मनुष्यता की वो तस्वीरें जिनसे गांधीवाद का कोलाज बनता है…!

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अजय बोकिल
महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती पर एक सहज सवाल कि आखिर गांधी बनते कैसे हैं? कौन सा तत्व और सत्व है, जो एक आम इंसान को भी गांधी में रूपांतरित करता है, कर सकता है। कौन सी साधना है, जो गांधीत्व तक ले जाती है और गांधी बनने की पहली पायदान क्या है? काफी सोचने पर एक उत्तर उभरा कि गांधीवाद जैसे भारी-भरकम शब्द में उलझने के बजाए समाज में बिखरी उन सकारात्मक तस्वीरों को देखें, जिनसे मानवता का कोलाज बनता है। ये तस्वीरें भी उस क्षेत्रों की हैं, जिन्हें भारतीय संदर्भ में ‘राज’ करने के तौर पर देखा जाता है। बरसों की सामंती सोच का यह नतीजा है कि अफसरी का मतलब या तो प्रजा की छाती पर मूंग दलना है या उसे हांकना है। लेकिन इसी देश और समाज की कुछ तस्वीरें हमे इस घटाटोप में भी आश्वस्त करती हैं।
पहला उदाहरण मप्र के सागर जिले की युवा कलेक्टर प्रीति मैथिल का है। एक गरीब बच्ची को मंदिर की दान पेटी से 250 रू. चुराने के आरोप में गिरफ्तासर कर बाल सम्प्रेक्षण गृह भेज दिया गया। दूसरे दिन जिला अदालत से उसकी जमानत हुई। कलेक्टर प्रीति ने उस बालिका की जमानत कराने में मदद की और उसे रेडक्राॅस से 10 हजार रू. भी दिलवाए। क्योंकि वह उस बच्ची का दर्द समझती थीं। बच्ची चोरी करने पर भी इसलिए मजबूर हुई कि पिता ने जो गेहूं चक्की पर पिसवाने के लिए दिया था, बेईमान चक्की वाले ने उसे भी बेच खाया। फिर घर में दाना कहां से आता। विवश बालिका ने भगवान के घर में चोरी की और उस पैसे से दो जून के लिए गेहूं खरीदा। उस बेबस बालिका को प्री‍ति ने सहारा दिया।
ऐसे ही एक और आईएएस अधिकारी स्वरोचित सोमवंशी ने मप्र के उमरिया जिले में बतौर कलेक्टर पिछले दिनो बाल पोषण पुनर्वास केन्द्र में भर्ती और गर्मी से बेहाल बच्चों को राहत पहुंचाने के लिए अपने चेम्बर में लगे चारों एसी निकलवा कर पुनर्वास केन्द्र में लगवा दिए। बिना यह सोचे कि इस भीषण गर्मी में अपना क्या होगा। राजस्थान के बूंदी जिला अस्पताल में ब्लड बैंक में खून की कमी को देखते हुए वहां की तत्कालीन कलेक्टर रूक्मणी रियार ने खुद रक्तदान की शुरूआत की। मेघालय में तैनात एक आईएएस अफसर रामसिंह घर की सब्जी खरीदने 10 किमी तक पैदल जाते हैं और खुद ही सब्जी लाद कर लाते हैं। साइकिल चलाते हैं और कई बार खुद लोगों के साथ दौड़ते हैं। मणिपुर के एक युवा आईएएस अधिकारी आर्मस्ट्रांग ने सरकार से कोई मदद लिए बिना ही सौ किमी की सड़क बनवा दी। आर्मस्ट्रांग ने इस काम के लिए अपनी तरफ से 5 लाख रू. मिलाए और बाकी के लिए लोगों से सोशल मीडिया पर चंदा मांगा। उनकी भावना को समझते हुए लोगों ने मदद शुरू कर दी। खुद आर्मस्ट्रांग की मां ने अपनी पेंशन के 5 हजार भी सड़क बनाने के लिए दे दिए। आखिर सड़क बन गईं और उस पर खुशियों ने चलना शुरू कर ‍िदया। यूपी के बलरामपुर जिले में नियुक्त आईएएस अधिकारी अवनीश शरण ने अपने बच्चों को भी आम लोगों की तरह सरकारी स्कूल में डाला ताकि वो जीवन की सही शिक्षा ले सकें और इसी वजह से सरकारी स्कूल में कुछ सुधार हो सके। केरल के त्रिशूर में एक महिला वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अपर्णा लवकुमार ने अपना सिर मुंडवा कर सारे बाल कैंसर मरीजो के विग बनाने के लिए दान में दे दिए। इसके पहले एक बार उन्होंने अस्पताल से अपने बच्चे का शव ले जाने के लिए पैसों का इंतजाम नहीं कर पा रहे एक परिवार को अपने तीन सोने के कंगन दान कर दिए थे। इंदौर में एक आयकर अधिकारी शेरसिंह गिन्नौरे ने तो एक घायल सांप की जान बचाई।
ये चंद मिसालें हैं एक मैकेनिकल तं‍त्र में संवेदनाअों को बचाए रखने की। ऐसे कई तथा इससे भी बेहतर उदाहरण हो सकते हैं, जिन्हें पढ़कर कहा जा सकता है कि गांधी आज भी जिंदा हैं और समाज की किसी न किसी खिड़की से झांक रहे हैं। ये उदाहरण बताने का मकसद सिर्फ इतना है कि अफसरी और खासकर कलेक्टरी इस देश में सत्ता का साकार रूप है। जनता और सत्ता की समन्वय और विभाजन रेखा भी है। अवाम के बीच सरकार उसी के रूप में ‘व्यक्त’ होती है, महसूस होती है, प्रतीत होती है। लेकिन जब कोई कलेक्टर अफसरी का चोला उतारकर, दंडाधिकारी की मानसिकता त्यागकर मानवता का बाना पहन लेता है तो वह स्वत: गांधीवाद का अनुप्रयोग करने लगता है। । क्योंकि अफसरी सरकारी शब्दावली में भले ‘लोकसेवा’ हो, व्यवहार में वह मनुष्य मात्र पर शासन करना ही है। इसी कशमकश में से एक शीतल धारा न्याय और इंसानियत की भी निकलती है। इस धारा का प्राशन करने वाला व्यक्ति अधिकार पाकर भी असंवेदशील नहीं हो पाता। वह अपने आसपास के समाज से मानवीयता के वाय-फाय से कनेक्ट होता है, दुख-दर्द बांटने की दिल से कोशिश करता है। यह जानते हुए भी कि उसका मुख्यक कर्तव्य तो तंत्र को नियमित करना है।
इस अर्थ में गांधीवाद या गांधी विचार कोई निर्जीव पाठ्यक्रम नहीं है। वह एक निरंतर स्पंदित होने वाला विचार है और उसे कोई भी सह्रदयता तथा अडिग संकल्पशक्ति के साथ अपना सकता है। वास्तव में सत्ता के गुरूर से अलिप्त रहकर समाज और मानवता की सेवा ही गांधी दर्शन का व्यावहारिक और सगुण स्वरूप है। यही मानव धर्म भी है। ऐसे धर्म पर चलने के लिए इबादतगाह में नहीं जाना पड़ता। समाज के दुख-दर्द का निवारण, जीवन में सदविचार, सत्यनिष्ठा और सादगी ही इस मंदिर के देवता, आरती और घंटियां हैं। इस मंदिर में आराधना की पहली शर्त अपने आप के प्रति खरा होना है। पर पीड़ा को अपनी पीड़ा समझना है। गर्जमंद की मदद बिना अहंकार के करना है। अपनी अच्छाइयों की मार्केटिंग से पूरी तरह बचना है और गलतियों को खुले मन से स्वीकारना है। गांधी ने कहा था कि असल धार्मिक वही है, जो दूसरे का दर्द समझे और मानवता में अडिग‍ विश्वास रखे। खुद गांधी निडर इंसान थे, लेकिन एक बात से डरते थे। वो यह कि कहीं लोग उन्हें भगवान न बना दें। फिर भी अवाम ने उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ का दर्जा दिया। राष्ट्रकवि दिनकर के शब्दों में कहें तो ‘गांधी तूफान के पिता और बाजों के बाज थे, क्योंकि वे नीरवता की आवाज थे।‘
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