बेपेंदी के लोटों की घर वापिसी

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-रवीन्द्र वाजपेयी

मप्र के जिन दो भाजपा विधायकों ने कुछ माह पूर्व विधानसभा में कमलनाथ सरकार के विधेयक का समर्थन कर कांग्रेस में जाने के संकेत दिए थे उनमें से एक नारायण त्रिपाठी गत दिवस भाजपा में वापिस आ गए। उनके साथ ही पार्टी से दूर होने वाले विधायक शरद कोल के बारे में भी दावा किया गया कि वे भाजपा में ही हैं। दरअसल इन दोनों ने जब सरकारी विधेयक के पक्ष में मतदान किया उस समय चूंकि भाजपा ने किसी भी तरह का व्हिप जारी नहीं किया था इसलिए दोनों पर दलबदल कानून लागू नहीं हुआ। हालाँकि दोनों ने क्षेत्रीय विकास के नाम पर मुख्यमंत्री की शान में कसीदे पढ़ते हुए भाजपा को कोसा भी लेकिन पार्टी ने उनके विरुद्ध किसी भी तरह की अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जिससे तकनीकी तौर पर वे पार्टी के ही विधायक बने रहे। बावजूद उसके सदन में सरकार का समर्थन करने के बाद से वे भाजपा के करीब नहीं नजर आये और आलोचनात्मक टिप्पणियाँ करने में भी नहीं चूके। जिस समय उन्होंने विधानसभा में कमलनाथ सरकार का साथ दिया उस समय भाजपा के छोटे से लेकर बड़े नेता तक कमलनाथ सरकार गिराने की डींगें हांका करते थे। नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव तो हाईकमान का इशारा मिलने भर की बातें करते सुने गए। लेकिन ज्योंही उक्त दोनों विधायकों ने पाला बदला त्योंही सरकार गिराने की बजाय भाजपा अपना घर बचाने में जुट गई। अब अचानक वे दोबारा पार्टी से कैसे जुड़े ये तो वही जानें। शरद कोल ने तो सार्वजानिक तौर पर ज्यादा कुछ नहीं कहा लेकिन श्री त्रिपाठी ने जो बयान दिया वह उनकी बेशर्मी का परिचायक है। वैसे वे हैं भी पुराने दलबदलू। 2013 में वे मप्र की मैहर विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक बने लेकिन 2014 में विधायकी छोडकर भाजपा में आ गए और उपचुनाव में जीते। 2018 में फिर चुने गए लेकिन कुछ महीनों बाद ही कांग्रेस के करीब जा बैठे। दरअसल उक्त दोनों विधायक मंत्री बनने के लालच में कमलनाथ के झंडे तले चले तो गए लेकिन उसके लिए उन्हें विधायकी छोड़कर उपचुनाव लडऩा पड़ता जिसके लिए शायद कांग्रेस राजी नहीं थी। उनके सामने परेशानी ये थी कि विधानसभा में उन्हें भाजपा के साथ ही बैठना पड़ता और व्हिप जारी होने पर उसका पालन करते हुए सरकार के विरोध में मतदान करना पड़ता। राजनीति में माहिर कमलनाथ को जब लगा कि ये दोनों उनके लिए बोझ बन जायेंगे तब उनकी उपेक्षा शुरू हो गई, जिसके बाद बाद शरद कोल चुपचाप और नारायण त्रिपाठी ढोल पीटते हुए भाजपा में लौट आये। श्री त्रिपाठी कभी समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे थे। प्रदेश में सत्ता से बाहर बैठी भाजपा के लिए झाबुआ उपचुनाव के ठीक पहले दोनों विधायकों का घर लौट आना निश्चित तौर पर मनोबल बढ़ाने वाला तो है किन्तु ऐसे बेपेंदी के मिर्जापुरी लोटा कहलाने वाले विधायकों पर दोबारा भरोसा करना किसी भी लिहाज से अक्लमंदी नहीं है। लेकिन भाजपा को अब इन सबसे कोई सरोकार नहीं रहा। सत्ता की अंधी दौड़ में नैतिकता , निष्ठा और ईमानदारी कांग्रेस की तरह उसके लिए भी फिजूल की बातें बनकर रह गईं हैं। शरद कोल तो पिछले विधानसभा चुनाव के पहले तक कांग्रेस के पदाधिकारी तक रह चुके थे। जहां तक बात श्री त्रिपाठी की है तो उनके अवसरवादी और मतलबपरस्त होने में किसी को कोई संदेह न पहले था और न ही अब है। उन दोनों ने सदन में कमलनाथ सरकार के पक्ष में मत देने के बाद व्हिप नहीं होने से अनजाने में वैसा करने की बात कही होती तब उन्हें निर्दोष माना जा सकता था। लेकिन बाद में उनके द्वारा की गयी बयानबाजी से जाहिर था कि कांग्रेस के साथ उनकी बातचीत पहले से चल रही थी। उन्होंने भाजपा में उपेक्षा के आरोप भी लगाए। लेकिन जब उन्हें लगा कि एक तो कांग्रेस उन्हें भाव नहीं दे रही और विधायकी छोड़कर उपचुनाव लडऩा खतरे से खाली नहीं होगा तब वे घर वापिसी का नाटक करते हुए लौट आये। भाजपा भी उनका स्वागत करने इस तरह बेताब दिखी मानों मेले में खोये हुए भाई वापिस लौट आये हों। दो विधायकों के रूठकर जाने और फिर मान-मनौव्वल के बाद वापिस आ जाने का ये किस्सा भाजपा के लिए अब नया नहीं है। लेकिन इससे उसके निष्ठावान कार्यकर्ताओं और नेताओं पर क्या गुजरती है ये भी उसके कर्ताधर्ताओं को सोचना चाहिये। राजनीति उसके लिए केवल सत्ता का खेल हो गयी है तब उसे बेहिचक ये स्वीकार करना चाहिए कि इस मामले में वह भी और दलों की तरह ही है। हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में जिस तरह से उसने नई भर्ती वालों को टिकिट दी उससे उसकी वैचारिक पहिचान पर एक बार फिर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं। मप्र में उसके दो विधायकों के कांगे्रस की गोद में जाकर बैठ जाने और स्वार्थसिद्धि नहीं होने के बाद मीठी – मीठी बातें करते हुए लौट आने का समूचा घटनाचक्र राष्ट्रीय राजनीति की पहिचान सा बन गया है लेकिन भाजपा भी उसी का हिस्सा बन गई ये देखकर उन लोगों को आश्चर्य कम और दु:ख ज्यादा होता है जो उसकी नीतियों और सिद्धांतों के कारण उसका समर्थन करते हैं।