किसको कहेें मसीहा किस पर यकीं करें

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जयराम शुक्ल

आज डिहठोन के पर्व पर देश में पुष्यनक्षत्र सा कोई योग बन रहा है। एक कालाधन दिवस मना रहे है, तो दूजे धन का कालादिवस। एक दिन में दो-दो दिवस। एक कह रहे हैं कि हमने नोटबंदी करके कालेधन पर लगाम लगाई है। दूसरे कह रहे हैं आपने धन की नसबंदी करके आपदा बुलाई है।
ये एक नसबंदी के असर को भोग चुके हैं, सो उत्साहित थे कि धन की नसबंदी से भी जरूर कोई गुल खिलना चाहिए। विदेेश में धन जमा करने वाले टैक्सचोरों की सूची आए दिन आ रही है। इसमें दो इधर के हैं चार उधर के, बाकी बीचवाले, जो इधर के भी हैं और उधर के भी।
भ्रष्टाचार के खुलासे अब धमाकेदार समाचार नहीं रहे। खबर की शर्त के साथ ही कुछ नया जुड़ा है। अब ये सब नया कहां रहा। विकीलीक्स और पनामा पेपर्स लीक्स, पैराडाइज लीक्स हो चुके है। उनमें से कई भी कई नामाजादिकों के नाम थे। उनका कुछ नहीं बिगड़ा।
अलबत्ता पड़ोसी का जरूर बिगड़ गया। शरीफ की शराफत पनामा पेपर्स के साथ फुर्र से उड़ गई। वह बेचारा जेल में है और बल्लेबाज से बतोलेबाज बने इमरान तख्त-ए-ताऊस पर। अपने यहां तो सभी एक घाट के पानी पीने वाले हैं। क्योंकि राजनीति का संस्कारी डीएनए एक ही है। इसलिये लीक्स की जगह होल भी हो जाए तो भी कुछ होना जाना नहीं।
यहां मुख्यधारा की राजनीति सचमुच की गंगा की है। नदी,नाले,नर्दे,गटर कोई भी मिलें सब पवित्र हो जाते हैं। अभी-अभी सारदा वाले, टेलीकाम वाले सभी एक-एक आचमन करके पवित्र होते जा रहे हैं।
यहां भ्रष्टाचार के नाम पर भी भ्रष्टाचार होता है। पिछले चुनाव में भ्रष्टाचार और कालाधन मुद्दा था। जनता को लगा चलो इन्हें भी आजमा लें। ये बेइमानों को जेल भेजने और उनका धन जब्त करने की बात कर रहे हैं। ये आ भी गए। पर ये क्या कालाधन और भ्रष्टाचार पर झाडू मारने की बजाए सड़क पर झाडू लगाने लगे। ये तो मुनिसपल्टी का काम था।
कई साांसद, विधायक तो नियमित कचरा गाड़ी ही हांकने लगे। वे कहीं कार्यक्रम में जाते हैं तो आयोजक टायलेट क्लीनर, ब्रस और एसिड मंच पर ही सजा के रखते हैं। क्योंकि उन्हें मालुम है कि नेताजी बाढ़, सूखा, ओला, पाला में राहत, दफ्तरों के भ्रष्टाचार, पीडीएस के घोटालों की बजाय टायलेट के कीटाणु मारेंगे।
जैसे कि देश की एकमात्र समस्या टायलेट के कीटाणु ही हों। सँपोले तो शंकर जी के आभूषण अब भी हैं जो सत्ता के गलियारों में कारपोरेट की दलाली करते हैं। फिर विदेशों में रुपये जमा करके अगली टिकट पर चुनाव लड़ते हैं,जीतते हैं,मंत्री बनते हैं यही कानून बनाने में मशविरा भी करते हैं।
राजनीति में कई माल्या हैं। पता नहीं वो माल्या क्यों नहीं साध पाया। यहां माल्या से भी ज्यादा घांंघ कई हैं जो सत्तासुंंदरी को साधे हुए हैं। राजनीति भी कर रहे हैं और धंधा भी।
पहले राजनीति करने वाले अलग होते थे,धंधा करने वाले अलग। चुनावी चंदा भी कंबल ओढ़ के लेने जाते थे। अब सबकुछ गड्डमड्ड हो गया। धंधा करने वालों के हाथ में राजनीति आ गई और ये राजनीति करते हुए धंधा भी करने लगे।
कौन राजनीति का धंधा कर रहा है, कौन धंधे की राजनीति, विकीलीक्स, पनामा, पैराडाइज तीनोंं मिलकर भी पता नहीं लगा सकते। अपने शहर में खोजिए ऐसे कई मिल जाएंगे जो खोखे के दम पर टिकट लाए और फिर वही विधायक, सांसद मंत्री बन गए।
जब ये सब ऐसे ही गड्डमड्ड है तो भ्रष्टाचार शब्द को डिक्शनरी से हटा देना चाहिए। कोई गरीब अब न चुनाव लड़ता और लड़ भी गया तो जीतता नहीं।
1982 में इंदिरा गांधी ने बहादुरी के साथ स्वीकार किया था..कि भ्रष्टाचार एक वैश्विक प्रक्रिया है..इसे हटाना सरल नहीं। फिर चिदंबरम ने इसे यह कहते हुए दोहराया हां भारत भ्रष्ट है पर सबसे भ्रष्ट नहीं। फिर भी हम आगे बढ़ रहे हैं यकीन न हो तो ग्रोथ रेेेट देेेख लो।
भ्रष्टाचार की ऐसी ही प्राणप्रतिष्ठा होती जा रही है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि सरकार रामलाल की है कि मिठाईलाल की। इसीलिए हर चुनाव भ्रष्टाचार की दुहाई के साथ लड़ा जाता है और जीतने वाला उसी भ्रष्टाचार को खादपानी देने लगता है। वे लोग जो भ्रष्टाचार के आरोप में हराए और हटाए जाते हैं दोगुने वेग से नई सरकार के भ्रष्टाचार की बात करने लगते हैं।
अपने यहां सत्ता परिवर्तन नहीं अपितु दो समानांतर भ्रष्ट व्यवस्थाओं के बीच सत्ता का हस्तांतरण होता है। जनता बेचारी ऊपर-नीचे आने वाले झूले की भाँति एक-एक करके हर खटोलोंं को ताकती रह जाती है।
एक थे अन्नाजी पिछली सरकार की पूर्णाहुति के समय जनलोकपाल को लेकर प्रकट हो गए। देश की जनता में आशा जगी कि मलेट्री का यह रिटायर्ड बुड्ढा जरूर कुछ न कुछ गुल खिलाएगा। जोश ऐसा कि जंतर-मंतर में ही आ के लोकपाल के बिल का ड्राफ्ट तैय्यार करो और यहीं दस्तखत।
अन्ना के शो में कुछ ऐसे घुस आए जैसे गांव के मेलों में तिनपतिया वाले ठग। ठगों की दूकान जम गई। पीछे से ताली बजाने और भीड़ ढोने वाले आगे से सत्ता में आ गए। जब ये चुनाव में उतरे थे तब उनके वायदों के पुलिंदे में एक अन्ना का जनलोकपाल भी था। अब पुलिंदे के एजेंडे से जनलोकपाल इरेज हो गया। तिनपतिए वाले भी सत्ता मद में हैंं, ताली बजाने और भीड़ ढोने वाले भी।
जनलोकपाल जंतरमंतर में ही फटे पोस्टर की तरह आज भी फड़फड़ा रहा है। अन्ना बेचारा रालेगांव सिद्धि के किसानों के खेत का गन्ना गिन रहा।
राजनीति का प्रबल सिद्धांत है..जिसकी नजर उठी वह शख्स गुम हुआ। सो अन्ना गुम हो गए, कालाधन-कालाधन बर्राने वाले बाबा तेल बेचने लगे और देश के टाँपटेन उद्यमियों में शामिल होकर जा बैठे।
कौन बोले, कौन मुँह खोले? समाजवादी ..? वही लालू वही मुलायम जो भ्रष्टाचार की जाँचों की टनभर फाइल में दबे हैं। कम्युनिस्टी..? जिनके सिर पर अभी भी बरबाद हुआ सोवियत और साम्राज्यवादी में धर्मांतरित चीन का फितूर सवार है.। तो कौन काँग्रेसी.? वे काँग्रेसी जो बेइमानी और धूर्तता के मामले में आज भी भाजपाइयों के दोदूनीचार हैं।
तो कौन समाजसेवी…? वे सबके सब एक्टविस्टों में कनवर्ट हो गए और जिनके एनजीओ फोर्डफाउंडेशन, बिलगेट्स फाउन्डेशन की खैरात की लाइन में लगे हैं।
तो कौन युवा.? या तो वो दो पैसे की चाकरी की हाड़तोड़ मेहनत में जुटा है या फिर नशे में एंड्रॉयड के पोर्न में खोया है।
किसको कहें मसीहा किस पर यकीं करें,
दिखते थे जो मसीहा, मसीहा नहीं रहे।