व्यंग = हाउ इज द जोश !!

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प्रभात गोस्वामी

राजतंत्र से लेकर लोकतंत्र के आँगन तक चमचागिरी का पौधा पवित्र तुलसी के पौधे की तरह फल-फूल रहा है और इसकी पूजा भी सदियों से बदस्तूर जारी है। पहले राजाओं की गुलामी के लिए तो वाकायदा कारिंदे रखे जाते थे जो उनका पीआर देखते थे। चमचागिरी का जन्म हमारे ही देश में नहीं हुआ वरन पूरी दुनिया में इसका वजूद आज भी बना हुआ है। बॉस की चमचागिरी के किस्से इतिहास में भरे पड़े हैं। ऑफिस के बाबूजी से लेकर सीनियर ऑफिसर्स तक सब बॉस को खुश करने की जुगत में शिष्टाचार की सीमाएं लांघकर चमचागिरी की धार चमकाने में व्यस्त हैं।
बॉस के ऑफिस आते ही चरणस्पर्श कर उनकी प्रशंसा के पुल बाँधने का जो सिलसिला शुरू होता है वो घंटों चलता है पर टेबल पर रखी पीड़ित प्रार्थी की फाइल एक इंच भी नहीं चल पाती। आम आदमी के प्रति बरती जा रही – संवेदनहीनता की परवाह न करते हुए ये कारिंदे भी अपनी एकता के लिए यूनियन बना कर काम करते हैं। बॉस का फोन उठाते ही चेहरे पर दयनीय भाव लिए सर, सर की ऐसी झड़ी लगाते हैं कि सुननेवाला पानी -पानी हो जाए। पर ये ऐसा प्रदर्शित करते हैं जैसे बॉस इन्सान नहीं भगवान् हों ? कुछ तो फोन उठाते समय बॉस को दूर बैठे भी चरणस्पर्श करने का अहसास दिलाने के लिए धनुष की तरह झुकते भी हैं।
बॉस के चेंबर से बाहर निकलते वक्त ये ऑफिस के स्टाफ सहित वहां खड़े प्रार्थियों को ऐसे धकिया कर रास्ता साफ करते हैं कि मानों इनसे बड़ा इन्सान इस धरती पर शायद ही कोई दूसरा हुआ हो। ये चमचे बॉस की ब्रीफकेस उठाने, लंच के समय बॉस के सर पर चम्पी करने से लेकर उनके घर के काम, बच्चों की स्कूल फीस भरने, बॉस के नल -बिजली, फोन के बिल भरने से लेकर हर वो काम करते हैं जिससे बॉस खुश हो कर इन्हें वरदान देते रहें।
हमारे ऑफिस में जब भी नए बॉस की एंट्री होती है तो उनका पुराना इतिहास किसी पुरातन सभ्यता की मानिंद खोद -खोद कर निकाला जाता है। लेकिन इस बार नजारा कुछ अलग था। नए बॉस बड़े सख्त, किसी को अपने नजदीक फटकने ही नहीं दे रहे थे। बात-बात में मातहतों को डांटना, खुले आम उनकी इन्सल्ट करना, कार्मिकों को निकम्मा करार देने की उनकी प्रवृत्ति से चमचा मण्डली परेशान हो गई कि कैसे बॉस के चैम्बर में घुसपैठ हो ? ऐसे माहौल मंे चमचों ने भी बाॅस को रिझाने के नए-नए फार्मूले खोजने शुरु कर दिए।
मण्डली का इतिहास कहीं चमचागिरी से वंचित हो कर खराब न हो जाए ? इसी सोच और चिंता में मंगत बाबू तो बीमार हो गए। छ्ग्गुराम, छुट्टन मियां, प्रसादी लाल के चेहरे से चमचागिरी की लाली भी उड़ने लगी थी। सब दिन भर चिंता और चिंतन में डूबे रहते पर कोई तोड़ नजर नहीं आ रहा था। करें तो क्या करें ?
उधर , बॉस का खौफ भी गब्बर सिंह की मानिंद दिनों-दिन बढ़ता गया। काम करने की आदत भी डालनी ही पड़ी। चमचों का धैर्य टूटने की कगार पर था। पर, फिर भी हिम्मत न हारने वाले चमचों को आस थी कि एक दिन तो “अच्छे दिन” आएंगे जरूर !
नए बॉस के तेवरों को डीकोड करने की हर जुगत पर अब मंथन होने लगा । इस बीच एक दिन सुबह शर्मा जी ने बॉस को अपने कुत्ते के साथ पार्क में घूमते देख लिया। दबे पांव शर्मा जी ने बॉस को गुड माॅर्निंग कह कर बातों का सिलसिला शुरू करना चाहता ही था कि काले रंग का विदेशी नस्ल वाला कुत्ता उन पर टूट पड़ा। शर्मा जी घबरा कर धड़ाम से शेयरों की भांति औन्धे मुंह गिर पड़े और कुत्ते ने उनकी पींडी का रसास्वादन कर लिया। उनकी यह हालत देख कर बॉस भी घबरा गए, थोड़ी सहानुभूति दिखलाते हुए बॉस बोले उठिए, डरिये नहीं हम आपको डॉक्टर के पास लिए चलते हैं। कुछ नहीं हुआ …थोड़ासा दांतों का निशान लगा है।
पास ही की डिस्पेंसरी में बॉस ने शर्मा जी का प्राथमिक इलाज करवाया और उनको घर तक छोड़ने गए। थोड़े दुखी हो कर बोले – शर्माजी जल्द ठीक हो जाएँगे, घबराइये नहीं….और हाँ, आज ऑफिस न आना, घर पर ही आराम करियेगा। कोई भी बात हो तो हमें बताइयेगा, हम हैं न ! और हाँ, ऑफिस में इस बात का जिक्र न करना कि आपको हमारे कुत्ते ने काट लिया था।” बॉस के इस कातर भाव को देख शर्मा जी उनके चरणस्पर्श कर बोले प्रभु , क्यूँ इस नाचीज का भाव बढा रहे हैं…हम तो आपकी चरणों की धूल हैं, ये बंदा मर भी गया तो भी ये राज साथ ले कर ही जाएगा !”
उधर, दफ्तर में शर्मा जी की खाली कुर्सी देख कर बाकी चमचों के दिल में हलचल शुरू हो गई थी। आखिर जो बंदा फेविकोल डालकर सीट से चिपका रहता था वह दो दिन से ऑफिस क्यूँ नहीं आया ?” प्रश्न का उत्तर ढूंढा जाने लगा तभी कुछ लंगड़ाते हुए शर्मा जी का आगमन हुआ। सारे साथी आसपास इकट्ठे हो कर हाल पूछने लगे, चाल तो देख ही ली थी। फिर क्या था ? शर्मा जी बॉस की तारीफ के पुल बाँधने लगे। उनकी मानवीयता और संवेदनशीलता के यशोगान से ऑफिस गूँजने लगा। चमचागिरी की इन्तहा देख कर आखिर बाॅस का पत्थर- सा दिल मोम-सा पिघल गया। बॉस का मिजाज अब मौसम की तरह बदलने लगा .
चमचों के सेवा भाव (?) को देखकर एक दिन बॉस ने ऑफिस के सभी अधिकारियों -कर्मचारियों को नए साल की पार्टी देने का निर्णय लिया। ऑफिस में किसी त्योहार – सी खुशी की लहर दौड़ गई। चमचा मंडली को तो ऐसा लग रहा था मानों घर बैठे ही महाकुम्भ में गंगा स्नान हो गया हो। सभी फूले नहीं समा रहे थे। पार्टी के लिए श्रद्धानुसार गिफ्ट खरीदने की होड़- सी भी लग रही थी। ……..आखिर पार्टी का दिन भी आ ही गया।
बाॅस के बंगलें में पार्टी की रंगत जमने लगी महिला समूह बॉस की पत्नी की तारीफ में मशगूल थीं, कोई उनकी तुलना ऐश्वर्या राय तो कोई हेमा मालिनी से कर रही थी। वहीं पुरुषवर्ग में हर कोई बॉस की प्रशंसा के कशीदे पढ़ रहा था। तभी अचानक बॉस का कुत्ता वहां आया तो शर्मा जी के होश उड़ गए …पर, कहते हैं कि कुत्ता एक बार किसी को सूँघ ले तो फिर उससे दोस्ताना व्यवहार भी करने लगता है।
बॉस ने अपने कुत्ते से प्यार से कहा- सेक हैण्ड, ये तो शर्मा अंकल हैं। और, देखते ही देखते कुत्ते का व्यवहार भी बॉस की तरह बदल गया। उसे भी अब चमचागिरी का महत्त्व समझ में आ गया था। कुत्ते ने शर्मा जी से सेक हैण्ड कर पूंछ हिलाई और उनकी गोद में चढ़ कर मुंह पर एक पप्पी भी दे डाली। इससे उपकृत शर्मा जी ने बड़े ही दया भाव से उसे पुचकारा और चमचागिरी की सभी सीमाएं लांघ कर बॉस की तरफ देख कर बोले- प्रभु, इतना प्यार तो टुल्लू (शर्मा जी का पुत्र) की मम्मी ने भी आज तक नहीं किया जैसा टाॅमी ने किया है।
माहौल ठहाकों से गूँज उठा और लोग बॉस की तारीफ के पुल बाँधने की होड़ में लगे रहे। अब मौसम की तरह बदलते मिजाज के बीच पार्टी में खड़े बॉस के चेहरे पर गुस्से की जगह गर्व का भाव तैरने लगा। वो बिन पिए ही झूमने लगे। जोश-जोश में बाॅस ने पूछा- हाउ इज द जोश? सभी अधिकारियों और कर्मचारियों ने समवेत स्वरों में जबाब दिया- हाई सर……… हाई सर… सर….. सर।
फोटो प्रतीकात्मक है