फैसले ने संविधान के समदर्शी रूप की प्राणप्रतिष्ठा की

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जयराम शुक्ल
भारतीय संविधान सिर्फ ग्रंथरूप में ही समदर्शी, सर्वस्पर्शी नहीं है, व्यवहार रूप में भी है। रामजन्मभूमि प्रकरण पर शनिवार को सर्वोच्च न्यायालय के पाँच न्यायाधीशों की न्यायपीठ के फैसले के बाद इस अवधारणा की प्राणप्रतिष्ठा हो गई। न्यायपीठ में एक इस्लाम मतालंबी न्यायाधीश थे। फैसला सर्वसम्मति से आया। यह फैसला इतना संयत, तर्क व तथ्यपूर्ण है कि किसी के लिए भी किंतु-परंतु की गुंजाइश नहीं बनती।
एक हजार से भी ज्यादा पृष्ठों के फैसले में जो मोटी-मोटी प्रमुख बातें हैं वह मीडिया के माध्यम से हर जिग्यासु व्यक्ति तक पहुंच चुकी है। फैसले में किसी कोण से यह नहीं लगता कि यहां धार्मिक भावनाओं का प्रभाव है। पंच परमेश्वरों ने दृढ़ता से यह बात कही कि संविधान के समक्ष सभी बराबर हैं। न्यायपीठ ने भारतीयत पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की खुदाई से प्राप्त मंदिर व मूर्तियों के भग्नावशेषों के सबूत के ऊपर श्रद्धा, विश्वास, परंपरा और संस्कृति को आधार बनाते हुए अपना फैसला दिया है।
राम न सिर्फ भारतीय संस्कृति में अपितु विश्ववांंग्मय में प्रतिष्ठित हैं। रीवा के महाराज विश्वनाथ सिंह की नाट्यकृति ‘आनंद रघुनंदन’ में राम तत्कालीन समय में विश्वपूजित चरित्र हैं। हिंदी की इस प्रथम नाट्यकृति के एक दृश्य में रामदरबार में उपस्थित होकर, तुर्क, यवन, अँग्रेज, यहूदी और भी कई जाति धर्मों के प्रतिनिधि उनकी आरती उतारते हैं।महाकवि इकबाल ने भगवान राम के वजूद को स्वीकार करते हुए उन्हें इमामे हिंद कहा था। भगवान राम के चरित्र को धर्म-संप्रदाय के दायरे में बाँधा नहीं जा सकता।
न्यायपीठ ने डेढ़ सौ वर्ष के विवाद का पटाक्षेप कर दिया है। वैसे भी यह विवाद राजनीतिक ज्यादा था। अभी तक की खबर में इस फैसले को देश के 99.9 फीसद लोगों ने सम्मान के साथ स्वीकार किया है। आदर्श स्थिति तब बनेगी जब मस्जिद के लिए मिली सम्मानजनक जगह पर हिंदूभाई उसकी मीनार खड़ी करें और रामलला के मंदिर को सजाने वाले पत्थरों की नक्काशी मुस्लिम भाई करें।