बिहार में कुदरती बाढ़ के साथ सियासी बाढ़ में फंसे नीतीश कुमार….

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अजय बोकिल,
आज जब पूर्वोत्तर भारत दुर्गा पूजा की तैयारियों में डूबा है, तब बिहार भयंकर बारिश और बाढ़ में कराह रहा है। वहां इन दिनो पूजा पंडालों की रौनक से ज्यादा चारों अोर पानी के रौद्र रूप के नजारे हैं। तकरीबन आधा बिहार बाढ़ की चपेट में है। इसमे अब तक 42 लोग जानें गवां चुके हैं। राजधानी पटना में मंत्रियों के बंगले तक पानी में डूब गए हैं। शहर की कई बस्तियों में हाहाकार मचा है। मुख्युमंत्री नीतीश कुमार बाढ़ राहत कार्यों के तमाम दावों के बावजूद राजनीतिक दलों और जनता के निशाने पर हैं। बाढ़ की ‍ उनके चेहरे पर भी तैरती दिखती है। मगर इस प्राकृतिक बाढ़ के समांतर राज्य में राजनीति की बाढ़ भी आई हुई है। विपक्ष तो नीतीश कुमार को कोस ही रहा है, राज्य की सत्ता में पार्टनर भाजपा के नेता भी नीतीश कुमार को गरियाने और ऊलजलूल बयान देने में लगे हैं। केन्द्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने बिहारवासियों को बताया कि इतनी भयंकर बारिश के लिए हथिया नक्षत्र जिम्मेदार है तो बिहार भाजपा प्रदेशाध्यक्ष
संजय जायसवाल ने पटना में बाढ़ और जलभराव के लिए प्रशासनिक नाकामी का आरोप लगाया है। इसी के साथ वहां सत्तारूढ़ जद यू और विपक्षी राजद में पोस्टर वाॅर भी शुरू हो गया है। राजद ने नीतीश कुमार के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि ‘क्यों न करें विचार, बिहार जो है बीमार।‘
यहां विचार का असल मुद्दा तो बिहार पर कुदरत की वक्र दृष्टि और वहां की सियासी फितरत है। यूं बिहार में बाढ़ आना नई बात नहीं है। अभी तो गंगा की उफनती लहरें पटना शहर में घुस गई हैं, लेकिन राज्य की कोसी और गंडक नदियां अक्सर अपने साथ कयामत लेकर आती हैं। इतना होने के बाद भी बिहार में ज्यादा कुछ बदलता है, ऐसा नहीं लगता। लोग प्राकृतिक, राजनीतिक और सामाजिक प्रकोपों का सामना करते रहते हैं और उन्हें सहते रहते हैं। राज किसी का हो, बिहार तकरीबन वहीं रहता है। इस बार भी इंद्र देवता के कोप से लगभग पूरा बिहार कराह रहा है। जीवन का पर्याय पानी वहां मौत की हुंकार भर रहा है। आम बिहारी समझ नहीं पा रहा है कि अ‍ाखिर क्या करें, कहां जाएं? लोग पूछ रहे हैं कि कयामत के इस माहौल में सरकार कहां है? प्रशासन कहां है? डूबतों को बचाने वाले हाथ और सांत्वना देने वाले स्वर कहां हैं? मानो राज्य में सुशासन के सारे दावे बाढ़ में बह गए हैं। यूं कहने को बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्य चल रहे हैं, लेकिन उनसे किसी को राहत मिल रही है, ऐसा नहीं लग रहा। बाढ़ के हफ्ते भर बाद जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बाढ़ का मुआयना करने निकले और मीडिया के सवालों पर बुरी तरह बौखला उठे।
हैरानी की बात यह है कि बेहद तनाव और असहायता के इस माहौल में भी बिहार के राजनेता अपना काम ‘बेखौफ’ ढंग से कर रहे हैं बजाय पीडि़तों को राहत पहुंचाने के। हालांकि केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने हाल में राज्य का दौरा कर बाढ़ सहायता का ऐलान किया है। लेकिन दूसरी तरफ पार्टी के नेता हास्यास्पद बयानबाजी से नहीं चूक रहे। बिहार के भाजपा नेता और केन्द्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने लोगों का ज्ञान यह कहकर बढ़ाया कि इस भारी वर्षा का कारण हथिया नक्षत्र है। यानी जब नक्षत्रों की ऐसी ही ‍इच्छा है तो कोई क्या कर सकता है। मलतब बिहार पहले भगवान भरोसे था, अब नक्षत्रों के भरोसे है। हथिया नक्षत्र बोले तो ज्योतिष में उल्लेखित 27 नक्षत्रों में से एक ‘हस्त नक्षत्र।‘ बिहारी में इसे ही हथिया कहते हैं। यह नक्षत्र अश्विन मास के अंतिम सप्ताह में होता है। इसका किसानों को इंतजार रहता है। क्योंकि इस नक्षत्र में हुई बारिश फसलों के लिए शुभ मानी जाती है। लेकिन यही नक्षत्र इस बार बिहारियों के लिए अभिशाप बन गया है। उधर मौसम विभाग का कहना है कि पूरे देश में ही मानसून पैटर्न बदल रहा है। बिहार में हो रही जबर्दस्त बारिश के पीछे बंगाल की खाड़ी, झारखंड और गंगा क्षेत्र में बना साइक्लोनिक सर्कुलेशन है।
बहरहाल थोड़ी देर के लिए राज्य में बारिश की वजह हथिया नक्षत्र को मान लें तो भी इन सवालों के जवाब किसी के पास नहीं हैं कि जिस राज्य में बाढ़ आना कोई अभूतपूर्व घटना नहीं है, वहां राहत, बचाव और पुनर्वास के पर्याप्त इंतजाम और रोड मैप क्यों नहीं हैं? और इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है? जब यही सवाल मुख्यकमंत्री नीतिश कुमार से ‍ गए तो वो बाढ़ में भी उबल पड़े। उन्होंने यह जताने की ‍कोशिश की ‍कि बाढ़ की आड़ में उन्हें और उनकी सरकार को भी बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। ज्यादा तकलीफ इस बात की है कि दो साल से राज्य में सत्ता की मलाई में हिस्सेदारी कर रही भाजपा भी जल प्रलय के इस माहौल में उन्हें अकेला छोड़कर खुद सु‍रक्षित किनारे तलाश रही है। बिहार प्रदेश भाजपा अध्य्क्ष संजय जायसवाल ने सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट में लिखा कि पटना में 24 घंटे बारिश रुक जाने के बाद भी पानी का नहीं निकलना, यह बताता है कि प्रशासनिक लापरवाही जरूर हुई है। इसके लिए जो दोषी हैं, उन पर कार्रवाई होनी चाहिए। इसका सीधा अर्थ है कि भाजपा बाढ़ के निपटने में अक्षमता का पूरा ठीकरा नी‍तीश कुमार के सिर फोड़ना चाहती है और खुद को पाक साफ दिखाना चाहती है। कारण राज्य में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी ने अभी से पोजिशनिंग शुरू कर दी है। यानी राज्य में विपक्ष को ‘पापी’ बताने वाली भाजपा खुद सरकार के ‘पाप’ में भागीदार नहीं होना चाहती। आश्चर्य नहीं कि अगले चुनाव में बीजेपी नीतीश को इसी बाढ़ में अकेला छोड़कर अपनी नाव अलग चलाने लगे।
इससे भी ज्यादा हैरानी बाढ़ की विभीषिका के बीच सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच चले पोस्टर वाॅर को लेकर है। पिछले दिनो (बाढ़ से पहले) राज्य में विरोधी राष्ट्रीय जनता दल ( राजद) ने प्रदेश की बदतर होती कानून व्यवस्था और नीतीश कुमार के नेतृत्व को लेकर सवाल उठाए थे। जवाब में जदयू ने नीतीश का बचाव करते हुए पोस्टर लगवाए कि ‘क्यों करे विचार, ठीके तो है नीतीश कुमार।‘ लेकिन अब बाढ़ के कहर ने राजद का पानी भी चढ़ा दिया है। उसने पटना में अपने दफ्तार पर जवाबी पोस्टर लगवाया कि ‘ क्यों न करें विचार, बिहार जो है बीमार।’ उधर अश्विनी चौबे के हथिया फैक्टर पर हमला करते हुए राजद नेता तेजस्वी यादव ने तंजिया ट्वीट किया कि पटना शहर में पिछले 15 साल से मेयर, सभी विधायक और सांसद बीजेपी के हैं। राज्य में 15 साल से एनडीए की सरकार है। ऐसे में अब जलभराव के लिए नीतीश कुमार, सुशील कुमार मोदी को मुगल, जवाहरलाल नेहरू, लालू यादव, मौसम, प्रकृति और नक्षत्र को दोष देना चाहिए। बेशक बाढ़ का मुख्यत कारण तो अति वर्षा है, लेकिन परस्पर राजनीतिक दोषारोपण की बाढ़ के लिए तो खुद नेता ही जिम्मेदार हैं। इस बार बारिश का कहर दूसरे राज्यों में भी हुआ, लेकिन वहां तुलनात्मक रूप से नेताअों ने सियासी कहर ढाने से खुद को संयमित रखा। क्योंकि यह काम तो बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी हो सकता है और होता भी है। लेकिन यह बिहार है, जहां सवाल भी नी‍तीशे कुमार हैं और जवाब भी नीतीशे कुमार हैं।
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