राम मंदिर : फैसला आएगा कोर्ट का और परीक्षा सबकी

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राघवेंद्र सिंह

अगले लगभग दस दिन में भारत ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा होगा। दरअसल ऐसा इसलिए भी कि सुप्रीम कोर्ट राम जन्मभूमि विवाद पर अपना फैसला सुनाएगा। इसके लिए पूरा देश तो क्या लगभग आधी दुनिया दम साध कर इंतजार कर रही है। तत्कालीन प्रधानंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में राम जन्मभूमि पर बने मंदिर के ताले खुले थे। इसके बाद विवाद की लंबी फेहरिस्त है। इसमें राम रथ यात्रा से लेकर 1992 में विवादित ढांचे को ढहाने और उसके बाद देशव्यापी हिंसा और फिर भाजपा शासित मध्यप्रदेश,उत्तर प्रदेश और राजस्थान से सरकारों की बर्खास्तगी शामिल है। एक समय यह विवाद समाज और सियासत में सबसे ज्यादा संगीन था। विवादित ढांचे टूटने के 27 साल बाद लगता है सब सियासत और कानूनी लड़ाई से थक गए। ऐसे में निर्णय जो भी आए उसे स्वीकारने के मुद्दे पर केन्द्र सरकार से लेकर देश भर के राज्य सरकारों और धर्म व समाज से जुड़े संगठनों की अग्नि परीक्षा का दौर शुरू हो गया है। इसके चलते सरकार ने तो पुलिस से लेकर सुरक्षा बलों की छुट्टियां रद्द कर दी हैं। अब सबको दिलो दिमाग से साम्प्रदायिकता खत्म करने का बड़ा काम करना बाकी है।
मध्यप्रदेश उस सूबे में शामिल है जिसने 1992 की हिंसा के बाद भाजपा की पटवा सरकार को बर्खास्त होते हुए देखा है। लेकिन अब लगता है देश की हवा पानी में काफी बदलाव आ चुका है। सुप्रीम कोर्ट फैसले के साथ कानून व्यवस्था की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी यूपी की योगी सरकार पर होगी। इस मामले में मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार के साथ राजस्थान की गहलोत व अन्य राज्यों की सरकारों पर गड़बड़ी रोकने की अहम जिम्मेदारी होगी। एमपी में तो अभी से ऐहतियाती कदम उठाना शुरु कर दिए हैं। भोपाल कलेक्टर तरुण पिथोड़े ने दो महिने के लिए धारा 144 लागू करने का फैसला किया है। हालांकि इसके पीछे विधानसभा का शीतकालीन सत्र भी एक वजह है। विधानसभा सत्र के चलते राजधानी होने के नाते भोपाल में निषेधाज्ञा लागू की जाती है। राज्य में भोपाल के साथ निमाड़ के खण्डवा खरगोन बुरहानपुर और मालवा के इंदौर,उज्जैन,शाजापुर से लेकर राजस्थान सीमा से लगे नीमच मंदसौर तक विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत होगी। इसी तरह महाकौशल में जबलपुर भी डेंजर जोन में रहेगा। सियासत को नजर में रखा जाए तो कांग्रेस शासित राज्यों में यदि हिंसा होती है तो केन्द्र सरकार इन्हें उसी आधार पर निशाने पर ले सकती है जैसे तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.व्ही.नरसिंहाराव सरकार ने यूपी की कल्याण सिंह,एमपी की सुन्दरलाल पटवा औऱ राजस्थान की भैरोसिंह शेखावत सरकार को बर्खास्त किया था। ऐसी स्थिति में कमलनाथ सरकार पर संदिग्ध लोगों की धरपकड़ के साथ भोपाल,मालवा,निमाड़ और महाकौशल क्षेत्र में साम्प्रदायिकता में शामिल समूहों को सूचीबद्ध कर उनके मुखियाओं पर कठोर कार्यवाई करने का जिम्मा रहेगा।
सोशल मीडिया पर भी कड़ी नजर की जरूरत….
राम मंदिर पर फैसला आने से पहले हो सकता है देश में अशांति फैलाने वाले तत्व अफवाहों का बाजार गर्म करें। ऐसे में साम्प्रदायिक मुद्दों पर सोशल मीडिया में तू तू मैं मैं करने वाले ग्रुप और उसमें सक्रिय तत्वों पर नकेल डालने की जरूरत होगी। इसके लिए खास मौकों पर एडवाईजरी भी जारी करने का प्रावधान है। हालांकि केन्द्र सरकार ने धारा 370 हटाने के पहले जिस तरह से जम्मू कश्मीर में सुरक्षा बलों की तैनाती कर सोशल मीडिया को ठप्प करने के लिए इंटरनेट सेवा बंद कर दी थीं। हो सकता है मंदिर पर फैसले के बाद संचार माध्यमों को एक बार फिर शांति बनाए रखने के लिए बंद कर दिया जाए। मुहल्ले मुहल्ले सामाजिक सद्भाव समितियों का गठन भी शुरू कर दिया जाए। मैंने खुद 1992 के दंगे की रिपोर्टिंग भोपाल में की है। उस अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि बहुत जल्द प्रशासन और पुलिस बदमाशों की गिरफ्तारी के साथ हिस्ट्रीशीटर गुन्डों की धरपकड़ का अभियान चला सकती है। इसके अलावा बाहर से आने वाले संदिग्ध व्यक्तियों की होटल सराए के साथ बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर खुफिया पुलिस का जाल बिछाकर उन्हें पकड़ने का प्रयास करेगी। इस मामले में नशीले पदार्थ और अवैध हथियारों के धंधे में लगे लोगों को भी खंगाला जाएगा। जुआ सट्टा और शराब के कारोबार में लगे गिरोह पर भी कड़ी नजर रखने के साथ रातों रात उनकी गिरफ्तारी भी की जा सकती है। कुल मिलाकर पुलिस प्रशासन और सरकार अगले एक महिने अग्नि परीक्षा के दौर में रहेगी। इस बीच पुलिस व प्रशासन पर जातिवाद और कुछ हद तक सम्प्रदायवाद के आरोप गाहे बगाहे चस्पा किए जाते हैं। ऐसे माहौल में अधिकारियों और सुरक्षा बल पर निष्पक्ष रहने और निष्पक्ष दिखने की बड़ी जिम्मेदारी आ पड़ी है। 1992 की हिंसा के दौरान याद होगा कि भोपाल में कलेक्टर एमए खान और एसपी सुभाष अत्रे हुआ करते थे । श्रीखान खुद कहते थे वे भाजपा खासतौर से बाबूलाल के हनुमान हैं वे आफिस में बकायदा हनुमानजी के चित्र पर अगरबत्ती लगाते थे और दीपक जलाते थे। उन्होंने आज के वीआईपी रोड को रेतघाट पुल से लेकर खानुगांव तक झुग्गी मुक्त कराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। अलग बात है कि भोपाल दंगे के बाद खान और अत्रे निलंबित हुए और उनके खिलाफ जांच भी हुई। दंगे को काबू में करने के लिए दुर्ग एसपी सुरेन्द्र सिंह को वायुमार्ग से बुलाकर भोपाल एसपी बनाया गया था, जो बाद में प्रदेश के डीजीपी बने। खान के स्थान पर प्रवेश शर्मा को कलेक्टर भोपाल बनाया गया। दोनों अधिकारियों ने कड़े फैसले किए और सेना की मदद से सात दिन बाद भोपाल में शांति की बहाली शुरू हो पाई थी। हालांकि अब सभी पक्ष राम मंदिर के मुद्दे पर थक गए औऱ उम्मीद की जा रही है कि सभी अदालत के निर्णय पर समझदारी का परिचय देंगे और 1992 नहीं दोहराया जाएगा। पुलिस अधिकारी और भोपाल के वाशिन्दे आज भी कहते हैं कि हिंसा इस शहर की तासीर नहीं है हिंसा भड़काने वालों में बाहरी तत्वों का हाथ था। भोपाल के तलैया और कोतवाली थाना क्षेत्र से सुबह सुबह हिंसा की शुरूआत हुई थी और उसमें शामिल लोगों को उसके पहले और बाद में भोपाल में देखा नहीं गया। इसलिए शांति के लिए बाहरी तत्वों पर नजर रखने और धरपकड़ करने की जरूरत ज्यादा है।