदुओं ने माना, उनका अनुकरण किया।
कबीर की काशी में इनदिनों एक प्रदर्शन चल रहा है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र संस्कृत विभाग में एक मुसलमान आचार्य की नियुक्ति का विरोध कर रहे हैं। यह गनीमत है कि विरोध स्ववरूप ये छात्र ढोल मजीरे के साथ सुंदरकांड का पाठ कर रहे हैं, जेएनयू की संस्कृति से अलग।
जेएनयू की बिकनी, किसिंग, दारूबाजी की उच्छृंखल संस्कृति पर मैंने एक छोटी सी टीप क्या लिख दी देश भर के बाँई आँखवाले मुझपर पिल पड़े। आंदोलन कारियों पर जैसे वाटर केनिंग होती है ठीक वैसे ही मुझपर गालियों की बौछार हुई। वे छात्र दस रूपये की हास्टल फीस बढ़ाने के खिलाफ आंदोलनरत हैं।
देश का औसत आदमी अपने केजी पढ़ने वाले बच्चे की शिक्षा पर एक महीने में जितना खर्च करता है उतना जेएनयू के पीजी छात्रों की सालभर की फीस है। यदि वे छात्र जेएनयू की भाँति सभी शैक्षणिक संस्थानों के फीस की माँग करते तो समूचा देश उनके साथ होता। पर उनके आंदोलन का मकसद ये है भी नहीं। सरकार की रियायती सुविधा पर वे कश्मीर की आजादी और बस्तर के माओवादियों की फिकर पर विमर्श करते हैंं।
बहरहाल हम बीएचयू के छात्रों के आंदोलन की बात करते हैं। मैंने कुछ दृष्टांतों के साथ अपनी बात रखी कि यदि मुसलमान आचार्य आपकी देवभाषा पढ़े और पढ़ाए तो इसमें हर्ज ही क्या..? इतना पढ़ते ही काशी के कुछ पंडे फिलहाल मुझपर पिले पड़े हैं
यदि कोई दूसरे धर्म का व्यक्ति हमारे कर्मकांड, हमारी परंपरा, संस्कृति, भाषा को आत्मसात करता है तो हमें उसका स्वागत करना चाहिए, ऐसा मेरा मत है। क्योंकि मेरा दृढ़ विश्वास है कि- सभी धर्मों/पंथों के मूल में हमारा सनातन धर्म ही है। हम सर्वे भवंतु सुखिनः की कामना करते हैं। हम प्राणियों में सद्भावना और विश्व के कल्याण के कामना करने वाले लोग हैं।
अभी पिछले साल ही राजेश्वरानंद जी महाराज का निधन हुआ। वो मूलतः मुसलमान थे। पहले वो राजेश मोहम्मद रामायणी के नाम से सुमधुर रामकथा कहते थे। एक बार चित्रकूट के रामायण मेले में उनका प्रवचन सुना था। वे रामचरित के प्रभावी मीमांसक थे। उन्होंने अखाड़े में सन्यास की दीक्षा ली और यहीं राजेश्वरानंद सरस्वती का नाम पाया। संतजनों के बीच उनका बड़ा सम्मान था। मोरारी बापू उन्हें अनुजवत् मानते थे।
बीएचयू में एक मुसलमान प्रोफेसर (यदि चयन योग्यता के सभी मापदंडों के अनुसार ईमानदारी से हुआ है तो) हमारे कर्मकांड और देवभाषा संस्कृत को पढ़ाता है तो यह स्वागतयोग्य है, विश्वविद्यालय का संविधान अंतिम नहीं, यदि इसके पीछे कोई नस्त्य स्वार्थ और राजनीति नहीं है तो उसे समयकाल के अनुसार बनाना चाहिए। और फिर आचार्य फिरोज तो दूसरी से लेकर पीएचडी तक संस्कृति पढ़ते आए, जीते आए। कल उनके परिवार की पृष्ठभूमि के बारे में टीवी में देख रहा था। पिता रमजान हरिभजन के सिद्ध गायक हैं। रामकथा और भागवतों में कथाव्यासों के साथ जाते हैं। तिलक लगाने से भी परहेज नहीं। घर में गोशाला है, पहली रोटी गाय को खिलिते हैं। यदि ऐसे सांस्कृतिक परिवेश पर वे पले बढ़े हैं तो उनके नाम पर मत जाइए। कबीर ने ऐसे ही विवादों पर टीका की-
जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ग्यान।
मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो म्यान।।
हमारे देश में उदात्त परंपरा रही है। रघुपति सहाय ‘फिराक गोरखपुरी’ को उर्दू के लिए ग्यानपीठ मिला तो डा.एपीजे अब्दुल कलाम गीता के मर्मज्ञ थे। वे रुद्रवीणा बजाकर माँ शारदा का आराधन करते थे। स्वयं तुलसीदास ने भी ‘माँग के खाइबो मसीत में सोइबो, और वहीं प्रभु श्रीराम के भजनपूजन की बात की थी।
इसी बनारस में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब की शहनाई से बाबा विश्वनाथ की आराधना होती आई है। हमारे मैहर में उस्ताद अलाउद्दीन खान साहब को माँ शारदा का वरद्पुत्र माना जाता रहा है। वे नंगे पाँव सीढ़ियां चढ़कर माँ का पूजन करने जाते थे। उन्हीं के द्वारा आविष्कृत दुर्लभ वाद्ययंत्र सरोद को माँ का दिया उपहार मानते थे..।
एक बात और जानना चाहिए, केरल में आज भी सभी वर्गों के साथ मुसलमान बच्चे भी माँ सरस्वती और पाटीपूजा के कर्मकांड के बाद विद्यारंभ करते हैं।
काशी भूतभावन भगवान भोलेनाथ की नगरी है। शंकर जी वंचितों के ईश्वर हैं। भूत, प्रेत, अघोरी, चांडाल जिन्हें जग ने दुरदुराया उसे उन्होंने गले लगाया। साँप बिच्छू को लोक मारने दौड़े तो भोले ने उन्हें आभूषण बना लिया। भांग, धतूरे, मदार जैसे वनस्पतियों को इसलिए अपनाया जिससे इनके गुणों के कारण कहीं लोग नष्ट न कर दें। काशी उदात्तता की पराकाष्ठा का नाम है। काशी ने सबको शरण, गति, मति, सम्मति दी है।
देवभाषा संस्कृत विश्व की सर्वश्रेष्ठ भाषा है। यह युगों से भारतीय ग्यान परंपरा की संवाहक रही है। लेकिन इसे पंडितों की कर्मकांडीय भाषा बना दिया गया। धूर्तों ने श्लोक गढ़े कि शूद्र व स्त्री के कानों में वेद की ऋचाएं पहुँचें तो उनके कान में पिघला हुआ सीसा डाल देना चाहिए। संस्कृति को जड़ बना दिया। ऐसे ही कर्मकांडियों वही अब यह तर्क दे रहे हैं कि यदि म्लेक्ष देवभाषा संस्कृत पढ़ाएगा तो धर्म का नाश हो जाएगा। अरे धर्म का नाश तो वो कर रहे हैं जो इसे लौहकपाट में कैद करके रखना चाहते हैं।
अपने धर्म, संस्कृति, संस्कृत को गंगाजी की तरह अविरल बहने दीजिए। यहां तो नदी-नदों की क्या गंदे नाले भी आकर पवित्र हो जाते हैं। सनातन की इस उदात्तता को जड़ मत बनाइये। यदि वसुधैव कुटुम्बकम की बात करते हैं तो बाँहें फैलाकर सभी का स्वागत करिए।