चेतिए ! जब्बार भाई को तो मधुमेह ले गया

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राकेश दुबे

जब्बार भाई चले गये, ये सब लिख चुके, पर जब्बार भाई क्यों गये किसी ने नही लिखा ? उनके जिन्दा रहते और उनके जाने के बाद मदद के लिए अपील करते लोग है, सारे लोग जानें | वे मधुमेह के वजह से इतनी जल्दी गये | उन्हें गेंगारीन हो गया था |निश्चित ही यह भारत जैसे देश के लिए दुर्भाग्य है कि आयुर्वेद के जनक भारत में आयुर्वेद ने वर्षों से राजरोग कहे जाने मधुमेह के निवारण की दिश में कोई परिणाम जनक शोध नहीं हुआ है |यह बात किसी दुर्भाग्य से कम नहीं है कि देश में एक ओर जनसंख्या में वृद्धि हो रही है और डायबिटीज (मधुमेह) का शिकार होने की उम्र लगातार घट रही है| इससे ज्यादा गंभीर बात यह है मधुमेह की जद में बच्चे आ रहे हैं | स्वास्थ्य मंत्रालय, यूनिसेफ व पॉपुलेशन काउंसिल द्वारा जारी राष्ट्रीय पोषण सर्वे के अनुसार, १० प्रतिशत बच्चों और किशोरों के खून में सुगर की मात्रा सामान्य से अधिक है| जब बचपन की स्थिति यह है तो आज से २० साल आगे का सपना बहुत डरावना है |
चिकित्सक इसे अलग-अलग दो वर्गों में बांटते हैं | इसका निर्धारण रक्त में मौजूद शर्करा की मात्र से किया जाता है | यह मात्रा टाइप-२ मधुमेह से कम होती है और खान-पान व जीवन-शैली में बदलाव लाकर कम की जा सकती है, लेकिन ऐसा नहीं करने पर मधुमेह होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है| विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, २०१६ में दुनिया में १६ लाख मौतों का सीधा कारण डायबिटीज था. भारत में फिलहाल सवा सात करोड़ वयस्क इससे ग्रस्त हैं और अधिक वजन व मोटापा से परेशान वयस्कों की संख्या १६.६० करोड़ है| सर्वे ने पहली बार यह रेखांकित किया है कि इस बीमारी के संकेत शुरुआती उम्र से ही मिलने लगते हैं| जानकारों ने इस तथ्य को एक गंभीर चेतावनी माना है, भारत में एक ओर जहां बड़ी संख्या में बच्चों को समुचित पोषण नहीं मिल पाता है, वहीं दूसरी ओर अनेक इलाकों में ज्यादा खान-पान की उपलब्धता भी एक समस्या है|
देश के कुछ राज्यों की जीवन शैली ही इस मामले में कुछ हद तक जिम्मेदार है | जैसे केरल, सिक्किम, मिजोरम, पश्चिम बंगाल और मणिपुर में २१ से ३२ प्रतिशत बच्चों-किशोरों में अधिक सुगर होने की शिकायत पायी गयी है| पांच से सात साल के१.३ , आठ से नौ साल के१.१ , १० से १४ साल के ०.७ तथा १५ से १९ साल के ०.५ प्रतिशत बच्चों को मधुमेह घेर चुका है|
देश में ये आंकड़े किसी से छिपे नहीं है, अब ठोस आंकड़े आ चुके हैं, तो स्थिति में सुधार और शोध के लिए तुरंत पहलकदमी होनी चाहिए| मधुमेह या शर्करा की मात्रा बढ़ने का संबंध पोषण से है, सो जन्म से पहले माता के स्वास्थ्य तथा बाद में माता और शिशु के पोषण पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए| जन्म के समय कम वजन के शिशुओं को वयस्क होने पर मधुमेह और हृदय रोग होने की बहुत अधिक आशंका होती है| सार्वजनिक कार्यक्रमों के अंतर्गत जो भोजन बच्चों को मिल रहा है, उसमें पर्याप्त पोषण को सुनिश्चित किया जाना चाहिए|
कितनी बड़ी बात है कि देश में पांच साल से कम आयु के कुपोषित बच्चों की संख्या ४.६० करोड़ है, जबकि मोटापे से ग्रस्त बच्चों की आबादी १.४४ करोड़ है| इन आंकड़ों से साफ इंगित होता है कि बच्चों में मोटापा. कुपोषण और सुगर की अधिकता की समस्या बेहद गंभीर हो चुकी है| यदि जल्दी ही इसकी रोकथाम के लिए कोशिश नहीं की गयी, तो कुछ सालों बाद मधुमेह हमारे विकास पर नकारात्मक असर डाल सकता है| इसके अलावा अन्य बीमारियों, गरीबी और प्रदूषित हवा व पानी की चुनौतियां भी हैं|
जब्बार भाई से पहले, हमारे वरिष्ठ पत्रकार साथी स्व. राज भारद्वाज भी ऐसे ही गये थे | उन्हें बचाने के लिए उनके एक पैर शरीर से अलग करना पड़ा था | हम सार्वजनिक जीवन में जीने वालों की कोई शैली होती कहाँ है | फिर भी कोशिश कीजिये खान-पान और व्यायाम जैसे तरीकों को जीवन में जोड़ें | इस कोशिश में माता-पिता और शिक्षकों के चिकित्सकों व स्वास्थ्यकर्मियों को जागरूक और प्रशिक्षित किया जाना चाहिए. सरकार, मीडिया और सामाजिक संगठनों के माध्यम से ऐसा किया जा सकता है| सरकार और चिकित्सा विज्ञानियों को हर निदान पद्धति में मधुमेह का समूल नाश हेतु शोध करना चाहिए |

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चेतिए ! जब्बार भाई को तो मधुमेह ले गया
जब्बार भाई चले गये, ये सब लिख चुके, पर जब्बार भाई क्यों गये किसी ने नही लिखा ? उनके जिन्दा रहते और उनके जाने के बाद मदद के लिए अपील करते लोग है, सारे लोग जानें | वे मधुमेह के वजह से इतनी जल्दी गये | उन्हें गेंगारीन हो गया था |निश्चित ही यह भारत जैसे देश के लिए दुर्भाग्य है कि आयुर्वेद के जनक भारत में आयुर्वेद ने वर्षों से राजरोग कहे जाने मधुमेह के निवारण की दिश में कोई परिणाम जनक शोध नहीं हुआ है |यह बात किसी दुर्भाग्य से कम नहीं है कि देश में एक ओर जनसंख्या में वृद्धि हो रही है और डायबिटीज (मधुमेह) का शिकार होने की उम्र लगातार घट रही है| इससे ज्यादा गंभीर बात यह है मधुमेह की जद में बच्चे आ रहे हैं | स्वास्थ्य मंत्रालय, यूनिसेफ व पॉपुलेशन काउंसिल द्वारा जारी राष्ट्रीय पोषण सर्वे के अनुसार, १० प्रतिशत बच्चों और किशोरों के खून में सुगर की मात्रा सामान्य से अधिक है| जब बचपन की स्थिति यह है तो आज से २० साल आगे का सपना बहुत डरावना है |
चिकित्सक इसे अलग-अलग दो वर्गों में बांटते हैं | इसका निर्धारण रक्त में मौजूद शर्करा की मात्र से किया जाता है | यह मात्रा टाइप-२ मधुमेह से कम होती है और खान-पान व जीवन-शैली में बदलाव लाकर कम की जा सकती है, लेकिन ऐसा नहीं करने पर मधुमेह होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है| विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, २०१६ में दुनिया में १६ लाख मौतों का सीधा कारण डायबिटीज था. भारत में फिलहाल सवा सात करोड़ वयस्क इससे ग्रस्त हैं और अधिक वजन व मोटापा से परेशान वयस्कों की संख्या १६.६० करोड़ है| सर्वे ने पहली बार यह रेखांकित किया है कि इस बीमारी के संकेत शुरुआती उम्र से ही मिलने लगते हैं| जानकारों ने इस तथ्य को एक गंभीर चेतावनी माना है, भारत में एक ओर जहां बड़ी संख्या में बच्चों को समुचित पोषण नहीं मिल पाता है, वहीं दूसरी ओर अनेक इलाकों में ज्यादा खान-पान की उपलब्धता भी एक समस्या है|
देश के कुछ राज्यों की जीवन शैली ही इस मामले में कुछ हद तक जिम्मेदार है | जैसे केरल, सिक्किम, मिजोरम, पश्चिम बंगाल और मणिपुर में २१ से ३२ प्रतिशत बच्चों-किशोरों में अधिक सुगर होने की शिकायत पायी गयी है| पांच से सात साल के१.३ , आठ से नौ साल के१.१ , १० से १४ साल के ०.७ तथा १५ से १९ साल के ०.५ प्रतिशत बच्चों को मधुमेह घेर चुका है|
देश में ये आंकड़े किसी से छिपे नहीं है, अब ठोस आंकड़े आ चुके हैं, तो स्थिति में सुधार और शोध के लिए तुरंत पहलकदमी होनी चाहिए| मधुमेह या शर्करा की मात्रा बढ़ने का संबंध पोषण से है, सो जन्म से पहले माता के स्वास्थ्य तथा बाद में माता और शिशु के पोषण पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए| जन्म के समय कम वजन के शिशुओं को वयस्क होने पर मधुमेह और हृदय रोग होने की बहुत अधिक आशंका होती है| सार्वजनिक कार्यक्रमों के अंतर्गत जो भोजन बच्चों को मिल रहा है, उसमें पर्याप्त पोषण को सुनिश्चित किया जाना चाहिए|
कितनी बड़ी बात है कि देश में पांच साल से कम आयु के कुपोषित बच्चों की संख्या ४.६० करोड़ है, जबकि मोटापे से ग्रस्त बच्चों की आबादी १.४४ करोड़ है| इन आंकड़ों से साफ इंगित होता है कि बच्चों में मोटापा. कुपोषण और सुगर की अधिकता की समस्या बेहद गंभीर हो चुकी है| यदि जल्दी ही इसकी रोकथाम के लिए कोशिश नहीं की गयी, तो कुछ सालों बाद मधुमेह हमारे विकास पर नकारात्मक असर डाल सकता है| इसके अलावा अन्य बीमारियों, गरीबी और प्रदूषित हवा व पानी की चुनौतियां भी हैं|
जब्बार भाई से पहले, हमारे वरिष्ठ पत्रकार साथी स्व. राज भारद्वाज भी ऐसे ही गये थे | उन्हें बचाने के लिए उनके एक पैर शरीर से अलग करना पड़ा था | हम सार्वजनिक जीवन में जीने वालों की कोई शैली होती कहाँ है | फिर भी कोशिश कीजिये खान-पान और व्यायाम जैसे तरीकों को जीवन में जोड़ें | इस कोशिश में माता-पिता और शिक्षकों के चिकित्सकों व स्वास्थ्यकर्मियों को जागरूक और प्रशिक्षित किया जाना चाहिए. सरकार, मीडिया और सामाजिक संगठनों के माध्यम से ऐसा किया जा सकता है| सरकार और चिकित्सा विज्ञानियों को हर निदान पद्धति में मधुमेह का समूल नाश हेतु शोध करना चाहिए |