वो भी दिवाली थी ये भी दिवाली है……

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ज़हीर अंसारी

बेशक आप कहेंगे दिवाली का बाज़ार अपने पूरे शबाब है। दुकानों पर ख़रीददारों का जमघट लगा है। दुकानदार के पास बात करने की फ़ुर्सत नहीं है। हो सकता है कि आपकी राजनीतिक समझ ऐसा मुग़ालता पालने के लिए मजबूर कर रही हो। ज़मीनी हक़ीक़त इसके उलट है। बाज़ार और कारोबार अपेक्षाकृत पिछली दिवालियों के मुक़ाबले काफ़ी ठंडा है। इसकी वजह आप कुछ भी समझ सकते हैं लेकिन हक़ीक़त यह है कि दिग्भ्रमित अर्थनीति, नोटबंदी और जीएसटी के साइड इफ़ेक्ट ने कारोबार की कमर तोड़कर रख दी है। ऊपर से दीर्घकालीन आर्थिक मंदी का हौव्वा ग्राहकों की क्रय शक्ति का ह्रास कर रहा है।
गए सालों में दुकानों की रौनक़ और सड़कों की भीड़ देखते बनती थी वो नज़ारा इस बार कम नज़र आ रहा है। सड़कों पर भीड़ वही दिख रही है जो दिवाली की औपचारिक ज़रूरतों को ख़रीदने निकली है। घटी बिक्री से व्यापारी वर्ग निराश है तो पब्लिक पैसों की कमी से हलाकान दिख रही है।
वर्तमान हालातों की वजह से पब्लिक बहुत ज़्यादा कनफ़्यूज है। एक तो मंदी का दुष्प्रचार, दूसरे बढ़ती बेरोज़गारी, तीसरे बैंकों की गिरती साख, चौथे सरकार की अनिश्चित अर्थनीति, पाँचवे नक़दी की कमी, छठवाँ शिक्षा, स्वस्थ्य और डीज़ल-पेट्रोल पर बढ़ता व्यय, और घटती आय आदि जैसी कई दिक़्क़तें हैं जिसने आम नागरिक को उलझा रखा है। बैंकों और सरकारों की गिरती माली हालत और भविष्य की व्यापारिक सम्भावनाओं की क्षीणता भी परेशान करने वाली स्थितियाँ पैदा कर रही हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि आम आदमी अथवा उपभोक्ता की पैसा ख़र्च करने की संवेदनाएँ मृतप्रायः होती जा रही है।आमदनी की नाउम्मीदी से भयभीत उपभोक्ता आने वाले वक़्त के लिए पैसा सुरक्षित रख रहा है। सिर्फ़ ज़रूरी जिन्स ही ख़रीद रहा है। जिसका पर्याप्त असर दिवाली के बाज़ार पर पड़ रहा है।
ठंडी दिवाली असर न केवल भारतीय कारोबारियों पर पड़ रहा है अपितु विदेशी कम्पनियाँ भी इसकी चपेट में हैं। विदेशी कम्पनियाँ भारत को ‘बिग मार्केट’ मानती हैं मगर इस बार उनके प्रोडक्ट्स के सेल भी प्रभावित हुई है।
कुलमिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस बार की दिवाली वैसी नहीं है जैसी हुआ करती थी। दियों के मध्यम प्रकाश इस बार की दिवाली रौशन होगी।
फोटो प्रतीकात्मक है