क्या कोई हाई कोर्ट यमराज को निर्देश दे सकता है?

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अजय बोकिल

पौराणिक कथा है कि मृत्यु के देवता यमराज ने सावित्री के पतिव्रत और बुद्धिमत्ता के आगे विवश होकर उसके पति सत्यवान को स्वर्ग ले जाते समय बीच में ही पृथ्वीत पर सशरीर लौटा दिया था, लेकिन क्या यमराज किसी ऐसे अपराधी को, जो तयशुदा सजा भुगतने के पहले ही ऊपर चला गया हो, निर्धारित सजा पूरी करने के लिए यमलोक से वापस पृथ्वीलोक भेज सकते हैं? और यदि वो ऐसा नहीं करते तो क्या उनके खिलाफ किसी ऐहिक अदालत में मानहानि का मुकदमा चलाया जा सकता है ? ये सवाल कोलकाता हाईकोर्ट में दायर एक अजीबोगरीब याचिका के बाद उठ रहे हैं, जिसमे याचिकाकर्ता ने कोर्ट से यमराज को निर्देश देने का निवेदन‍ किया है। अब हाई कोर्ट इस मामले में क्या करेगा, कहना मुश्किल है। इससे भी अहम सवाल यह है कि क्या अदालत ऐसे मामले में कुछ कर भी सकती है या नहीं, सिवाय ऐसी याचिकाअों को मूर्खतापूर्ण और समय की बर्बादी करने वाली मानकर खारिज करने के।
पहले पूरा मामला समझ लें। आज से 35 साल पहले 1984 में कोलकाता के पास गरूलिया इलाके के ‍निवासी समर चौधरी और उनके दो बेटों ईश्वर और प्रदीप की किसी के साथ मारपीट हुई थी। इस दौरान एक शख्स की मौत हो गई। तीन साल तक मामला कोर्ट में चला। अलीपुर कोर्ट के अतिरिक्त जज ने हत्या के इस मामले में तीनो आरोपियों को 5-5 साल की जेल की सजा सुनाई। इसके खिलाफ आरोपियो ने हाईकोर्ट ने अपील की और हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश देकर दोनो की सजा पर रोक लगा दी।
अपील पर हाई कोर्ट में सुनवाई शुरू होती, इसके पहले दो आरोपियों पिता समर और बेटे प्रदीप की मौत हो गई। साथ ही मामले की सुनवाई कर रहे आरोपी पक्ष के वकील की हाई कोर्ट जज के रूप में तैनाती हो गई। इस कारण आरोपी पक्ष कोर्ट को यह नहीं बता पाया कि इस मामले के तीन में से दो आरोपी यमलोक सिधार चुके हैं। बाद में कोर्ट ने आरोपियों की अपील खारिज कर दी। इसके बाद मृत आरोपी प्रदीप की विधवा तथा समर की बहू रेनू ने हाई कोर्ट में आवेदन देकर प्रार्थना की कि कोर्ट यमराज को निर्देश दे कि वह दोनों आरोपियों ( समर व प्रदीप ) को पृथ्वी पर वापस भेजें ताकि वे दोनों कोर्ट द्वारा मुकर्रर सजा पूरी करें। उन्होंने आगे कहा कि अगर यमराज ऐसा नहीं करते ( अर्थात कोर्ट का आदेश नहीं मानते) तो उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू की जाए।
इस आवेदन को आप न्याय और दंड प्रक्रिया के पूरी तरह पालन के अडिग आग्रह या दैवी व्यवस्था को भी देश के कानून के तहत लाने के दुराग्रह के रूप में देख सकते हैं या फिर न्यायपालन की शेखचिल्ली टाइप जिद के रूप में भी देख सकते हैं। आखिर कोई भी कोर्ट मानव निर्मित व्यवस्थाअों के तहत ही काम करता है, कर सकता है, देवताअों को आदेश वह कैसे, कहां और किस अधिकार से आदेश दे सकता है?
थोड़ी देर के लिए मान भी लें कि कोर्ट के लिए यह संभव है तो फिर यह सवाल कि कैसे है? सबसे पहले तो याचिकाकर्ता यह माने बैठे हैं कि स्वर्ग ( वो जहां भी है) की व्यवस्थाएं और तं‍त्र हिंदू धार्मिक मान्यताअों के ‍ से ही चल रही हैं। याचिकाकर्ता परिजन यह भी माने बैठे हैं कि दोनो सजायाफ्ता आरोपी यहां सजा काटने के पहले ही यमराज के पास यमलोक में चले गए हैं। इसका मतलब वहां के रिकाॅर्ड में कुछ गड़बड़ी है वरना यहां पूरी सजा भुगते बगैर यमदूत उन्हें अपने साथ कैसे ले गए? क्या आरोपी और यमदूतों के बीच कोई सेटिंग हो गई थी या फिर भारत की जेलों से बचने के लिए मेहुल चोकसी की तरह उन्होंने वहां डायरेक्ट एंट्री ले ली थी? अगर यमराज के रिकाॅर्ड में दोनो के पापों और उनकी सजाअों की सही एंट्री थी तो धरती पर दंड पूरा भुगते बगैर उनको नर्क में जगह कैसे मिल गई?
इसमें एक पेंच और भी है। हिंदू धर्म में मृत्यु के देवता भले यम हों, लेकिन न्याय विभाग का जिम्मा शनि देव के पास हैं। यानी दंड शनि देंगे, लेकिन उसका पालन यम के जिम्मे है। हालांकि दोनो ही सूर्य पुत्र हैं। इस हिसाब से यम के आॅर्डर के खिलाफ शनि के यहां अपील होनी चाहिए थी। लेकिन याचिकाकर्ता ने अगर यमराज को ही निर्देश देने की प्रार्थना कोर्ट से ही है तो शायद यह सोचकर की होगी कि जिस तरह उन्होंने सावित्री की तपस्या और जिद से खुश होकर सत्यवान को यमलोक से वापस पृथ्वी पर ट्रांसफर कर ‍ था, उसी तरह वो समर और प्रदीप की आत्माअोंको भी वापस जेल भेज देंगे। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा है कि अगर यमराज हाईकोर्ट के आदेश को न माने तो यहां उनपर कोर्ट की अवमानना का मुकदमा कायम किया जाए।
अब सवाल यह है कि क्या यमराज पर इस देश का कानून लागू होता है? यम तो न्यायाधीशों के पाप-पुण्य का भी रिकाॅर्ड रखते हैं। ऐसे में वो यहां के जजों का आदेश क्यों मानने लगे? किसी लिहाज में अगर मान भी गए तो पृथ्वीे पर लौटे आरोपियों का स्टेटस क्या होगा? यमलोकवासी या पृथ्वीवासी? एक फर्क और है सत्यवान तो धर्मात्मा थे, जबकि मृतक समर और प्रदीप पर हिंसा का आरोप था। और फिर अपराधियों को सजा देने के लिए खुद यमराज के पास खुद अपना बहुत बड़ा और भयानक डिपार्टमेंट है। पांच साल यहां की जेल में रोटी तोड़ने के लिए वो दोनो मृतात्माअोंको धरती पर अटैच क्यों करेंगे?
कुल मिलाकर यह पूरा मामला ही हास्यास्पद है। यह याचिका लगाने का असली मकसद क्या है? कोर्ट का वक्त खराब करना, पब्लिक को मूर्ख साबित करना या अंधविश्वास को बढ़ावा देना? यह जानते हुए भी मरने के बाद कौन कहां जाता है, क्या करता है, कल्पना के खेल ज्यादा हैं, बजाए किसी तार्किक आधार के। वैसे यमराज तो धर्मराज भी हैं। लेकिन ऐसा कोई केस शायद उनके सामने भी पहली बार ही आएगा, जब पाप-पुण्य के हिसाब से इंसानों को सजाएं सुनाते-सुनाते उन्हें खुद अपनी मानहानि और धर्मरक्षा के बारे में सोचना पड़े।