नोटबंदी की जयंती या पुण्य तिथि…..?

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ज़हीर अंसारी
आज नोटबंदी की तीसरी सालगिरह है। अब इसे नोटबंदी की जयंती मानी जाए या नोटबंदी की पुण्य तिथि इस बात को लेकर बड़ा कंफ्यूजन बना हुआ है। सरकार ने कहा था नोटबंदी से ख़ुशहाली आएगी और अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होगी, इस हिसाब से सरकार ने नोटबंदी पर उत्सव से माहौल खड़ा किया था। ठीक वैसे ही जैसे वर्षों की मिन्नतों के बाद संतान प्राप्ति पर ख़ुशियाँ होती है। सरकार और उसके सभी समर्थक नोटबंदी के उत्सव में शामिल होकर फाग गा रहे थे। वहीं नोटबंदी विरोधी खेमा बिरहा गीत बजा रहे थे। सरकार की जिद्द के चलते नोटबंदी हो गई। फाग और बिरहा के बीच आम जनता सालों से गड़ी अपनी नक़दी निकालकर बैंकों के हवाले कर दिया। देखते ही देखते आकस्मिक समय के लिए घरों में रखी काली-सफ़ेद रक़म दनादन बाहर निकल आई थी। एक ही झटके में हज़ार- पाँच सौ नोट चलन से बाहर हो गए। इस दौरान क्या हुआ, किसने क्या कहा, क्या भरोसा दिया, इसे दोहराना उचित नहीं होगा क्योंकि वास्तविकता से सब वाक़िफ़ हैं।
हज़ार-पाँच सौ के नोटों के आकस्मिक देहावसान का लाभ यह हुआ है इन दोनों का पुनर्जन्म दो हज़ार नोट के रूप में हुआ। धकापेल यह नोट मार्केट में आया। जिसे देखो वही दो हज़ार के नोट चमकाता फिर रहा था। अब यही दो हज़ार का नोट दर्शनार्थ मिल नहीं रहा है। लगता है यह गुलाबी नोट आर्थिक सामर्थ्यवान लोगों की तिजोरी को सुशोभित कर रहा है।
सरकार के वायदे के मुताबिक़ नोटबंदी के बाद न तो अर्थव्यवस्था सुधरी और न ही सरकार के ख़ज़ाने में गुप्त काला धन आया, उलटे आर्थिक मंदी से कारोबार को जूझना पड़ रहा है। वहीं नोटों के अदला-बदली और छपाई में हज़ारों करोड़ रुपए स्वाहा हो गए।
ऐसी अवस्था में नोटबंदी की जयंती पर उन लोगों की भी बोलती बंद है जो इसकी तरफ़दारी करते थे। नोटबंदी विरोधी ज़रूर नोटबंदी की पुण्यतिथि पर भड़ास निकाल रहे हैं।