क्या भाजपा के ‘चुनावी दशहरे’ में रावण की जगह पाक ने ले ली है?

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अजय बोकिल

तो क्या भाजपा के ‘चुनावी दशहरे’ में रावण की जगह उस पाकिस्तान ने ली है, जिसके उल्लेख के बगैर, जिसे गरियाए बगैर और जिसे मारे बगैर कोई भी निर्वाचन अनुष्ठान अधूरा है? यह सवाल इसलिए भी कवायद कर रहा है कि चुनाव चाहे लोकसभा का हो, विधानसभा का हो, स्थानीय स्तर का हो या फिर उपचुनाव हो, पाकिस्तान नाम की पंजीरी फांके बिना चुनाव जीतने का भरोसा ही नहीं बन पाता। विजय का आत्म विश्वास ‘किक’ नहीं मार पाता। पिछले लोकसभा चुनाव में तो इस देश की पब्लिक पाकिस्तान नाम की रट को इसलिए भी पचा गई थी कि कुछ समय पहले ही पुलवामा में आंतकी हमला हुआ था और उसके बाद मोदी सरकार ने पाक के खिलाफ एयरस्ट्राइक की थी। फिर धारा 370 का मामला भी निपट गया। अब क्या है? भाजपा तो ठीक अब शिवसेना के नेता भी जनता को पाक का डर दिखा रहे हैं। इसमें संशोधन इतना है कि पाकिस्तान की जगह ‘पीअोके’ ने ली है।
पिछले दिनो हुए लोकसभा चुनाव के बाद देश में हो रहे राज्यो के चुनाव और उपचुनावों में चुनाव प्रचार की कुंडली बांचें तो यह बात बिल्कुल साफ हो जाएगी कि कमल को खिलने के लिए पाक नाम का दलदल होना अनिवार्य है। जरा हाल के भाजपा नेताअों के बयानों पर गौर करें। महाराष्ट्र में राकांपा नेता शरद पवार ने कश्मीर में धारा 370 हटाने का विरोध किया तो भाजपा नेताअों ने उन्हें पाकिस्तान भेजने की ‘नेक’ सलाह दे डाली। मप्र के झाबुआ विधानसभा उपचुनाव प्रचार के दौरान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और वरिष्ठ भाजपा नेता गोपाल भार्गव ने फरमाया कि यह उपचुनाव दरअसल हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच का चुनाव है। भाजपा प्रत्याशी हिंदुस्तान के प्रतिनिधि हैं तो कांग्रेस प्रत्याशी कांतिलाल भूरिया पाकिस्तान के। भार्गव के बयान में यह धमकी भी छिपी थी कि वोटर कांतिलाल को वोट देकर पाकिस्तान को न जिताएं। हालांकि भार्गव ने यह स्पष्ट नहीं किया कि खुदा न खास्ता कांतिलाल जीत गए तो झाबुआ के तमाम वोटरों को पाक भेजने की क्या व्यवस्था है ? गोपाल भार्गव के इस ‘पाक बम’ का धुआं छंटा भी नहीं था कि कर्नाटक में येदियुरप्पा सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री और भाजपा नेता ईश्वरप्पा ने दम दिया कि जो मुसलमान भाजपा को वोट नहीं देते वो गद्दार और पाकिस्तान समर्थक हैं। हालांकि उन्होंने विश्वास भी जताया कि राष्ट्रभक्त मुसलमान बीजेपी को ही वोट करेंगे। शिवसेना के युवा नेता और पहली बार विधानसभा चुनाव मैदान में उतरे आदित्य ठाकरे ने तो ‘पाक पुराण’ के अखंड पाठ में भाजपाइयों को भी पीछे छोड़ दिया। मुंबई के आरे में जारी बेरहम वृक्ष कटाई के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को धमकाते हुए आदित्य ने कहा कि चुनाव बाद सत्ता में आते ही हम आरे में चोरों की तरह पेड़ काटने वाले अधिकारियों को पीअोके ( पाक ‍अधिकृत कश्मीर) भेज देंगे। गोया पीअोके मुंबई महापालिका का कोई वार्ड हो। इससे ज्यादा गजब तब हुआ, जब पिछले दिनो एक वायरल हुए एक वीडियो में पाकिस्तान के बलू‍चिस्तान में भाजपा का दफ्त र खुलने की खुशी में कुछ बुर्काधारी महिलाएं नाच रही थीं। एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने अपनी पार्टी की ‘उपलब्धि’ को इस खुशी में वायरल कर डाला कि भगवा झकोरे हरित हवाअों पर भारी पड़ रहे हैं। बाद में खुलासा हुआ कि अति उत्साह में ( या जानबूझकर ?) शेयर किया गया यह वीडियो फर्जी था। जो बुर्काधारी महिलाएं कमल निशान के परचम पर झूम रही थीं, वो दरअसल लोकसभा चुनाव में कश्मीर के अंनतनाग सीट पर भाजपा प्रत्याशी के पर्चा दाखिल करने के मौके पर नाच गा रही थीं।
यहां सवाल यह है कि क्या अब भाजपा और उसकी सहयोगी‍ शिव सेना जैसी पार्टियों को चुनाव जीतने के लिए पाकिस्तान नाम का गुटखा फांकना हर हाल में जरूरी है? क्या इसके बिना चुनावी खिचड़ी पक नहीं सकती? क्या पाकिस्तान से नफरत करते-करते बीजेपी और शिवसेना उससे इतनी ‘मुहब्बत’ करने लगे हैं कि ऐसे महबूब का जिक्र किए बगैर चुनावी वैतरणी पार करने का भरोसा नहीं रहा। देशद्रोहियों को पाकिस्तान भेजने की रिवायती धमकी के बाद अब ‘गुनहगार’ भारतीय अफसरों की पीअोके रवानगी नया एंगल है। क्यों‍कि जिस पीअोके को कब्जाने की बात आए दिन की जा रही है, वह अगर कुम्भीपाक नर्क है तो हम उसे भारत में क्यों मिलाना चाहते हैं? और फिर मुंबई के आरे में पेड़ काटने की सजा पीअोके के मुजफ्फराबाद भेजकर कैसे दी जा सकती है? या फिर आदित्य ठाकरे ने अपना कोई ‘सुधार केन्द्र’ पीअोके में खोल लिया है, जहां प्रताड़ना योग्य बीएमसी अफसरों को भेजा जाएगा?
इस ‘पाक प्रेम’ की तह में जाएं तो लगता है ‘पाकिस्तान’ नाम में भाजपाइयों ने चुनावी जीत का वह तत्व खोज लिया है, जो कभी रामनामी माला जपने से सिद्ध हुआ करता था। वरना कोई कारण नहीं कि भारत में पंचायत चुनाव में भी वोट पाने के लिए ‘शोले’ के गब्बरसिंह की तरह पाकिस्तान का डर दिखाया जाए। क्या भाजपा नेताअोंको यह लगने लगा है कि हिंदुस्तान में चुनाव पाकिस्तान के भरोसे ही जीता जा सकता है? लेकिन इतना भरोसा तो पाकिस्तानी वोटरो ने हिंदुस्तान को गरियाने पर भी नहीं किया। क्या ‘पंचामृत’ में अब वो असर नहीं रहा कि हर पंगत में ‘पाक’ नाम का कांदा फोड़ना अनिवार्य है ? और फिर हर चुनाव अगर पाकिस्तान के भरोसे ही लड़ना है तो फिर भारत में चुनाव लड़ने की भी क्या जरूरत है?
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