अकथ कहानी ,इंडियन काँफी हाऊस की.!

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जयराम शुक्ल

अपनी झील नगरी भोपाल विरोधाभासों का कंट्रास्ट लेकर जीती है। इसकी रंगीन झिलमिलाहट सिर्फ इश्तहारों में है। वास्तव में है ये ब्लैक एन्ड ह्वाइट। अब जैसे भोपाल के न्यू मार्केट वाले इंडियन काँफी हाउस को ही लें। उसके पीछे है एपेक्स बैंक, मध्यप्रदेश की सहकारिता का ध्वजवाहक। कैसा इत्तेफाक है की एक सहकारिता के आंदोलन के उत्कर्ष की कहानी कहता है तो दूसरा उसके अपकर्ष की।
बगल में समन्वय भवन है। कभी-कभी क्या अब तो प्रायः ही वहाँ से सहकारिता में बसी सियासत की सँडाध काँफी हाऊस की खिडकियों से आती रहती है। वहीं काँँफी टेबल पड़ा एक अखबार एपेक्स बैंक की सेहत की जानकारी देते हुए बताता है कि यह इतना बीमार है कि रिजर्व बैंक कभी भी इसे बंद करने का हुक्म सुना सकता हैं। इसके बीस हजार करोड़ डूबने के कगार पर हैं। इसकी जिले की शाखाएं घपले, घोटाले डूबत और खयानत के लिए सरनाम है।
इधर काँफी हाउस के वर्कर्स की कोपरेटिव सोसायटी है कि आज की तारीख में भारत की सबसे विश्वसनीय रेस्टोरेंट चैन्स में शुमार है। देशभर में 400 से ज्यादा काँफी हाउस और उनके कर्मचारियों के चेहरे की मुस्कान से सफल सहकार की कहानी बिना कहे ही बयान कर देती है।
एपेक्स के जर्जर बरगद की छाया में फूलफल रही सहकारिता की इस जीवंत पाठशाला से सरकारें शायद ही सबक लें,यह बात अलग है कि मुख्यमंत्री रहते हुए भी दिग्विजय सिंह यहां कभी भी अनायास हाजिर हो जाते थे और कुछेक बार शिवराज सिंह चौहान यहां के इडली दोसा का लुफ्त उठा चुके हैं।
मध्यप्रदेश का सहकारिता आंदोलन क्यों अधोगति को प्राप्त हुआ यह उसे हांकने, चलाने वाले जानें, अपन तो यहां इंडियन काँफी हाउस की बात करेंगे।
इससे अपना रिश्ता छात्र जीवन से है। जबलपुर के कामरेड एल एन मल्होत्रा, सदाशिवन नायर, दुर्गाशंकर शुक्ल ये तीन शख्शियतें थीं जिन्हें मध्यप्रदेश में काँफी हाऊस के सहकार को शिखर तक ले जाने का श्रेय है। इन्होंने इंडियन काँफी हाउस वर्कर्स कोपरेटिव सोसायटी जबलपुर की बुनियाद रखी।
आज पूरे देश में इस तरह की कोपरेटिव सोसायटीज को मिलाकर एक मजबूत राष्ट्रीय परिसंघ है जिसे नौकर नहीं मालिक मिलकर चलाते हैं क्योंकि हर कर्मचारी यहां शेयर होल्डर है।
मुद्दतों बाद मेरे प्रिय लेखक साहित्यकार और उससे बढ़कर अग्रज रामप्रकाश त्रिपाठी से यहीं भेंट हो गई।काँफी पीते हुए एक मित्र की नजर दीवार पर टँगी पंडित जवाहर लाल नेहरू की तस्वीर पर गई तो किस्सा चल निकला। त्रिपाठीजी ने कहा- काँफी हाऊस में नेहरू की फोटो की दिलचस्प कहानी है। मैनेजर के चैम्बर में कामरेड एके गोपालन दिख जाएंगे। ये सिर्फ़ यहीं भर नहीं,केरल में और कोलकाता में भी।
दरअसल हुआ ये था कि आजादी के बाद इंडियन काफी बोर्ड का नियंत्रण सरकार के हाथ आ गया। एक साल में ही एक करोड़ का घाटा। संसद में लगभग सहमति बन गई कि इस घाटे के सौदे को बंद किया जाए। एके गोपालन साहब कम्युनिस्ट पार्टी से संसद में थे। उन्होंने आपत्ति दर्ज की कि सरकार की बदइंतजामी कर्मचारी क्यों भुगतें। इसका प्रबंधन ठीक करिए। बस क्या था नेहरूजी ने कहा-मिस्टर गोपालन यह काम अब आप करेंगे। दो साल का वक्त है।
गोपालन साहब ने चुनौती स्वीकारी। काँफी बोर्ड को सुगठित किया। सभी कर्मचारियों को उसका अंशधारक बनाया। अनुशासन के कड़े नियम बने। आप देखेंगे कि काँफी हाउस के वेटर की पोषक ही काफी कुछ कहती है। उनकी पोषक में जेबें नहीं होती। टिप्स के लिए अलग बाक्स होता है यह रुपया कर्मचारियों के कल्याण कोष में जाता है।
जब सभी मालिक बने तो जुटकर काम किया। काँफी हाऊस का आकर्षण बढ़ा। यह बौद्धकों और शीर्ष राजनेताओं का प्रिय ठिकाना बन गया। काँफी हाऊस की आदत आज भी बहुतेरों में एडिक्शन की हद तक है।
पचास-साठ के दशक में काफी हाऊस की वो ख्याति थी कि जिस बौद्धिक ने यहां की काफी नहीं शिप की वह खुद को अधूरा मानता था।
दो साल पूरे हो गए। नेहरू को वो तारीख याद थी पर दिमाग में ये बात थी कि गोपालन जैसा राष्ट्रीय नेता भूल गया होगा। संसद में नेहरू ने गोपालन साहब को तारीख की याद दिलाई। उन्होंने कहा यश मिस्टर प्रायमिनिस्टर मैं न सिर्फ पूरी तैयारी से आया हूँ मेरे पास बोर्ड की बैलेंस शीट भी है।
गोपालन साहब ने बैलेंस शीट पटल पर रखी। देखकर नेहरू आश्चर्य चकित हो गए क्योंकि कि बैलेंसशीट में एक करोड़ का घाटा तो पट ही चुका था,लगभग दो करोड़ का मुनाफा भी हाथ में था। इसके बाद नेहरू ने गोपालन साहब को फ्रीहैंड दिया कि वे जैसा चाहें इसे चलाएं।
इस तरह 19 अगस्त 1957 इंडियन काँफी हाऊस वर्कर्स कोपरेटिव सोसाइटी अस्तित्व में आई और पहली इकाई बेंगलुरू में खुली। 27 दिसंबर को दूसरी इकाई दिल्ली में खुली। साहित्य और पत्रकारिता के साथ राजनीति में काँफी हाऊस इतना रचा बसा है कि प्रायः हर मूर्धन्य की आत्मकथा में कहीं न कहीं इसका जिक्र मिल जाएगा। लोग नेहरू और डा.लोहिया को कट्टर शत्रु की तरह देखते हैं जबकि ऐसी बात कभी रही ही नहीं। रामप्रकाश जी ने एक घटना बताई।
संसद की किसी डिबेट के बाद पं.नेहरू ने लोहिया को कहा तुमसे मिलकर बात करनी है। लोहिया ने स्वीकार करते हुए कहा यहीं काँफी हाऊस आ जाएं। नेहरू अचकचाते हुए बोले- अरे मैं प्रधानमंत्री.. काँफी हाउस कैसे आ सकता हूँ। लोहिया ने कहा- मुझे प्रधानमंत्री से मिलना भी नहीं मैं तो अपने गुरू जवाहरलाल का इंतजार कर रहा हूँ।
पंडित जी काँफी हाऊस गए। यह बात लोग भूल ही गए कि लोहिया नेहरू से प्रभावित होकर स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े और उन्हें अपना गुरू माना। दिल्ली, इलाहाबाद और जबलपुर के काँफी हाऊसेज से इतने किस्से जुड़े हैं कि सभी को संग्रहीत करके ग्रंथ रचा जाए तो उस किताब के पन्ने लाख तक पहुंच जाएं।
नीति से ही सबकुछ नहीं होता नियति ठीक होनी चाहिए। इस दृष्टि से इंडियन काँफी हाऊस सहकारिता के रोलमॉडल हैं। आज मेक इन इंडिया की बात चलती है।इंडियन काँफी हाउस भारतीय स्वाभिमान के प्रतीक हैं।
भारत में काँफी कहवा के रूप में 16वीं सदी से ही प्रचलित थी। चाय चीन से आई लेकिन काँफी शुद्ध भारतीय पेय है यहीं का खोजा व विकसित किया हुआ। अँग्रजों ने इसे ग्लोरीफाई किया काँफी हाऊस खोलकर।
पहले पहल काँफी हाऊस कोलकाता और चेन्नई में खुले। उन्हीं के बाहर यह बोर्ड टँगा कि इंडियन आर नाट एलाउड..। इसके प्रतिरोध में 1936 में पहली बार इंडियन काँफी हाउस का विचार आया। मेक इन इंडिया और स्वदेशी स्वाभिमान का यदि कोई सच्चा हकदार है तो वो है..यही अपना इंडियन काँफी हाऊस..सफल सहकार का श्रेष्ठ प्रकल्प।