आयकर में भी राहत दे सरकार

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रवीन्द्र वाजपेयी

रिजर्व बैंक ने गत दिवस एक बार फिर कर्ज सस्ता कर दिया। शशिकांत दास के गवर्नर बनने के बाद से लगातार पांच समीक्षाओं में ब्याज दर घटाई गई। लेकिन अधिकतर बैंकों ने इसमें भांजी मार दी तथा उसका पूरा लाभ ग्राहकों को नहीं दिया। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा और घटी हुई ब्याज दर का समुचित लाभ तत्काल प्रभाव से कर्ज लेने वाले ग्राहकों तक पहुंच सकेगा। ऐसा करने के पीछे रिजर्व बैंक का उद्देश्य बाजार में नगदी की उपलब्धता बढ़ाकर आर्थिक सुस्ती को दूर करना है। श्री दास के पूर्ववर्ती गवर्नरों ने मुद्रा स्फीति को रोककर महंगाई पर लगाम लगाने के लिए ब्याज दरों में कमी नहीं करने की जो जिद ठान रखी थी उसकी वजह से बाजार में सुस्ती बढ़ती गयी जिसके परिणामस्वरूप भारतीय उद्योग वैश्विक प्रतिस्पर्धा में नहीं टिक सके। वर्तमान हालात अचानक पैदा नहीं हुए। रिजर्व बैंक की स्वायत्तता निश्चित तौर पर जरूरी है लेकिन वह स्वेच्छाचारिता की स्थिति तक चली जाए, ये भी उचित नहीं है। रघुराम राजन ने उस दृष्टि से अर्थव्यवस्था को पटरी से उतारने में बड़ी भूमिका निबाही। कई अवसरों पर तो लगा मानों वे किसी और के इशारों पर चलते हुए सरकार के लिए मुसीबतें पैदा कर रहे हों। उनके बाद आये गवर्नर भी बहुत संतुष्ट नहीं कर सके। इस सबसे परेशान होकर ही जब केंद्र सरकार ने श्री दास को रिजर्व बैंक की कमान सौंपी तब ये आरोप लगा कि प्रधानमंत्री ने अपने आज्ञाकारी अधिकारी को बिठाकर देश के केन्द्रीय बैंक को भी सरकारी नियंत्रण में ले लिया है। बीच में उससे अतिरिक्त लाभांश वसूलने पर भी खूब बवाल मचा। लेकिन श्री दास के आने के बाद कम से कम एक काम तो अच्छा हुआ कि केंद्र सरकार और केन्द्रीय बैंक के बीच आये दिन होने वाली खींचातानी बंद हो गई और वह अर्थव्यवस्था की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए व्यवहारिक फैसले लेने लगा। पिछली पांच बैठकों में ब्याज दर कुल 1.35 फीसदी कम होने से बीते दस साल के न्यूनतम स्तर 5.15 प्रतिशत पर आ गयी जो उत्साहजनक है। पिछले गवर्नरों को दरें घटाने से महंगाई बढऩे का डर सताया करता था किन्तु अभी तक के अनुमानों के अनुसार उसके 3.7 प्रतिशत से ज्यादा नहीं रहने से चिंता का कोई कारण नहीं रहेगा। हालांकि शेयर बाजार में ब्याज दर घटने के बाद भी गिरावट देखी गई लेकिन उसका मुख्य कारण मनोवैज्ञानिक था क्योंकि रिजर्व बैंक ने वार्षिक विकास दर के अनुमान को घटाकर 6.1 फीसदी कर दिया। चूंकि घटी हुई ब्याज दरों का असर आने में कुछ समय लगता है इसलिए माना जा सकता है कि दीपावली के दौरान न सही लेकिन उसके बाद इसका अनुकूल प्रभाव अवश्य पड़ेगा। बारीकी में जाने पर ये लगता है कि रिजर्व बैंक को ब्याज दर में कम से कम एक फीसदी की कमी अभी और करनी चाहिए जिससे हमारे उत्पादन सस्ते होकर चीन से आयातित उपभोक्ता वस्तुओं का मुकाबला कर सकें। दूसरी बेहद महत्वपूर्ण बात गृह निर्माण क्षेत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की है। अधो संरचना (इन्फ्रा स्ट्रक्चर) के बाद इसी क्षेत्र पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाना जरूरी है। जहां तक बात ऑटोमोबाईल उद्योग में मंदी की है तो वह उतनी चिंता का विषय नहीं है लेकिन गृह निर्माण को यदि और सहूलियतें तथा रियायतें मिलें तो औद्योगिक गतिविधियों में स्वाभाविक तेजी आ जायेगी। उल्लेखनीय है कि यह ऐसा क्षेत्र है जिसमें छोटी से बड़ी सैकड़ों चीजों का इस्तेमाल होने के साथ बड़ी मात्रा में रोजगार का सृजन होता है। बताने की जरूरत नहीं है कि खेती के बाद सबसे ज्यादा श्रमिक निर्माण गतिविधियों में ही लगते हैं। ग्रामीण इलाकों से शहरों में काम की तलाश में गए अकुशल श्रमिक को निर्माण कार्यों में ही रोजी-रोटी का साधन मिलता है लेकिन इसके लिए सरकार को न्यूनतम मजदूरी के नियमों में व्यवहारिकता लाने के साथ ही श्रम कानूनों में नौकरशाही की तानाशाही दूर करनी होगी। अर्थव्यवस्था को लेकर मंडरा रहे चिंता के बादलों के बीच अच्छी खबर ये है कि भरपूर मानसूनी वर्षा के कारण खरीफ की अच्छी फसल आने वाली है जिसकी वजह से सितम्बर से दिसम्बर की तिमाही में आर्थिक विकास दर की गिरावट का क्रम सुधरेगा। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार अतिरिक्त वर्षा से जमीन के भीतर विद्यमान नमी से रबी फसल को भी जबर्दस्त फायदा होने की उम्मीद बढ़ी है। हालाँकि ये कहना जल्दबाजी होगी कि वर्तमान वित्तीय वर्ष में अर्थव्यवस्था छलांगें लगाने की स्थिति में लौट आयेगी लेकिन सरकार और रिजर्व बैंक के बीच अच्छे तालमेल से ये जरुर लगने लगा है कि सही समय पर जरूरी फैसले लिये जा सकेंगे। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने बीते दिनों जो रियायतें दीं उनसे जो उम्मीद जगी उसमें रिजर्व बैंक के ताजा फैसले से और वृद्धि हुई। लेकिन सरकार के पास विशेषज्ञ समिति की जो रिपोर्ट आई है उसके अनुसार आयकर की दरें कम करने का निर्णय लेना भी अच्छा उपाय होगा क्योंकि देश के मध्यम वर्ग के पास पैसा होने पर ही बाजार में रौनक दिखाई देती है। वैसे प्रधानमन्त्री को अपनी पार्टी के सांसद डा. सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा आयकर समाप्त करने के सुझाव पर भी विचार करना चाहिए क्योंकि यह भारत में भ्रष्टाचार, कर अपवंचन और काले धन के सृजन का सबसे बड़ा कारण है। हो सकता है वे इस निर्णय को भविष्य के लिए बचाकर रखे हों किन्तु बेहतर होगा इसे जल्द से जल्द प्रभावशील किया जाए। चाहें तो इस मुद्दे पर राष्ट्रीय बहस चलाकर जनमत भी लिया जा सकता है। रिजर्व बैंक के ताजा निर्णय से अर्थव्यवस्था की सुस्ती दूर हो न हो लेकिन लोगों में ये भरोसा जरुर जागेगा कि उनकी आवाज पर ध्यान दिया जा रहा है। वैसे ये सब यही समय रहते कर लिया जाता तो अच्छे दिन के लिए इन्तजार और आगे नहीं बढ़ता।