‘लंबे कुर्ते और शादी के रिश्ते’ के बीच कुछ अनसिले सवाल…

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अजय बोकिल

महिलाअों पर ड्रेस कोड लादना नई बात नहीं। अमूमन यह संस्कृति की रक्षा, सामाजिक मर्यादाअों तथा धार्मिक और नैतिक उसूलों के रैपर लिपटा होता है। कई बार इसका विरोध भी होता है। लेकिन हाल में हैदराबाद के एक मिशनरी काॅलेज ने काॅलेज छा‍त्राअों के लिए जो ड्रेस कोड लागू किया और जिस तर्क के साथ लागू किया, वह वाकई अनोखा था। हालांकि काॅलेज छात्राअों के कड़े प्रतिरोध के बाद अंतत: यह तुगलकी ड्रेस कोड वापस ले लिया गया। लेकिन यह सवाल अभी बाकी है कि ऐसे फितूर किस सोच और समझ की उपज होते हैं और इन पर अमल कर हम समाज को किस दिशा में और कहां ले जाना चाहते हैं ?
मामला हैदराबाद के बेगमपेट इलाके में स्थित एक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान सेंट फ्रांसिस काॅलेज फाॅर वूमेन का है। यह काॅलेज साठ वर्ष पुराना है और यहां चार हजार से अधिक छात्राएं पढ़ती हैं। इस काॅलेज से निकली कई छात्राअों ने विभिन्न क्षेत्रों में नाम कमाया। इसका संचालन कैथोलिक मिशन ‘सिस्टर आॅफ चैरिटी’ करती है। पिछले 1 अगस्त को काॅलेज प्रबंधन ने एक अजीब फरमान जारी किया। इसके मुताबिक छात्राअों के स्लीव-लेस कुर्ती, घुटने से ऊपर वाली शॉर्ट कुर्ती ( या कुर्ता), ऑफ शोल्डर कट जैसे कपड़े पहनकर काॅलेज आने पर रोक लगा दी गई। यह भी कहा गया कि अगर छात्राअों को काॅलेज आना है तो उनकी कुर्ती का साइज घुटने के नीचे तक होना चाहिए। इस नियम को सख्तील से लागू करने लड़कियों की कुर्ती की साइज नापने एक महिला सिक्योरिटी गार्ड को रखा गया। आदेश था कि जिसके ड्रेस से सिक्योरिटी गार्ड खुश नहीं, उसे कॉलेज में एंट्री नहीं मिलेगी। इससे भी अजीब वह तर्क था, जो प्रबंधन ने लंबी कुर्ती कोड लागू करने के पक्ष में दिया था। प्रबंधन के मुताबिक लंबी कुर्ती पहनने वाली लड़कियों को शादी के अच्छे प्रस्ताव मिलेंगे।
इस काॅलेज में महिला सिक्योरिटी गार्ड द्वारा छात्राअों की कुर्ती की लंबाई इंची टेप से नापने का एक वीडियो भी वायरल हुआ। जिसमे स्पष्ट था कि घुटने से नीचे वाली कुर्ती या समीज पहने छात्राओं को क्लास में जाने नहीं दिया जा रहा है। वीडियो वायरल होते ही काॅलेज की छात्राएं विरोध में सड़क पर उतर आईं। उनके हाथों में ‘से नो लांग कुर्ती, फ्री माय नीज, माय कुर्ती माय च्वाइस’ नारों वाली तख्तियां ले रखीं थीं। काॅलेज की पूर्व छात्राअों ने भी इस तुगलकी फरमान का सोशल मीडिया पर विरोध किया। सामाजिक स्तर भी इसकी व्यापक आलोचना हुई।
इस देश में ऐसे तालिबानी फरमान जारी होते रहते हैं, अमूमन उनका तगड़ा‍ विरोध होता है, फिर भी जब-तब ऐसी हरकतें होती रहती हैं। कभी धर्म के ठेकेदारी के नाम पर तो कभी नैतिक पुलिसिंग के नाम पर। संदर्भ विशेष में यह सही भी हो सकती है, लेकिन इसके मूल में ‘महिलाअोंको उनकी औकात मे रखने की’ पुरूष मानिसकता ज्यादा काम करती है। कहने को यह महिलाअों के शालीनता के दायरे में रहने की ‍हिदायत के रूप में होता है, लेकिन तय पुरूष ही करते हैं कि महिलाअोंकी ‘शालीन’ वेश भूषा क्या होनी चाहिए, किस कट और नाप की होनी चाहिए ? अक्सर इस सोच का पहला शिकार महिलाअों द्वारा पहने जाने वाले पश्चिमी परिधान होते हैं। आज भी कुछ संस्थानों में महिलाअों के जींस-टाॅप पहनने पर रोक है। इस आधार पर कि ये स्त्री शरीर के उभारों को ‘अश्लील’ ढंग से प्रदर्शित करते हैं। छात्राएं ही क्यों, मप्र सहित कुछ राज्यों में शिक्षक-शिक्षिकाअों के लिए भी ड्रेस कोड लागू किया गया था। तीन साल पहले मप्र में शिक्षकों के लिए ऐसी ड्रेस‍ डिजाइन की गई थी कि ‍िजससे वो ‘राष्ट्र निर्माता’ दिखें। पंजाब में पिछले दिनो शिक्षा महानिदेशक ने अध्यापिकाअों के स्कूल में जींस-टाॅप पहन कर स्कूल न आने का निर्देश जारी किया था। इस पर बवाल मचने की आशंका के मद्देनजर राज्य के शिक्षा मंत्री ने दूसरे दिन ही आदेश रद्द कर दो अफसरों को सस्पेंड कर दिया।
इस बात पर दो राय नहीं कि सार्वजनिक स्थलो पर चाहे महिला हो या पुरूष, पहनावे में शालीनता और सामाजिक मर्यादा का ध्यान रखा जाना चाहिए। क्यों‍कि यह कौन क्या पहने, इससे भी बड़ा तकाजा सामाजिक शिष्टता का है। जींस-टाॅप चूं‍कि अब एक काॅमन ड्रेस बन चुकी है, इसलिए उसे बैन करना सही है या नहीं, इस पर बहस हो सकती है। ले‍किन हैदराबाद के गर्ल्स काॅलेज में छोटी की जगह लंबी कुर्ती पहन कर आने के पीछे जो दलील दी गई वह वाकई में गजब थी। प्रबंधन का तर्क था कि यदि लड़कियां घुटने से नीचे तक लंबी कुर्ती पहन कर काॅलेज आएंगी तो उन्हें शादी के प्रस्ताव ( जल्द) ‍िमलेंगे। इसका अर्थ यह हुआ कि जो शाॅर्ट कुर्ती पहनेगी, उसे रिश्ते नहीं मिलेंगे। गोया शादी के प्रस्ताव किसी की कुर्ती की लंबाई देखकर ही दिए जाते हों। यह भी साफ नहीं है कि ऐसा कोई निष्कर्ष क्या किसी अध्ययन का नतीजा है? कुर्ती का लंबा या छोटा होना फैशन का हिस्सा है न कि मैरेज प्रपोजल का। शायद ही कोई लड़का किसी लड़की को इसलिए पसंद या नापसंद करता हो कि उसने किस लंबाई की कुर्ती पहनी है।
सोचने की बात यह है कि कुर्ती की लंबाई और मेरेज प्रपोजल के बीच क्या रिश्ता है? अगर है भी तो यह किसके गले उतरेगा? नैतिकता की नसीहतों से हटकर रिश्तों का कुर्ती कट एंगल किस सोच और समझ की उपज है? अगर काॅलेज के फरमान के मुताबिक सारी लड़कियां अगर लंबी कुर्तियां पहनने लगें तो क्या उन सबके लिए थोक में रिश्तों की बरसात शुरू हो जाएगी? दरअसल यह दलील ही अपने आप में हास्यास्पद है। खुद काॅलेज की छात्राअोंने भी इसे प्रबंधन के ‘अंधविश्वासी सोच का नमूना’ बताया। क्योंकि कपड़ो को लेकर काॅलेज की यह सोच है तो बाकी मामलो में क्या होगी, समझा जा सकता है।
यहां मुद्दा यह है कि शिक्षण संस्थानों में ‘समाज सुधार’ के नाम पर ऐसे बेहूदा प्रयोग क्यो होते हैं? हम समाज को आगे ले जाना चाहते हैं या पीछे ढकेलना चाहते हैं? वैसे भी ( कर्तव्य, कार्य स्थल, कड़े अनुशासन और समानता की मांग अगर नहीं है तो) ड्रेस कोड लागू करने उस पर तालिबानी अमल कराने में ऊर्जा खर्च करने का कोई मतलब नहीं है। और ‍फिर महज कपड़ों की स्टाइल से शादी के रिश्ते हो सकते तो पलवल से दिल्ली तक रेलवे ट्रेक के दोनो अोर ‘रिश्ते ही रिश्ते, एक बार मिल तो लें’ के विज्ञापन बेमानी हो जाते। अगर हैदराबाद के गर्ल्स काॅलेज का वह फरमान रद्द न होता तो ये विज्ञापन कुछ यूं भी हो सकता था- ‘कुर्ते ही कुर्ते, रिश्ते ही रिश्ते, एक बार मिल तो लें!’
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