शुद्ध हवा चुनावी वायदा कब बनेगी

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रविंद्र बाजपेयी

भारत की राजधानी दिल्ली एक ऐतिहासिक महानगर है। मुगलों के बाद अंग्रेजों ने इसे राजधानी बनाया और जब देश आजाद हुआ तब भी उसकी इस हैसियत को बरकरार रखा गया। ब्रिटिश सत्ता ने दिल्ली में राजधानी के लिए आवश्यक पूरा ढांचा तैयार कर दिया था। मसलन राष्ट्रपति भवन, नॉर्थ और साऊथ ब्लाक नामक सचिवालय और संसद भवन जैसी अधो संरचना की वजह से दिल्ली को स्वाधीन भारत की राजधानी स्वीकार करने में किसी को आपत्ति नहीं हुई। हांलांकि दक्षिणी राज्यों की दृष्टि से दिल्ली असुविधाजनक थी लेकिन उसकी ऐतिहासिकता उसके पक्ष में गई और 15 अगस्त 1947 को पंडित नेहरू द्वारा लालकिले की प्राचीर पर तिरंगा फहराए जाने के बाद किसी भी प्रकार की अनिश्चितता नहीं रही। यूँ तो दिल्ली पहले से ही बड़ा शहर हुआ करता था लेकिन आजादी के बाद पाकिस्तान से आये शरणार्थियों के कारण इसकी आबादी और चरित्र दोनों बदले। बीते सात दशक में दिल्ली महानगर से प्रदेश बन गया। लेकिन बात यहीं तक सीमित नहीं रही। बढ़ती आबादी के कारण हरियाणा के गुरुग्राम के अलावा उप्र के नोएडा और गाजिय़ाबाद भी दिल्ली के हिस्से बनते चले गए। जिसके बाद एनसीआर (नेशनल कैपिटल रीजन) नामक परियोजना शुरू की गयी और दूसरे राज्यों का हिस्सा होने के बाद भी उक्त शहरों में दिल्ली जैसी सुविधाओं का विकास किया जाने लगा। आज की परिस्थिति में तो ये फैलाव भी छोटा पडऩे लगा है। लेकिन इसका दुष्परिणाम ये हुआ कि दिल्ली के आसपास का खुला इलाका भी कांक्रीट के जंगलों में तब्दील होकर रह गया। जिसके कारण जिन समस्याओं से दिल्ली जूझती है वे ही कमोबेश गुरुग्राम, नोएडा और गाजिय़ाबाद में भी देखी जा सकती हैं। यही वजह है कि दिल्ली से कुछ सरकारी कार्यालय हटाकर अन्य निकटवर्ती शहरों में ले जाने की चर्चा भी अनेक अवसरों पर चली किन्तु बात आगे नहीं बढ़ सकी। धीरे-धीरे दिल्ली देश की राजधानी के साथ ही प्रदूषण की राजधानी भी बनती चली गई। ये सुनकर शर्म आती है कि वह विश्व की सबसे प्रदूषित राजधानियों में पहले दस में है। बीते दो-तीन दिनों से दिल्ली के साथ ही नोएडा और गाजिय़ाबाद की स्थिति बुरी तरह खराब हो चुकी है। वहां स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया गया है। शिक्षण संस्थानों में अवकाश के साथ ही निर्माण कार्य रोक दिए गए हैं। चारों तरफ छाये धुंए के कारण राष्ट्रपति भवन और इण्डिया गेट तक दिखना बंद हो चुके हैं। दिल्ली और समीपवर्ती एनसीआर इलाकों को गैस चेम्बर कहा जाने लगा है। इसकी वजह हरियाणा , पंजाब और उप्र के किसानों द्वारा खेतों में लगाई गई आग से निकला धुंआ है जो हवा के साथ दिल्ली के आसमान पर आकर ठहर जाता है। पहले से प्रदूषित एनसीआर के लिए ये स्थिति कोढ़ में खाज साबित होती है। बीते अनेक सालों से दिल्ली, नोएडा और गाजिय़ाबाद इस संकट का सामना करते आ रहे हैं। खेतों में फसल काटने के बाद बची पराली (ठूंठ) को काटने में आने वाली परेशानियों से बचने के लिए उसमें किसान आग लगा देते हैं जिससे उनका काम तो आसान हो जाता है किन्तु उससे निकलने वाला धुँआ उड़कर दिल्ली की तरफ जाता है। सर्दियां शुरू होते ही उत्तरी हवाओं की दिशा परिवर्तित होने के कारण पड़ोसी राज्यों में पराली के जलाये जाने की वजह से कुछ दिनों के लिए समूचा एनसीआर उसके धुंध में ढँक जाता है। इसे लेकर हर वर्ष खूब हल्ला मचता है। पड़ोसी राज्यों पर दोषारोपण के साथ ही दिल्ली की स्थानीय राजनीति भी गरमाती है। वैसे हरियाणा और पंजाब में भी पराली जलाने पर रोक लगाने का प्रयास होता है लेकिन उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिलने से ये समस्या स्थायी होती जा रही है। प्रधानमन्त्री की अपील का भी विशेष असर नहीं हुआ। वैसे पराली की समस्या तो साल के कुछ दिन ही आती है लेकिन दिल्ली और आसपास के शहरों में प्रदूषण स्थायी हो गया है। आबादी के विस्फोट को रोकने की लिए भले ही गुरुग्राम, नोएडा और गाजिय़ाबाद जैसे इलाके विकसित किये गए हों लेकिन वाहनों के साथ ही औद्योगिक धुंए से होने वाले प्रदूषण ने हालात बेकाबू कर दिए हैं। राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान के बावजूद देश की राजधानी सबसे प्रदूषित नगरों में बनी हुई है। लुटियंस की दिल्ली कहे जाने वाले वीआईपी क्षेत्रों को छोड़ दें तो शेष दिल्ली में देश के अन्य हिस्सों जितने ही कचरे के ढेर नजर आते हैं। सवाल ये है कि जब राजधानी की ये दुर्दशा है तब देश के छोटे शहरों और कस्बों की क्या स्थिति होगी? प्रधानमन्त्री ने स्वच्छता सर्वेक्षण नामक जो प्रतियोगिता शुरू की उसका सकारात्मक असर हुआ है। देश के अनेक नगरों की स्थिति में आश्चर्यजनक सुधार देखा जा सकता है लेकिन देश की सत्ता जिस दिल्ली में विराजमान है वहां की दशा चिंताजनक है। केजरीवाल सरकार ने सड़कों पर वाहनों की आवाजाही कम करने के लिए ऑड-ईवन नामक व्यवस्था भी लागू की लेकिन उससे भी समस्या का समाधान नहीं हो सका। लेकिन प्रदूषण की समस्या को केवल दिल्ली या और महानगरों तक ही सीमित करके नहीं देखा जा सकता क्योंकि अब तो कुछ को छोड़कर बाकी सभी छोटे-बड़े शहर प्रदूषण की गिरफ्त में आ चुके हैं। दु:ख और चिंता का विषय ये है कि शुद्ध हवा के लिए पहिचाने जाने वाले गाँवों में भी ये समस्या निरंतर गम्भीर होती जा रही है। दिल्ली का बोझ कम करने के लिए कुछ दफ्तर वहां से दूसरे शहरों में ले जाने का सुझाव भी यदि अमल में आ आये तब भी देश के बाकी हिस्सों में प्रदूषण को कैसे रोका जायेगा ये प्रश्न राष्ट्रीय चिंता का विषय बन गया है। पराली का धुँआ तो कुछ दिनों बाद छंट जाएगा लेकिन केवल उतने मात्र से ही दिल्ली को राहत नहीं मिलेगी। दु:ख की बात ये है मानव जीवन के लिए अत्यावश्यक शुद्ध हवा देना किसी भी चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा नहीं होता।