शायद इसीलिए कविता ने कुत्ते के लिए मरना मंजूर किया…

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अजय बोकिल

‘कुत्ते की मौत मरना’ मुहावरा सभी ने सुना होगा, क्योंकि इसमे इंसान के प्रति सबसे वफादार प्राणी को लेकर आदर और तुच्छता का समन्वित भाव है, लेकिन किसी कुत्ते के लिए भी कोई मर जाए, यह जरा नया और अचंभित करने वाला मामला है। जी हां, तमिलनाडु में हाल में एक युवती ने अपने प्राणों से प्यारे कुत्ते से संभावित जुदाई से क्षुब्ध होकर मौत को ही गले लगा लिया। मामला राज्य के कोयंबटूर शहर का है। वहां पेरिनायकेनपालयम इलाके में रहने वाली ‍23 वर्षीय कविता पीरूमल नामक युवती ने इसलिए खुदकुशी कर ली क्योंकि उसके पिता ने उसे अपने पालतू कुत्ते सीजर को कहीं छोड़ आने के लिए कहा था। कारण यह था कि इस पालतू कुत्ते ने भारी बारिश और आसमान में कड़कती बिजली से घबरा कर भौंकना शुरू कर दिया था। कुत्ते के भौंकने से परेशान पड़ोसियों ने इसकी शिकायत कविता के पिता से की थी। इस पर पिता ने कविता को डांटा और कुत्ते को छोड़ आने के लिए कहा। ‍कविता किसी निजी कंपनी में दस्तावेज लेखन का काम करती थी और अपने ‘सीजर’ को दो साल से पाले हुए थी। वह उसे बहुत चाहती थी। पुलिस के मुताबिक कविता पिता की डांट बर्दाश्त नहीं कर पाई और रात में पंखे से लटककर खुदकुशी कर ली। मरते वक्त भी उसे चिंता थी तो अपने ‘सीजर’ की। बताया जाता है कि कविता ने जो सुसाइड नोट छोड़ा, उसमें अपने माता‍ पिता, भाई और दादी से सीजर का ध्यान रखने को कहा। साथ ही इस आत्महत्या के लिए सबसे माफी मांगते हुए हर सप्ताह मंदिर जाने का अनुरोध भी किया।
यहां कुछ सवाल गुर्रा रहे हैं। मसलन क्या मानव जीवन कुत्ते के जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है? आखिर इंसान कुत्तों से इतना प्रेम क्यों करता है? मनुष्य और कुत्ते के बीच प्यार और भय का यह ‍िमला-जुला‍ ‍िरश्ता क्यों है? मनुष्य की मौत की तुलना कुत्ते से करना कितना जायज है? इस सवालों के जवाब तलाशने से पहले इंसान और कुत्ते के बीच हजारों सालों से चले आ रहे विश्वास और वफादारी के रिश्ते पर नजर डालें तो दुनिया के तमाम प्राणियों में कुत्ता अकेला ऐसा जीव है, जो आदिकाल से मानव सभ्यता का अभिन्न साथी रहा है। विज्ञान के मुताबिक श्वान और मनुष्य के बीच भरोसे के इस रिश्ते की वजह इंसान और कुत्ते में परस्पर प्रेम के दौरान आॅक्सीटाॅक्सिन नामक हार्मोन का स्रवित होना है। यही हार्मोन दोनो के बीच निस्वार्थ प्रेम और परस्पर सुरक्षा का कारण बनता है। शायद इसीलिए कुत्तों के शौकीन अपने कुत्तों को बच्चों की माफिक पालते हैं। मनुष्य और कुत्ते के साथ रहने का यह सिलसिला करीब 34 हजार वर्ष पूर्व शुरू हुआ था, जो आजतक चल रहा है, बढ़ भी रहा है। हालांकि बहुत से लोग कुत्तों को नापसंद भी करते हैं। ‘कुत्ता फजीहत’ भी इसका एक कारण हो सकता है।
जैसे-जैसे दुनिया में मनुष्य की आबादी बढ़ रही है, वैसे-वैसे उसका श्वान प्रेम भी बढ़ रहा है। इसे हम कुछ भी मान सकते हैं यानि या तो कुत्ते इंसान होते जा रहे हैं या फिर इंसान कु्त्ते बनते जा रहे हैं। इसके पीछे कुत्तों के प्रति एक स्वाभाविक मोह तो है ही, साथ में कुत्ते की असंदिग्ध वफादारी भी है। भारत की ही बात करें तो आज देश में 1 करोड़ से ज्यादा कुत्ते घरों में पाले जा रहे हैं। यह आंकड़ा इंडिया इंटरनेशनल पैट ट्रेड फेयर का है। इस संस्था के मुताबिक हर साल औसतन 6 लाख नए कुत्ते खरीदे और पाले जाते हैं। वैसे हमारे देश में कुत्ते पालना पशु प्रेम के साथ-साथ अमीरी की निशानी भी है। मध्यनम वर्गीय घरों में कुत्ते पालने का शौक तेजी से बढ़ रहा है। यूं भी दुनिया भर में कुत्ता पालने की दीवानगी इस कदर है ‍कि यह काम अपने आप में एक विधा है। इसी के साथ कुत्ते को चाहना और कुत्तों को अभिभावक की तरह पालना भी अलग-अलग विधाएं हैं। यह सच है ‍कि कुत्तों को बच्चों की तरह पालना और सहेजना पड़ता है। उनकी बारीकी से और नियमित देखभाल करनी पड़ती है। बच्चे भी कुत्तों के पिल्लों से जल्द हिल मिल जाते हैं। यही वजह है कि आज देश में कुत्ता पालन का कारोबार साढ़े 21 अरब रू. को छूने जा रहा है। कई लोग तो अपने कुत्ते को अपने बच्चों से भी ज्यादा चाहते हैं। ऐसे कुत्ते गरीबी को चिढ़ाते प्रतीत होते हैं। इसके बाद भी कुत्तों को लेकर हमारे यहां स्वच्छता और सुरक्षा का वह आग्रह नहीं है, जो होना चाहिए।
आम धारणा है कि यदि किसी के घर में कुत्ता भौंकने लगे और कुत्ते की खातिर उसका मालिक भी अलस्सुबह बाहर सैर करने लगे तो समझिए श्वान के साथ-साथ पैसा भी बोल रहा है। ऐसे लोग कम नहीं हैं, जो कुत्ते के चाटने से ज्यादा खुश होते हैं बजाए कुत्ते काटे से डरने के। कुत्ते की खूबी यह है कि वह भी मनुष्य की हर अदा में एन्ज्वाय करता है। यह बात अलग है कि देश की सड़कों और बस्तियों में आज भी आवारा कुत्तों का राज है, जिनकी संख्या करीब साढ़े 3 करोड़ बताई जाती है। इनमें से ज्यादातर देश में हर साल रेबीज के कारण होने वाली औसतन 20 हजार मौतों का कारण बनते हैं।
इसमें शक नहीं कि कुत्ता बेहद बुद्धिमान, चपल और संवेदनशील प्राणी है। उसमें भी मनुष्य जैसी संवेदनाएं होती हैं। प्यार और गुस्से का फर्क यह मूक प्राणी अच्छी तरह समझता है और अपने दोस्त तथा मालिक इंसान की मदद किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहता है। यही वजह है कि जिन प्राणियों को हमारी जिंदगी और भाषा में अहम स्थान मिला है, उनमें कुत्ता अव्वल है। हालांकि कुत्ते की तमाम वफादारी के बाद भी मुहावरों में उसकी नकारात्मक छवि को ही तवज्जो मिली है, जैसे कि ‘कुत्ते की तरह दुम हिलाना’ या ‘कुत्ते
9893699939 फोटो प्रतीकात्मक है