राममंदिर: कोर्ट के फैसले पर परीक्षा में सफल हुआ भारत…

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राघवेंद्र सिंह

करीब चार सौ साल से विवादित अयोध्या राम जन्मभूमि का सर्वसम्मत फैसला और देश में अभूतपूर्व एकता के साथ शांति का वातावरण बता रहा है कि पूरा भारत सभी आशंकाओं को गलत साबित कर नया इंडिया के रास्ते पर चल पड़ा है। पूरी दुनिया राम मंदिर के मुद्दे पर फैसले पर टकटकी लगाए थी और उसके बाद क्या होगा इस पर सबको धुकधुकी लगी थी। भारत के नागरिकों ने बता दिया है कि देश धर्म जाति और क्षेत्र की राजनीति से ऊपर उठ रहा है। यह नए निर्माण की ऐसी चमक है जो अंधे को दिख रही है और नाद बहरे को भी सुनाई दे रहा है। कुल मिलाकर भारत सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर हुई परीक्षा में सौ में से सौ नंबर लाकर दुनिया के सामने सबसे आगे होंगे हिन्दुस्तानी की तर्ज पर सीना तान खड़ा हो गया है। जनता ने अपना काम पूरा किया और अब राम राज लाने की जिम्मेदारी राज्यों की सरकार और केन्द्र की है। अब कोई बहाना चलेगा ऐसा लगता नहीं है।
देश में 130 करोड़ से ज्यादा की आबादी उसमें करीब एक अरब से ज्यादा सनातनी हिन्दू । सोचिए उनके आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम राम की जन्म भूमि को लेकर विवाद।आजादी के बाद सत्तर साल से जन्म स्थान को लेकर अदालत में मुकदमा। इस बीच संत समाज ने आंदोलन किया।भाजपा और उसके कर्ताधर्ता लालकृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर निर्माण के लिए रामरथ यात्रा निकाली। इसके बाद भाजपा,शिवसेना,विश्व हिन्दू परिषद आदि ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर बनाने के लिए आंदोलन किया। नतीजतन विवादित ढांचा ध्वस्त हुआ अनेक लोग गोलीबारी में मारे गए।इसके बाद भाजपा शासित उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की सरकार,मध्यप्रदेश में सुन्दरलाल पटवा और राजस्थान में भैरोंसिंह शेखावत के साथ हिमाचल की शांताकुमार सरकार को कानून व्यवस्था बिगड़ने के आरोप में केन्द्र की नरसिंहाराव सरकार ने बर्खास्त कर दिया था। हालांकि तब हिमाचल में शांति थी। इसमें ऐतिहासिक तथ्य ये है कि 1949 में 22-23 दिसंबर की रात जन्म स्थान पर रामलला की मूर्ति स्थापित कर दी गई थी इसकी जानकारी मिलते ही पंडित जवाहरलाल नेहरू की केन्द्र सरकार ने हिंसा न हो इसके लिए तत्कालीन कलेक्टर केके नायर को मूर्ति हटाने के निर्देश दिए थे लेकिन कलेक्टर ने कहा कि हटाने से हिंसा भड़क सकती है इसलिए उन्होंने मूर्ति नहीं हटाई । उन पर आरोप लगा कि मूर्ति रखवाने में 1930 बैच के आईसीएस अधिकारी नायर की भूमिका है। हालांकि बाद में नायर ने 1952 में विवादों के चलते स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली लेकिन तब तक वे हिन्दुओं के बीच बड़ा नाम बन चुके थे और उसके बाद उत्तर प्रदेश की बहराईच सीट से लोकसभा का चुनाव लड़े और जीते भी। उनकी लोकप्रियता का आलम ये था कि उनकी पत्नी शकुंतला नायर जनसंघ की टिकट पर केशरगंज से तीन बार लोकसभा का चुनाव जीतीं। इतना ही नहीं उनका ड्राईवर तक विधानसभा का चुनाव लड़कर विधानसभा पहुंचा।लंबी कहानी है लेकिन विवाद के चलते सरकार ने विवादित स्थल पर ताला लगा दिया। इसके बाद बहुत आंदोलन हुए। हिंसा हुई और अनगिनत लोगों की जानें गई और अरबों की संपत्ति नष्ट हुई।
रामजन्म भूमि ऐसा संवेदनशील मुद्दा बना कि जनसंघ,विश्वहिन्दू परिषद,भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना को छोड़ दूसरे राजनीतिक दल उस पर बोलने से भी परहेज करते थे। वजह थी अल्पसंख्यक वोट बैंक का उनसे नाराज होने का खतरा। बाद में अदालत के आदेश पर प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने राम जन्म भूमि का ताला खुलवाया और रामलला की पूजा शुरू हुई। इसके बाद की कहानी सबको पता है। रामशिलाएं भी निकली थीं। देशभर में उनका पूजन हुआ था। राम मंदिर सियासत के साथ हिन्दू मुसलमान में झगड़े की इतनी बड़ी वजह बन गया था कि सियासी दल इस पर बात करने से ही कतराते थे। ये था पुराने भारत का हाल। हालात बदले और कई घटनाक्रम के बीच सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व में पांच न्यायमूर्तियों की संविधान पीठ ने इस पर चालीस दिन की मैराथन सुनवाई शुरू की। इसके बाद 2.77 एकड़ रामजन्म भूमि पर मंदिर निर्माण का फैसला आया। हम इस वक्त बताना ये चाहते हैं कि एक अरब से ज्यादा सनातनी हिन्दू इस फैसले पर बेहद प्रसन्न हुए मगर उन्होंने अपनी खुशी का इजहार किसी भी तरीके से इसलिए नहीं किया कि कहीं इससे विवाद के दूसरे पक्ष की भावनाएं आहत और उत्तेजित न हों। हिन्दूओं में राम का स्थान वैसा ही है जैसे इस्लाम में पैगम्बर का। राम को अल्लामा इकबाल ने इमामे हिन्द भी कहा है। इकबाल ने कहा है – है राम के वुजूद पे हिन्दोस्तां को नाज,
अहले नजर समझते हैं उसको इमाम ए हिन्द।
लेकिन राजनीति ने मुसलमानों से राम का इमाम ए हिन्द होने का दर्जा भी एक तरह से छीन लिया था। मगर 9 नवंबर 2019 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हिन्दू और मुसलमानों ने जिस तरह से सद्भाव,सौहाद्र और एकता का परिचय दिया है वह नया इंडिया के बनने की एक मिसाल है। दरअसल पूरी दुनिया इस बात पर नजर लगाए थी कि राम मंदिर विवाद पर फैसले के बाद भारत में शांति रहेगी या बवाल होगा। लगभग 36 घंटे से ज्यादा का वक्त बीत गया है पूरे देश में एकता का उदाहरण हर घंटे मजबूत होता दिख रहा है। इसके पीछे एक वजह यह भी है कि देश के वाशिन्दे जाति धर्म के झगड़े से तंग आ चुके हैं।अब केवल जिस मसले पर लोग बेहद संजीदा और चिन्तित हैं उनमें शिक्षा सेहत सड़क और रोजगार सबसे खास हैं। इसलिए सूबे से लेकर दिल्ली की हुकूमत तक सबको जनता ने साफ संदेश दे दिया है कि हम सब एक हैं। अब आपका जिम्मा है नई पीढ़ी को बेहतर पढ़ाई कराने का और उन्हें कारोबार से लगाने का। इस पूरे मामले में जनता पूरी तरह से परीक्षा पास कर गई है। अब सरकारें कसौटी पर हैं। पूरे मुद्दे पर भारत की जय-जय।
कमलनाथ सरकार को बधाई…
राम मंदिर पर फैसले के साथ मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार पर कानून व्यवस्था बनाए रखने का अहम जिम्मा था। विदेश यात्रा पर रहने और वहां से लौटने पर कमलनाथ और उनकी टीम ने जो काम किया उससे निसंदेह प्रदेश को मिला शांति के टापू का तमगा बरकरार रहा। इसके लिए मुख्य सचिव एसआर मोहंती, डीजीपी वीके सिंह से लेकर जिलों के कलेक्टर-एसपी,शांति सद्भाव के लिए बनी कमेटियां बधाई की पात्र हैं। खास तौर से साम्प्रदायिक हिंसा के लिए बदनाम रहे भोपाल में शांति बनाए रखने में कमिश्नर कल्पना श्रीवास्तव कलेक्टर तरुण पिथोरे,डीआईजी इरशाद वली और उनकी टीम खासतौर से सीएसपी टीआई से लेकर कांस्टेबल तक प्रशंसा के हकदार हैं। मगर खतरा अभी टला नहीं है। लिहाजा आने वाले सप्ताह चौबीसों घंटे सतर्क रहने की जरूरत बताते हैं।