अथ श्रीसोशल मीडिया कथा ………!!!!!

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– धीरेन्द्र शुक्ल

बंधु यदि आप रचनाकार हैं और रातो-रात विख्यात होना चाहते हैं तो एक फंडा या कहलो हथकंडा या कह लो फंदा या गुरु का गंडा आपको दे रहा हूं। आप बिना देर किए सोशल मीडिया पर आ जाइये। आप कहेंगे कैसी वाहियात सलाह है!!! तो आपकी बात भी बेजा नहीं है,सही सोचा आपने पर बात की गहराई में उतरे बिना, मैं ज़रा गहरी बात कह रहा हूं,उसे समझिये। देखिये! आप जब लिखते हैं तो आप अकेले ही लिखते हैं और यह रचना सिर्फ आपके अकेले के नाम से छपती है लेकिन सोषल मीडिया में ऐसा नहीं है। यहां आपने अपनी एक रचना डाली और अच्छी लगी तो सैकडों-हजारों लोग इसे अपने खुद के नाम के साथ आगे बढा देते हैं मतलब यह कि आपकी रचना वायरल हो जाती है अब ये भी हो सकता है कि अपनी रचना को इतने सारे नामों के साथ गतिमान होता देखकर आपको खुद वायरल हो जाए लेकिन बंधु थोडा उदार तो आपको होना होगा ना! बिना कुछ खोए कुछ मिलता है क्या? और फिर संतों की सीख भूल गए? इस दुनिया में क्या मेरा और क्या तेरा ? जब कुछ भी तुम्हारा नही ंतो तुम्हारी रचना भी कैसे तुम्हारी? वह तो इस जग की है। आखिर परमात्मा ने ही तो तुम्हें यह प्रतिभा दी है कि तुम लिख सको तो फिर उसकी ही दी हुई प्रतिभा को उसीके बनाए दूसरे हुनरमंदों के साथ बांटना भी तो भगवान को ही प्रसाद चढाने जैसा ही हुआ ना! तेरा तुझको अर्पण!!!
आप यदि इस सोषल मीडिया के इन हुनरमंदों को नहीं जानते तो मैं इस विषाल सागर का छोटा सा जीव आपके कुछ काम आ सकता हूं,मुझे ऐसा लगता है। देखिये !!!! यहां कई लोग हैं जिनमें असाधारण प्रतिभा और साहस है, इतना कि आपको कहीं और ढूंढे नहीं मिल सकता । मैं इस वाक्य की उदाहरण सहित व्याख्या करता हूं। मान लीजिये कि आपने कोई षेर लिखा या कविता लिखी तो आप चाहेंगे कि यह आपके अपने नाम से छपे,यही रचना तो आपकी पहचान बनती है और इसीसे तो एक रचनाकार अमरता को हासिल कर पाता है इसीलिए कभी दूसरे की कोई रचना या रचानांष उद्धृत करते हैं तो बाकायदा रचनाकार का नाम भी डाल देते हैं,आपको क्या लगता है कि आप बडे सिद्धांतवादी हैं ? नहीं साब! माफ कीजिये पर मैं यह कहना चाहूंगा कि आप सिद्धांतवादी नहीं डरपोक हैं। आपको लगता है कि दूसरों का काम अपने नाम से छपा और किसी को पता चला तो आपकी बडी थू-थू हो जाएगी। सोषल मीडिया से सीखिये!!! यहां ऐसे-ऐसे बहादुर हैं जो डंके की चोट पर साहिर लुधियानवी,फिराक गोरखपुरी,बषीर बद्र,वसीम बरेलवी से लेकर गालिब तक की रचनाएं अपने नाम पर दर्ज कर लेते हैं और कोई उन्हें यह बता दे तो बताने वाले की ऐसी हालत कर देते हैं कि वह दोबारा यह हिमाकत नहीं कर पाता कि उन्हंे कोई सीख दे। इस बिरादरी का बाकायदा एक अघोषित संगठन है जो अपने किसी भी सदस्य पर सच्चाई की जरा सी भी आंच नहीं आने देता। आपने कोई टिप्पणी की और यह गिरोह इमोजी,लाइक कमेंट जैसे हथियार लेकर आपके पीछे पड जाएगा । एक बार मैने चैर्य कर्म में दक्ष कुछ ऐसे ही कलाकारों कि किसी रचना पर आगृह किया कि बंधु ये तो बता दो कि ये किसकी है तो उन्होंने इसे लाइक कर मेरी बोलती बंद कर दी, मेरा साहस जवाब दे गया अब किस मुंह से पूंछू कहीं फिर लाइक कर दिया तो!!! जैसे मुम्बई महानगर है और वहां गेंगस्टर्स पाए जाते हैं वैसे ही सोषल मीडिया के भी अपने गेंगस्टर्स हैं। उनके सुपारी किलर से लेकर पान किलर तक सब हैं, वे उसी को लाइक करते हैं, माफ करना यहां लाइक करने के लिए सही षब्द हैं लाइक मारते हैं, तो वे उसे ही लाइक मारते हैं जिसे वे अपने गैंग का मानते हैं। वे दिन में रह रह कर दो चार बार गोली यानि पोस्ट दागते हैं और उनकी गैंग के लोग पिल पडते हैं उनकी जय-जयकार करने में। आपमें यदि गुणग्राहकता है तो आप किसी की भी पोस्ट हो अच्छी बात कही गई है तो उस पर तुरंत अपनी प्रतिक्रिया देंगे, दो षब्द कहेंगे लेकिन यहां आपका यह गुण काम नहीं आएगा। यहां के गेंगस्टर्स सिर्फ उसी पोस्ट को लाइक करते हैं जो उनके चेले-चपाटियों की हो,चाहे वे कुछ भी लिखें ये अपने चेलों को लाइक मारकर आषीर्वाद देने में देर नहीं लगाते। यहां पर लाइक मारना सबसे गजब की कला है। अब यह जरूरी नहीं है कोई जिस पोस्ट को कोई लाइक कर रहा है उसे उस पोस्ट का वाकई अर्थ भी पता हो। पिछले दिनों मैने एक रहस्यमय कविता पढी जो कुछ इस तरह से थी- गाडी है तो खाडी है/खाडी है तो गाडी है/ गाडी है तो साडी है /साडी है तो दुकानदार है/ दुकानदार है तो मजदूर है/ मजदूर है तो मजबूर है/ मजबूर है तो षहर है/ षहर में दोपहर है और दोपहर में मैं खडा हूं। इस कविता को पढने के बाद मैं इसका मर्म समझने में अपना सिर धुनता रहा पर कुछ पल्ले नहीं पडा। मैं इस पोस्ट से ही डर गया , डरते-डरते दुबारा इस पोस्ट की तरफ गया तो हैरान रह गया सात लोगों ने इस पर लाइक जड दिया था। पहले इच्छा हुई कि दिव्यात्माओं से ही पूछूं कि इस कविता का अर्थ क्या है लेकिन फिर वही लाइक वाली बात याद आ गई कि कहीं इस पर भी कोई लाइक न मार दे।
एक और बात है। अगर आप बडी श्रेष्ठ रचनाएं लिखते हैं, मतलब वाकई श्रेष्ठ लिखते हैं और प्रतिष्ठित पत्रिकाओं वगैरह में आप छपते रहे हैं तो इस मुगालते में कतई मत रहिये कि फेसबुक पर भी यहां आपको वैसा ही सम्मान मिलेगा। यहां आपकी सारी अकड निकल जाएगी या निकाल दी जाएगी। फर्ज कीजिये आपने कोई बहुत गहरी बात कह दी है तो आप सोचेंगे कि अब लोग इस पर आपकी प्रषंसा या आलोचना करेंगे लेकिन तभी आपको एक भन्नाया हुआ तीर लगता है- उम्दा!!! और कुछ नहीं बस उम्दा!!!! कुछ इस अंदाज में कि जा बेटा मैने तेरी कविता पर कमेंट करके तुझपर एहसान कर दिया। मैं सोचता हूं कि अगर सोशल मीडिया के इस युग में कालीदास और तुलसीदास वगैरह होते तो उनका भी हाल ऐसा ही होता। कालीदास के अदभुत श्रंगार वाली किसी रचना पर कोई उम्दा वाला मिसाइल दाग देता या तुलसीदास जी की किसी चैपाई पर कोई लिख देता उम्दा!!! तो सोचो उनका क्या होता? बंधु मैं भुक्तभोगी हूं, यहां के नियम-कानून जानता हूं थोडा-बहुत इसलिए कह रहा हूं कि पहला नियम यह भी बना लीजिये कि किसी की किसी भी पोस्ट की सच्चाई वगैरह के बारे मंे बात नहीं करनी है। दूसरा यह कि जो रचना आप सोशल मीडिया पर पोस्ट करें उसके लिए तैयार रहें कि एक न एक दिन वह आपको ही कोई और सुना सकता है वह भी अपनी बता कर या फिर पोस्ट कर सकता है बाकायदा अपने नाम के साथ। तो थोडा उदार बनिये… यह देह, जो रचनाकार है, वही आपकी नहीं है तो रचना कैसे आपकी हो जाएगी? जैसे सबै भूमि गोपाल की वैसे सबै रचना सोशल मीडिया की……तो तैयार हैं आप? क्या कहा नहीं ? ओहहो मतलब डरपोक और कंजूस टाइप के आदमी हैं….चलिये कोई बात नहीं यहां रचनाकारों की कमी थोडे ही है किलो के भाव पडे हैं………।
वरिष्ठ पत्रकार धीरेन्द्र शुक्ल की फेसबुक वाल से साभार