आर्थिक वृद्धि दर की खबर को विश्वसनीय बनाएं

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राकेश दुबे

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से भारत की आर्थिक वृद्धि की जो खबर छन कर आ रही है और यदि खबर विश्वसनीय है तो देश को संतोष करना चाहिए | वैसे अनेक घरेलू और वैश्विक कारकों के कारण भारत की आर्थिक वृद्धि की उम्मीद हिचकोले खाती दिख रही है | सरकार की ओर से कोई सम्मान जनक प्रत्युत्तर कभी आता नहीं है | ख़ैर ! अर्थव्यवस्था की बेहतरी की उम्मीद बढ़ रही है, यह संतोषजनक है | अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने चालू वित्त वर्ष में आर्थिक वृद्धि की दर ६.१ प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है, और यह आशा भी जतायी है कि अगले साल यह दर और आगे पहुंच जायेगी|
वैसे इन दिनों बैंकिंग सेक्टर पर गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों के दबाव तथा गैर-बैंकिंग वित्तीय सेक्टर में जोखिम बढ़ने के चिंताजनक रुझान से भारत में कारोबार बढ़ाने में निवेशकों की दिलचस्पी पर असर पड़ने की आशंकाएं पैदा हो रही थीं, परंतु, विश्व बैंक द्वारा जारी व्यापार सुगमता सूचकांक में भारत ने १४ पायदान की बड़ी छलांग लगाकर यह जता दिया है कि देश में निवेश फायदा का सौदा है| इस सूचकांक में भारत की स्थिति लगातार तीसरे साल बेहतर हुई है| यही अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का आकलन का आधार भी है
आंकड़ों के अनुसार पिछली सूची में भारत ७७ वें स्थान पर था और इस साल १९० देशों में उसे ६३ वां स्थान मिला है| अब भारत को उन १० देशों में भी शामिल किया गया है, जहां व्यापारिक माहौल में सबसे ज्यादा सुधार हुआ है| वर्ष २०१४ में सत्ता संभालने के बाद से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने सुधारों के ठोस सिलसिले का दावा किया था | सरकार अब भी ऐसे दावे कर रही है, परन्तु उद्द्योग जगत अनेक बार असहमति बता चुका है |असहमति के स्वर अब भी जारी है| जबकि सरकार के दावे विभिन्न प्रावधानों और नियमन के जरिये पारदर्शिता बढ़ाने और भ्रष्टाचार रोकने की दिशा में कारगर पहल के बाबत हैं| कराधान प्रणाली को जटिलताओं तथा प्रशासनिक तंत्र को लाल फीताशाही से मुक्त कराने का भी सरकार का दावा है,पर व्यापारियों का मानना है कि इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया |
बीते कुछ महीनों में अर्थव्यवस्था की गति बढ़ाने के लिए अनेक घोषणाएं हुई हैं| इन कारणों से वैश्विक स्तर पर आर्थिक वृद्धि में गिरावट के बावजूद भारत आज भी सबसे तेज गति से बढ़नेवाले देशों में दिख रहा है| विश्व बैंक की रिपोर्ट की यह बात भी महत्वपूर्ण है कि प्रधानमंत्री मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम और व्यापार सुगमता पर सरकार के ध्यान से भारत की ठोस प्रगति को इंगित किया जा सकता है| फिर भारत के अर्थ शास्त्रियों की असहमति क्यों है ? एक बड़ा सवाल है |
भारत सरकार ने २०२० तक इस सूचकांक में शीर्ष ५० देशों में जगह बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है| सरकार का दावा है कि आर्थिक सुधारों से हमारी अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार तो मिला ही है, सामाजिक विकास व कल्याण योजनाओं ने भी सकारात्मक माहौल बनाने और लोगों के जीवन-स्तर को बेहतर करने में उल्लेखनीय योगदान दिया है| आर्थिक विकास और सामाजिक विकास के संतुलन से ही किसी देश की प्रगति की वास्तविक तस्वीर बदल सकती है| सरकार का दावा है कि उसने जहां वित्तीय संस्थाओं को पूंजी उपलब्ध कराने का निरंतर प्रयास किया है, वहीं कल्याण योजनाओं के लिए भी समुचित धन मुहैया कराने में कसर नहीं छोड़ी है|
सरकारी दावे के अनुसार अब ग्रामीण क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिए आगामी कुछ सालों में जहां २५ लाख करोड़ रुपये के बड़े निवेश की योजना लागू की जा रही है, वहीं अगले तीन सालों में राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार करने के लिए आठ लाख करोड़ रुपये खर्च करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है| ऐसे में निकट भविष्य में अर्थव्यवस्था की बढ़ोतरी के प्रति आश्वस्त हुआ जा सकता है बशर्ते सारे तथ्य ठोस और सही हो |