बीएचयू में मुस्लिम प्रोफेसर की नियुक्ति संकीर्णतावादी सोच पर चोट है…

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अजय बोकिल

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भारत कभी हिंदू राष्ट्र बनेगा या नहीं, कहना मुश्किल है, लेकिन संकीर्णतावादी सोच से तो नहीं ही बनेगा यह तय है। मामला बनारस हिंदू ‍विश्वविद्यालय (जिसे आम तौर बीएचयू कहा जाता है) का है। वि‍वि के प्रतिष्ठित संस्कृत विद्या एवं धर्म विज्ञान संकाय ( एसवीडीवी) में एक मुस्लिम फिरोज खान की असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर ‍नियुक्ति का है। इस नियुक्ति के बाद संकाय के कुछ छात्रों ने नियुक्तियों में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए विवि के कुलपति के घर पर धरना दे दिया। उनकी मांग है कि फिरोज खान की नियुक्ति निरस्त की जाए। विरोध कर रहे छात्रों का कहना है ‍िक यह प्रदर्शन बीएचयू के संस्थापक मदन मोहन मालवीय के मूल्यों की रक्षा करने के लिए किया गया। एक छात्र पुनीत मिश्रा के अनुसार संस्कृत संकाय में लगे शिलापट्ट पर लिखा है कि जैन, बौद्ध और आर्य समाज से जुडे़ लोगों को छोड़कर कोई भी गैर हिंदू इस विभाग से नहीं जुड़ सकता। संकाय के एक और रिसर्च स्काॅलर शुभम तिवारी का आरोप है कि खान की नियुक्ति रिश्वत लेकर की गई है। ऐसी नियुक्तियों से छात्रों का भविष्य बर्बाद होगा।
इस बारे में विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया है कि एसवीडीवी में फिरोज खान की असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर नियुक्ति बीएचयू वाइस चांसलर की अध्यक्षता में एक पारदर्शी स्क्रीनिंग प्रक्रिया के जरिए की गई है। इसमे सर्वाधिक योग्य पाए गए उम्मीदवार को सर्वसम्मति से नियुक्त किया गया है। विवि ने यह भी कहा कि एसवीडीवी की स्थापना धर्म, जाति, संप्रदाय और लिंग के आधार पर बिना किसी भेदभाव के राष्ट्र निर्माण के उद्देश्य से सभी को समान अवसर दिए जाने से की गई थी। इसी संकाय के असिस्टेंट प्रोफेसर राम नारायण द्विवेदी ने नियुक्ति में गड़बड़ी के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि फिरोज खान का चयन नियमों के मुता‍िबक ही हुआ है। इसको लेकर प्रदर्शनकारी छात्रों द्वारा उत्पन्न की जा रही बाधा अनुचित है।
यहां दो बातें गौरतलब हैं। पहला तो चयन प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी और दूसरा संस्कृत संकाय में किसी मुस्लिम व्यक्ति की तैनाती। इसमें भी लगता है कि असली आपत्ति मुस्लिम व्यक्ति की नियुक्ति को लेकर है। जहां तक चयन प्रक्रिया का सवाल है तो विवि ने खुद कहा है कि सभी नियमों का पालन किया गया और जो प्रत्याशी सर्वोत्तम पाया गया, उसे नियुक्ति दी गई। जाहिर है कि फिरोजखान सभी माानकों पर योग्य पाए गए होंगे तभी उन्हें नियुक्ति मिली होगी। क्योंकि एक तो हिंदू संस्कृति का केन्द्र बीएचयू और उसमें भी बेहद पांरपरिक माने जाने वाले संस्कृत विद्या एवं धर्म विज्ञान संकाय में किसी मुस्लिम स्काॅलर को नियुक्ति देना अपने आप में जोखिम भरा है। यह काम बिना सोचे समझे तो नहीं ही किया गया होगा। हालांकि फिरोज खान की शैक्षणिक योग्यता कितनी है, यह स्पष्ट नहीं है फिर भी वे इकलौते योग्य प्रत्याशी पाए गए तो इसका अर्थ यही है कि वे सभी मानदंडो पर खरे उतरे होंगे।
बीएचयू के एसवीडीवी संकाय की स्थापना विवि के शुरूआती दौर में 1918 में हुई। इसके अंतर्गत 8 विभाग आते हैं और इन विभागों में 23 विषयों का अध्ययन- अध्यापन होता है। विवि की वेबसाइट के अनुसार इस संकाय में प्राचीन ग्रंथों का शब्दश: अध्ययन-अध्यापन प्राचीन पद्धति के अनुसार ही होता है। यह संकाय हर साल विश्व पंचांग का प्रकाशन भी करता है। लिहाजा ऐसे संकाय में किसी की भी नियुक्ति मायने रखती है। और फिर फिरोजखान की ‍तैनाती संकीर्णतावादी सोच पर भी गहरी चोट है।
जिन संकीर्णतावादियों को इस संकाय में मुस्लिम को अध्यापक बनाने पर आपत्ति है, उन्हें शायद पता ही नहीं है कि इस देश में कई मुसलमानों ने संस्कृत भाषा की दिल से सेवा की है। इसमें सबसे पहला नाम तो महाराष्ट्र के पंडित गुलाम मोहम्मद दस्तगीर बिराजदार का है। एक प्राचीन मुस्लिम दरगाह के मुतवल्ली रहे गुलाम साहब शान से खुद को ‘संस्कृत का गुलाम’ कहते थे। गुलाम साहब वेद पुराणों और उपनिषदों के ज्ञाता थे और संस्कृत में धाराप्रवाह बोलते थे। उनके परिवार में संस्कृत संभाषण आम बात थी। उन्होंने अपने बेटे-बेटियोi की विवाह पत्रिकाएं भी संस्कृत में ही छपवाई थी। संस्कृत के अलावा गुलाम साहब हिंदी, अरबी और अंग्रेजी के भी विद्वान थे। वे वर्षों तक महाराष्ट्र राज्य संस्कृत संगठन के मानद राजदूत रहे। काशी विश्व संस्कृत प्रतिष्ठान ने भी उन्हें अपना महासचिव नियुक्त किया था। उनकी बेटी गयासुन्निसा भी संस्कृत स्काॅलर हैं। इसी तरह ‍िमर्जापुर के जमींदार परिवार में जन्मी नाहीद आबिदी भी संस्कृत भाषा की विदुषी हैं। इसके लिए उन्हें भारत सरकार ने 2014 में पद्मश्री से विभूषित किया था। वे अभी भी काशी में संस्कृत पढ़ाती हैं। उन्होंने फारसी ग्रंथों का हिंदी व संस्कृत में अनुवाद किया है। यूपी के मलीहाबाद जिले के मिर्जागंज के पंडित सैयद हुसैन शास्त्री भी संस्कृत के विद्वान हैं। पं. सैयद शास्त्री का कहना है कि संस्कृत विश्व की सबसे सुंदर भाषा है। वो अपना ज्यादातर समय भगवद्गीता के अध्ययन में बिताते हैं। यह सूची और लंबी हो सकती है।
बताया जाता है ‍कि एसवीडीवी में जिन फिरोज खान की नियुक्ति की गई है, वे भी भगवदगीता के परम भक्त हैं तथा उनका विश्वास ब्राह्मणवाद में है। इसके बाद भी अगर इस व्यक्ति का विरोध किया जा रहा है तो यह निहायत नकारात्मक और संकीर्णतावादी सोच है। यदि कोई मुस्लिम संस्कृत को अपनाता है, उस पर अच्छा अधिकार रखता है तो इसकी भरपूर प्रशंसा और स्वागत किया जाना चाहिए। क्योंकि कोई भी भाषा अथवा ज्ञान की शाखा किसी धर्म विशेष की बपौती नहीं होती। हिंदुत्व का तो मूल स्वभाव ही सबको अपने भीतर समाहित कर लेना है। वहां विरोध करने वाले छात्रों का यह तर्क बेतुका है कि विवि के शिलालेख पर लिखा है ‍िक इस संकाय में कोई गैर हिंदू नहीं आ सकता। क्योंकि इसी बीएचयू की साइट पर इसके संस्थापक महामना ‍पंडित मदन मोहन मालवीय का यह वाक्य अंकित है कि भारत केवल हिन्दुओं का देश नहीं है बल्कि यह मुस्लिम, ईसाई और पारसियों का भी देश है। देश तभी विकास और शक्ति प्राप्त कर सकता है जब विभिन्न समुदाय के लोग परस्पर प्रेम और भाई चारे के साथ जीवन व्यतीत करेंगे। यह मेरी इच्छा और प्रार्थना है कि प्रकाश और जीवन का यह केन्द्र जो अस्तित्व में आ रहा है, वह ऐसे छात्र प्रदान करेगा जो अपने बौद्धिक रूप से संसार के दूसरे श्रेष्ठ छात्रों के बराबर होंगे, बल्कि एक श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करेंगे, अपने देश से प्यार करेंगे और परम पिता के प्रति ईमानदार रहेंगे।
अच्छी बात यह है कि विवि अपने फैसले पर अभी कायम है। शायद इसलिए कि विवि की कमान उन शिक्षाविद राकेश भटनागर के हाथों में हैं, जो पूर्व में जेएनयू में बायोटेक्नाॅलाजी के एचअोडी रहे हैं। जिनकी सोच संकुचित नहीं है। उम्मीद करें कि विवि अपने फैसले पर कायम रहेगा। क्योंकि इससे पूरे देश और दुनिया में भी सही संदेश जाएगा। यह विवि, संस्कृत और हिंदुत्व के लिए भी भला होगा। सवाल सिर्फ इतना है कि क्या विवि अपने निर्णय पर टिक पाएगा और क्या उसे टिकने दिया जाएगा?