केरल में ‘अर्बन नक्सलियों’ की गिरफ्तांरी से लेफ्ट खेमे में बवाल…?

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अजय बोकिल
देश की राजधानी दिल्ली में चिंताजनक वकील- पुलिस संघर्ष के बीच केरल से चौंकाने वाली खबर आई है कि वहां पुलिस ने सत्तारूढ़ सीपीएम के ही दो कार्यकर्ताअोंको माअोवादी होने के आरोप में गैरकानूनी गतिविधि निरोधक कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया है। इस घटनाक्रम के लिए जहां वाम हल्कों में खुद मुख्य मंत्री विजयन की आलोचना हो रही है, वहीं सत्तारूढ़ पार्टी ने इस घटनाक्रम के लिए पुलिस को जिम्मेदार ठहराया है। गिरफ्ता र दोनो युवाअों पर माअोवादी साहित्य बांटने का आरोप है। विपक्षी कांग्रेस ने इन गिरफ्ता रियों के बाद मुख्यमंत्री पी. विजयन पर भाजपा का एजेंडा आगे बढ़ाने का आरोप लगाते हुए उनसे इस्तीफा मांग लिया है तो सत्ताधारी सीपीएम कई नेताअों ने इस मामले में सरकार का विरोध शुरू कर दिया है। ऐसे में मुख्य मंत्री विजयन अलग-थलग पड़ते दिखाई दे रहे हैं। बवाल की वजह यह भी है कि गिरफ्ताेर युवा वो हैं, जिन्हें भाजपा ‘अर्बन नक्सली’ कहती आई है। इस पूरे घटनाक्रम का संदेश यह जा रहा है कि शहरी नक्सली अब लेफ्टा प्रशासित राज्य में भी सुरक्षित नहीं है।
केरल में गिरफ्तार दोनो युवा कानून और पत्रकारिता के छात्र हैं। इनके नाम एलन सोहेब और ताहा फैजल हैं। दोनो 20 साल के हैं। उन्हें उनके कोजीकोडे स्थित घरों से गिरफ्ता।र किया गया। दोनो माकपा के सदस्य हैं। इनके पास से राहुल पंडिता की किताब ‘हेलो बस्तर’, माअोवादी प्रचार साहित्य, मार्क्सवाद, साम्राज्यवाद तथा अतिवाद पर लिखे निबंध तथा माकपा का संविधान बरामद किया गया। राज्य के मुख्यमंत्री विजयन ने विधानसभा में बताया कि इन छात्रों पर आरोप है कि ये राज्य में पिछले दिनो पुलिस एनकाउंटर में चार माअोवादियों के मारे जाने का विरोध कर रहे थे। ये एनकाउंटर पलक्कड जिले के मांजाकट्टी जंगलों में हुआ था।
गौरतलब है कि माअोवादियों और नक्सलियों को वामपंथियों में भी अतिवादी माना जाता है। उनके हिंसक तरीको से सभी वामपंथी सहमत नहीं हैं। लेकिन भाजपा और आरएसएस सफेदपोश वामपंथियों को ‘अर्बन नक्सली’ कहते आए हैं। क्योंकि ये माअोवाद को न सिर्फ वैचारिक समर्थन देते हैं बल्कि हिंसक माअोवादियों के बचाव का नेटवर्क तैयार करते हैं। छत्तीसगढ़ में भाजपा राज में ऐसे कई ‘अर्बन नक्सलियों’ को गिरफ्तार किया गया था, जिसको लेकर आज भी विवाद होता रहा है। केरल में तीन साल से वाम मोर्चे एलडीएफ का शासन है। उसी के राज में माअोवादी साहित्य के प्रचार के लिए दो युवा माकपा कार्यकर्ताअोंकी गिरफ्तारी सत्तारूढ़ दल के लोगों के गले नहीं उतर रही है। क्योंकि उनके लिए भी यह किसी हद तक शर्मिंदगी का कारण बन रहा है। सीपीएम कैडर के लिए जवाब देना मुश्किल हो रहा है। उनकी परेशानी का एक कारण यह भी है कि दोनो युवा माकपा कार्यकर्ताअोंकी गिरफ्ता री अत्यंत कठोर माने जाने वाले यूएपीए कानून के तहत की गई है, जिस पर हाई कोर्ट ने भी जमानत देने से इंकार कर दिया है। जबकि राज्य में गृह विभाग मुख्य मंत्री विजयन ने अपने पास ही रखा है। दोनो छात्रों पर जो धाराएं लगाई गई हैं उनमें किसी आंतकी संगठन से जुड़े होना तथा आतंकवादी संगठन को मदद करना शामिल है। इस अनलाॅफुल एक्टिविटी प्रिवेंशन एक्ट ( यूएपीए) के तहत पुलिस गिरफ्ताीर व्यक्ति को बिना चार्ज शीट दाखिल किए 180 दिन तक हिरासत में रख सकती है। राज्य की माकपा सरकार पर आरोप है कि वह इस कानून का दुरूपयोग कर रही है और इस मुद्दे पर सीएम विजयन अकेले पड़ते जा रहे हैं। क्योंकि केरल हाई कोर्ट की खंडपीठ ने पिछले दिनो कहा था कि किसी प्रतिबंधित संगठन की विचारधारा को मानना कोई अपराध नहीं है। यही नहीं, ऐसे ही एक मामले में कोर्ट ने गिरफ्ताचर एक्टिविस्ट को क्षतिपूर्ति के रूप में 10 लाख रू. देने का आदेश सरकार को दिया था।
हालांकि भारी आलोचना के बाद राज्य के डीजीपी ने दोनो की गिरफ्तारी की जांच के आदेश दिए हैं। है। उधर एक एक्टिविस्ट एस. फैजी ने कहा कि एक तरफ मुख्यएमंत्री दोनो माअोवादियों की ‍गिरफ्तायरी को जायज ठहरा रहे हैं तो दूसरी तरफ उन्हीं की सरकार के मंत्री इस गिरफ्ताेरी की आलोचना कर रहे हैं। एक किताब बरामद होने पर खतरनाक यूएपीए कानून के तहत उसकी गिरफ्तारी कहां तक जायज है। यह सवाल भी उठा कि क्या राज्य अब ‘पुलिस राज’ की अोर बढ़ रहा है? प्रदेश के मानव अधिकार वादियों और एक्टिविस्टों का यह भी कहना है कि जिस पुलिस एनकाउंटर में चार माअोवादियों के मारे जाने की घटना हुई, वह वास्तव में फेक एनकाउंटर था। इन युवाअोंकी गिरफ्तासरी भी फर्जी मुठभेड़ की न्यायिक जांच कराने की मांग से जनता का ध्यान हटाने की कवायद है। यहां तक कि भाकपा के राज्य सचिव के राजेन्द्रन ने तो एनकाउंटर के दावे को ही खारिज करते हुए सवाल किया कि जिसमें कोई पुलिस वाला जखमी नहीं हुआ, उसे एनकाउंटर कैसे मानें।
दूसरी तरफ इसी मुद्दे पर राजनीतिक बवाल तेज हो गया है। राज्य सरकार के खिलाफ खुद सत्ताधारी दल के नेता नाराजी जता रहे हैं तो विपक्षी संयुक्त लोकतां‍‍त्रिक मोर्चे ने मुख्यनमंत्री के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया है। विपक्षी यूडीएफ ने मुख्य मंत्री विजयन का आरोप लगाया है कि वे वास्तव में केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह के माअोवादियों को कुचलने के एजेंडे पर ही काम कर रहे हैं। परिणामस्वरूप केरली समाज का एक अोर मुख्यैमंत्री, उनकी पुलिस तथा संघ के समर्थन में तथा दूसरी अोर बाकी लोगों का ध्रुवीकरण हो रहा है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता रमेश चेन्निथला ने कहा कि माकपा सदस्य युवकों की गिरफ्ताारी के बाद राज्य में सत्ताधारी माकपा का समर्थन करने वालों के परिजन भी सुरक्षित नहीं हैं। इस मामले में आगे क्या होता है, यह देखने की बात है, क्योंकि इन गिरफ्तारियों को लेकर खुद माकपा में ही फूट पड़ गई है। जबकि ‘अर्बन नक्सली’ जैसे जुमलों के लिए भाजपा को कोसने की उसकी नीति पर भी सवालिया निशान लग गया है। क्योंकि अगर माकपा राज में ही माकपाई सुरक्षित नहीं हैं तो फिर किस राज्य में हैं? दूसरे शब्दों में वामपंथियों के शासन में ही माअोवाद के प्रचार की अनुमति नहीं है तो फिर कहां होगी? हालांकि सीएम विजयन अनुभवी नेता हैं, लेकिन जो हुआ है, उससे लेफ्ट खेमे में नई बहस की शुरू होना तय है। वहीं भाजपा और दक्षिणपंथियों के लिए यह मुस्कुराने की वजह हो सकती है कि हम तो पहले ही कहते थे कि अर्बन नक्सली ही हिंसक और आतंकी वामपंथ को खाद पानी दे रहे हैं। कुलमिलाकर वामपंथियों के सामने पक्षधरता स्पष्ट करने की एक और चुनौती इस प्रकरण से आन खड़ी हुई है।