अदालत, अस्पताल और सडक किसी की बपौती नहीं

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राकेश दुबे

७० बरस के हिंदुस्तान में नये प्रकार के विभाजन हो रहे हैं | ये विभाजन सरकार को जनोन्मुखी नहीं होने दे रहे हैं, प्रजातंत्र की नींव का पहला पायदान नागरिक होने का अहसास अपराधबोध में बदल रहा है | आम नागरिक यह सोचने को मजबूर है की उसके कर से निर्मित अस्पताल अदालत और सडक तक पर वो महफूज नहीं है | वह दम के साथ यह नहीं कह सकता की ये संस्थान उसके अपने हैं | संसद विधानसभा में आम नागरिक का प्रवेश सुगम नहीं है | उसके कर से निर्मित बंगलों में रह रही सरकार [ मंत्री और अफसर ] के कारिंदे हर मामले में नागरिक को सचिवालय की तरह धकेल देते हैं | सडक पर पुलिस का कब्जा है, देश का कोई भी शहर बाकी नहीं हैं, जहाँ आम नागरिक निर्बाध रुप से आ जा सकता हो | अब तो और भी विचित्र बात हो गई है, अदालत में होने वाले संघर्ष और वकील साहबानों की तादाद उसे अदालत में घुसने से ही डराने लगी है |सरकारी अस्पताल में डाक्टर समूह में इकठ्ठा होते हैं और उनका निशाना भी आम नागरिक ही होता है |
जरा विचार कीजिये | शिक्षा स्वाथ्य और न्याय की पैरोकारी करने वाले संविधान में यह व्यवस्था कहाँ है कि ये मूलभूत सुविधा आम नागरिक को इतने अवरोधों के बाद मिलेगी ? सहज और सुलभता जैसे शब्द पेशेवर गिरोहों ने अपने कब्जे में कर रखे हैं | सरकारी स्कूल कालेज शिक्षा माफिया चलने नहीं दे रहे हैं, सरकारी अस्पतालों पर डाक्टरों का कब्जा है, जो इलाज नहीं नर्सिंग होम/ निजी अस्पतालों में इलाज करने का मार्गदर्शन करते हैं | नागरिक विरोध नहीं कर सकता | उसे अपने बच्चों का भविष्य और खुद की जान जो बचाना है | अदालत के हर पायदान पर वकील साहब मौजूद है, वे उन मुकदमों में भी हाजिर हो जाते है,जहाँ उनकी उपस्थिति की कोई जरूरत नहीं है | छोटे आवेदन से लेकर बड़े मामले तक में नागरिक को यह महसूस होने लगता है वो अदालत में नहीं किसी के व्यक्तिगत बाड़े में घुस आया है | अब तो पुलिस भी अदालत जाने से डरने लगी है |
सडक पर तो वैसे भी आम नागरिक का कोई सम्मान नहीं है | पुलिस का अदना कर्मचारी किसी के भी सम्मान को कभी भी ताक पर रख देता है | आम नागरिक की बेइज्जती का जिम्मा जैसे सरकार ने इन्हें सौंप रखा हो | अब सवाल यह है ? यह सब ऐसा क्यों है ? ७० बरस बाद भी भारत, अंग्रेजी हुकुमत के नकली कारिंदों से मुक्त नहीं हो सका है | ब्रिटिश काल में नागरिक के साथ सरकार का नजरिया गुलाम रियाया का था, सरकार में भले ही भारतीय हो पर सबके नजरिये में आम नागरिक गलत है | नागरिक सम्मान को सारी सरकारें अब तक तक कुचलती रही हैं | जहाँ से उसे यह सम्मान मिल सकता है उस हर दरवाजे पर गिरोह का कब्जा है |
इससे मुक्त कैसे हो सकते हैं, प्रशासनिक अधिकारीयों की नई पीढ़ी में कुछ लोग प्रयोग कर रहे हैं | जैसे कुछ जिलो के कलेक्टरों ने अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजना शुरू किया है | कुछ इंजीनियर कमीशन जैसे अवगुण को त्याग रहे हैं | सरकारी अस्पतालों के कुछ डाक्टर बगैर फ़ीस लिए घर पर मरीज देख रहे हैं और अस्पताल से इतर मरीज देखने से परहेज कर रहे हैं | इसके साथ इस मामले में न्यायालय और सरकार सुस्त है | वकील साहब अदालतें अपने हिसाब से चला रहे हैं और सरकार [मंत्री और अफसर ] जनोन्मुखी होने का ढोंग कर रही है | देश की यह तस्वीर बदल सकती है, बस नागरिक सम्मान के लिए एक कानून बन जाये, अस्पताल. अदालत और सडक नागरिकों के हैं, यह हुकुम हो जाये तो किसी प्रोटेक्शन एक्ट की जरूरत नहीं होगी |
फोटो प्रतीकात्मक है