ज़ुआडियों की तंगहाली से जुआ शर्मसार हुआ…..

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ज़हीर अंसारी

इस दीवाली ज़ुआडियों ने ‘जुआ खेल’ की इज़्ज़त तार-तार करके रख दी है। जुआडीगण जुआ खेलने बैठे वो भी तंगहाली में। अरे भाई जब कंगाली के दौर से गुज़र रहे हो तो काहे बैठे जुआ खेलने। जुआ की इज़्ज़त ख़राब की और ख़ुद भी बदनामी की चादर ओढ़ी। पुलिस के मेहमान बने और घर वालों की फजीता करवाई। इससे अच्छा होता कि किसी रेग्युलर गैम्बलर के साथ साझेदारी कर लेते है। वह जीतता तो हिस्सेदारी दे ही देता। और पकड़ा भी नहीं जाता। यह सर्वविदित है कि रेग्युलर गैंबलर्स के ताल्लुकात जुआ विरोधी संस्थान के कारिन्दों से बहुत बढ़िया होते हैं। वजह साफ़ है कि इनके दरम्यान आपसी भाई-चारा सहज होता है। वहीं शौक़िया जुआरी फ़ौरन चपेट में आ जाते हैं। इस बार की दिवाली में भी यही हुआ। जबलपुर जिले के अलग-अलग हिस्से से 280 जुआडी पकड़े गए। अफ़सोस ये कि इनके पास से उतना माल (नक़दी) जप्ती में नहीं निकला जितना निकलना चाहिए था। लगता है इन पर भी मंदी का असर रहा। 280 ज़ुआडियों से मात्र 2 लाख 3 हज़ार 450 रुपए की जप्ती मिली यानि औसतन प्रत्येक जुआडी 726 रुपए। पकड़े गए ज़ुआडियों की संख्या और जप्ती की रक़म से तो यही लगता है ये बेचारे भी मुफ़लिसी के दौर से गुज़र रहे हैं। अब कोई बताए इतनी मामूली रक़म लेकर कोई जुआ खेलेगा। ये तो जुए की तौहीन ही हुई न।
यह बात अलहदा है कि पेशेवर गैम्बलर्स अपने निश्चित ठिये पर बैठकर लाखों रुपए के वारे-न्यारे कर लिए और किसी को कानों कान ख़बर तक न लगी। पकड़े गए बेचारे टुटपूँजिया जुआरी। ख़ुद भी बदनाम हुए और जुए को भी शर्मसार किया। परिजनों ने छुड़ाने में चढ़ावा चढ़ाना पड़ा सो अलग। हालाँकि यह बात किसी को हज़म नहीं हो रही है कि इतनी मामूली जप्ती हुई होगी। lलोगों का मानना है कि ज़रूर जप्ती बनाने वालों ने जीएसटी काट ली होगी।