जेएनयू : सभी विश्वविद्यालयों को एक नजर से देखा जावे

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-रवीन्द्र वाजपेयी

देश में सरकारी और निजी मिलाकर सैकड़ों विश्वविद्यालय हैं। इनमें कुछ अपनी गुणवत्ता के लिए विख्यात हैं तो कुछ अपनी अराजक व्यवस्था के लिए। लेकिन देश की राजधानी दिल्ली में स्थित जेएनयू (जवाहरलाल नेहरु यूनीवर्सिटी) उक्त दोनों मापदंडों पर खरी उतरती है। देश के अलावा विदेशों के छात्र भी वहां पढ़ते हैं। जेएनयू में अनेक ऐसे विषयों का अध्ययन और शोध होता है जो अपने आप में विशिष्ट हैं। इस संस्थान से निकले विद्यार्थी विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा से प्रभावित कर रहे हैं। अभी हाल ही में अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार प्राप्त अभिजीत बैनर्जी भी इसी विश्वविद्यालय की उपज हैं। सीपीएम नेता सीताराम येचुरी के अलावा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी यहां के छात्र रहे हैं। इनके अलावा देश के तमाम नामी पत्रकार , लेखक और दूसरी हस्तियां भी जेएनयू से पढ़कर निकलीं। यह एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय है। लेकिन इसकी चर्चा केवल उक्त कारणों से न होकर उसकी वामपंथी वैचारिक पहिचान के साथ ही परिसर के भीतर की जीवनशैली और सार्वजानिक आचरण को लेकर ज्यादा है। लम्बे समय तक इसमें वामपंथी रुझान वाले छात्र संगठनों का आधिपत्य रहा। शिक्षकों में भी अधिकतर वामपंथी सोच से प्रेरित रहे। लेकिन बीते कुछ सालों से भाजपा की छात्र इकाई कही जाने वाली अभाविप ने भी अपने पांव जमाये जिसके बाद परिसर के भीतर न केवल छात्र राजनीति बल्कि दूसरी बातों पर भी असर पड़ा। सबसे बड़ी चीज ये हुई कि वामपंथी विचारधारा का एकाधिकार खत्म हो गया और उनकी गतिविधियों का विरोध होने लगा। यहीं से बात बिगड़ी और जेएनयू एक राष्ट्रीय मुद्दा बनने लगा। बात केवल वामपंथ के प्रचार- प्रसार की रहती तब भी ठीक था किंतु जब अफजल गुरु की फांसी का विरोध होने के साथ कश्मीर की आजादी और भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारे गूंजने लगे तब जेएनयू को लेकर चिंता का माहौल देश भर में बना। कन्हैया कुमार को लेकर हुआ विवाद सर्वविदित है। संस्थान के छात्रावास के भीतर उन्मुक्त और वर्जनाहीन व्यवहार की खबरें भी आया करती थीं । पास की पहाड़ी पर शराब की बोतलें तथा दूसरी ऐसी वस्तुएं मिलने से भी यह संस्थान बदनामी के कगार पर जा पहुंचा जो भारतीय परिवेश में अनपेक्षित होने के साथ ही आपत्तिजनक भी मानी जाती हैं। बहरहाल जेएनयू को लेकर चल रहे मौजूदा विवाद का कारण छात्रावास की फीस के साथ दूसरे शुल्क बढ़ाये जाने के अलावा कुछ प्रतिबंध लगाया जाना है। जिनकी वजह से छात्र-छात्राओं की उन्मुक्तता पर रोक लगने का रास्ता खुल जाता। छात्रों ने शुल्क में भारी-भरकम वृद्धि को लेकर हंगामा मचाया। कुलपति और कुछ शिक्षकों को कमरों में बंद करने जैसी बातें भी हुईं। जुलूस आदि भी निकले। पुलिस द्वारा पिटाई किये जाने की घटनाएं भी हुईं। समाचार माध्यमों से लेकर सड़क और संसद सभी जगह जेएनयू की चर्चा चल रही है। सोशल मीडिया तो यूँ भी ऐसे मुद्दों पर फ्रीस्टाइल कुश्ती का अखाड़ा बन जाता है। छात्रावास की फीस में अनाप-शनाप बढ़ोतरी को लेकर सभी की सहानुभूति छात्रों के साथ हुई लेकिन जब पता चला कि एक सीट वाले छात्रावास कमरे का शुल्क 20 रु. और दो सीट वाले का मात्र 10 रु. प्रतिमाह था और बाकी शुल्क भी नाममात्र के थे तब लोग चौंके। ये बात सही है कि 10 रु. को बढ़ाकर 300 रु. कर देना सर्वथा अनुचित था जिसे दबाव में आने के बाद कम भी किया गया लेकिन छात्र किसी भी तरह की वृद्धि का विरोध कर रहे हैं। उनके जुलूस पर हुए लाठीचार्ज के कारण उनके वैचारिक विरोधियों का एक वर्ग भी उनके प्रति हमदर्दी जता रहा है। ये तर्क भी दिया जा रहा है कि संस्थान में पढऩे वाले तकरीबन 40 फीसदी विद्यार्थी बेहद गरीब परिवारों के हैं जो अपनी बौद्धिक प्रतिभा के बल पर इस विश्वविद्यालय में प्रवेश पा सके। शुल्क में वृद्धि के कारण वे खर्च नहीं उठा सकेंगे जिससे उनका भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। इसके बाद बात देश भर में शिक्षा को सस्ती किये जाने की उठ खड़ी हुई। बाकी शिक्षण संस्थानों में भी शुल्क का ढांचा जेएनयू जैसा किये जाने की मांग भी उठने लगी। लेकिन पता चला है कि सस्ती शिक्षा का लाभ लेते हुए अनेक ऐसे छात्र भी इस संस्थान में मौजूद हैं जिनकी आयु 35 और 40 वर्ष से भी ज्यादा हो चुकी है। शोधार्थी के रूप में वे वहां समय बिता रहे हैं। दिल्ली जैसे शहर में 10 या 20 रूपये में रहने की जगह कल्पना में भी सम्भव नहीं है । जेएनयू में पुस्तकालय को रात भर खोले जाने , पुरुष छात्रावास में छात्राओं के प्रवेश और ऐसी ही बाकी बातों पर जब कुछ बंदिशें लगाई गईं तब छात्र आक्रोशित हो उठे। सबसे बड़ी बात ये है कि जेएनयू में चली आ रही किसी भी व्यवस्था में बदलाव को दक्षिणपंथ विरुद्ध वामपंथ बनाकर राजनीतिक स्वरूप दे दिया जाता है। वहां की स्वछंदता को आजादी के नाम पर संरक्षण देने का प्रयास भी चला करता है। एक शैक्षणिक संस्थान में हिन्दुओं के आराध्य देवी-देवताओं का अपमान खुले आम होता रहे और विरोध करने पर बवाल हो तो उसे वैचारिक स्वतंत्रता के नाम पर उचित कहना भी अनुचित है। सरे आम छात्र – छात्राएं चुम्बन करते हुए अपनी आजादी का प्रदर्शन करें ये किसी शैक्षणिक संस्थान में किस तरह सही है ये एक बड़ा सवाल है। जेएनयू में पढऩे वालों के लिए कोई समय-सीमा क्यों नहीं है ये भी बड़ा सवाल है। जो लोग छात्रों के आन्दोलन का समर्थन कर रहे हैं उन्हें उनकी उद्दंडता की निंदा भी करनी चाहिए। इस परिसर में वामपंथी सोच का प्रभाव भले रहे लेकिन स्वामी विवेकानंद की मूर्ति का अपमान किये जाने का दुस्साहस करने वालों को भी उनके किये का दंड मिलना चाहिए। एक महिला शिक्षक को कमरे में बंधक बनाकर रखना किस तरह का वामपंथ है ये समझ से परे है। जेएनयू के छात्र संगठन यदि शिक्षा को सस्ती किये जाने को लेकर देशव्यापी मुहिम छेड़ते तब शायद उन्हें सभी का समर्थन मिल सकता था। लेकिन अब तक के अनुभव ये बताते हैं अपनी गौरवशाली पृष्ठभूमि का बेजा फायदा उठाते हुए यहां के छात्र एक विशिष्ट तरह की श्रेष्ठता के भाव से पीडि़त हैं। विश्वविद्यालय स्तर के छात्र को राजनीति से सर्वथा दूर रखने वाली सोच तो ठीक नहीं लेकिन सरकारी खर्च से संचालित इस संस्थान को केवल एक विचारधारा विशेष के आधिपत्य में बनाये रखने की जिद भी एक तरह का सामन्तवाद ही है।