चंद्रयान 2 = असली देशभक्त जानते है सच क्या है

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भूपेंद्र गुप्ता

वैज्ञानिक और सैन्य उपलब्धियों का राजनीतिकरण करते हुए इसका राजनीतिक लाभ से लेने की नई परंपरा सरकार ने शुरू की है। पूरी मुखरता से वैज्ञानिकों की उपलब्धियों का राजनीतिक लाभ उठाकर मसीहा बनने की प्रवृत्ति साफ साफ देखने को मिल रही है ।
चन्द्रयान 2 के लॉन्च को इवेन्ट बनाने के प्रयत्नों से यह जाहिर हो गया है जिस इसरो की आज लोग तारीफ कर रहे हैं उसकी स्थापना 16 फरवरी 1962 को पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इंडियन नेशनल कमेटी फार स्पेस रिसर्च के रूप में की थी। जिसे कालान्तर में 1969 में इंदिरा जी ने इसरो के रूप में संस्था का रूप दिया । हमें यह सोचना पड़ेगा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जब भारत में खाने के लिए गेहूं नहीं था पीएल 480 का मैक्सिकन लाल गेहूं देश को खाना पड़ता था तब उन्होंने ना केवल अन्तरिक्ष में जाने की कल्पना की बल्कि विक्रम साराभाई के नेतृत्व में इसे आगे बढ़ाने के लिए धन भी जुटाया । जो लोग 1985 में कम्प्यूटर की निंदा कर रहे थे कल्पना कीजिए कि अन्तरिक्ष विज्ञान की इस योजना पर उन दुष्प्रचारवादियों ने नेहरू को कितना कोसा होगा ।

आज बार बार सोशल मीडिया में प्रोपोगण्डा वादियों द्वारा कहा जा रहा है कि पंडित नेहरू का इसरो के निर्माण में कोई योगदान नहीं है । बार बार यह भी कहा गया था कि कांग्रेस ने 70 साल में कुछ नही किया तब यह दिखाई पड़ना चाहिए कि पंडित नेहरू ने जिन बड़े संस्थानों की स्थापना की थी उसमें इसरो भी शामिल था । भारत का स्पेस साइंस में दखल होना चाहिए इस दृष्टि से पंडित नेहरू ने इसरो की स्थापना की परिकल्पना की थी जिस का गुणगान आज वे सभी आलोचक कर रहे हैं। आज जब चंद्रयान-2 का संदर्भ सामने आया तब देश को पंडित नेहरू का शुक्रगुजार होना चाहिए। इतिहास और तथ्यों को झुठलाया नहीं जा सकता।

भारत के एंटी सैटेलाइट परीक्षण के बाद और लोक सभा चुनाव में सोशल मीडिया पर बहुत सारी ऐसी पोस्ट्स देखी जा सकती हैं जिनमें ये कहा गया है कि भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो की स्थापना में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का कोई योगदान नहीं था ।
अब तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित करते हुए कहते है कि भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में दुनिया की चौथी महाशक्ति बन गया है और भारतीय वैज्ञानिकों को एक लाइव सैटेलाइट को नष्ट करने में सफ़लता हासिल हुई है। वैज्ञानिकों की इस बड़ी सफ़लता को लेकर भारत में खुशी मनाई गई। इस सफलता में नेहरू की वैज्ञानिक दृष्टि को नकार पाना दुष्प्रचारवादियों के लिए असंभव हो गया और वैज्ञानिकों की इन सफलताओं का श्रेय छीनकर उसे वोटों में तब्दील करने का काम पीआर एजेंसियां करने में लग गई ।

बहरहाल जिन सोशल मीडिया पोस्ट्स में नेहरू के बारे में लिखा गया है, उनके अनुसार नेहरू का देहांत 27 मई 1964 को हुआ था जबकि इसरो की स्थापना 15 अगस्त 1969 को हुई थी।
बहुत सारे लोगों ने यह सवाल उठाया है कि जब इसरो की स्थापना से पहले ही नेहरू का देहांत हो गया था तो वो इस संस्थान की स्थापना कैसे कर सकते हैं।
अंतरिक्ष एजेंसी इसरो के अनुसार इन दो तारीख़ों के आधार पर यह सवाल उठाना वाजिब नहीं है ।

क्या है सच ?

आधिकारिक रूप से इसरो की स्थापना परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत 15 अगस्त 1969 को हुई थी। यानी जवाहर लाल नेहरू के देहांत से पाँच साल बाद। लेकिन इसी विभाग के अंतर्गत इंडियन नेशनल कमेटी फ़ॉर स्पेस रिसर्च नाम की एक इकाई 16 फ़रवरी 1962 से कार्यरत थी जिसे बाद में इसरो नाम दिया गया । जवाहर लाल नेहरू ने प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉक्टर विक्रम साराभाई के नेतृत्व में इंडियन नेशनल कमेटी फ़ॉर स्पेस रिसर्च की स्थापना की थी। नेहरू ने यह फ़ैसला अपने देहांत से दो साल पहले लिया था ।
इसरो की आधिकारिक वेबसाइट पर भी इस अंतरिक्ष रिसर्च एजेंसी की स्थापना में नेहरू और डॉक्टर साराभाई के योगदान का उल्लेख किया गया है ।
वेबसाइट पर लिखा है। भारत ने अंतरिक्ष में जाने का फ़ैसला तब किया था जब भारत सरकार ने साल 1962 में इंडियन नेशनल कमेटी फ़ॉर स्पेस रिसर्च की स्थापना की थी ।
अगर इस संस्था के गठन का श्रेय जवाहर लाल नेहरू से ले भी लिया जाए तो यह इंदिरा गांधी की झोली में चला जाता है क्योंकि अगस्त 1969 में भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं और जिस समय औपचारिक रूप से इसरो की शुरुआत हुई उस समय देश में कांग्रेस की ही सरकार थी।

कम नही इसरो की उपलब्धियां
इसरो की उपलब्धियां कम नही है। इसरो ने दुनिया के नक्शे पर भारत को पहचान दिलाई है।
एसएलवी-3 भारत का पहला स्वदेशी सैटेलाइट लॉन्च वेहिकल था । वर्ष 1975 में देश का पहला उपग्रह आर्यभट्ट अंतरिक्ष में भेजा गया इसका नाम महान भारतीय खगोलशास्त्री के नाम पर रखा गया था। इस उपग्रह का निर्माण पूरी तरह से भारत में ही हुआ था।
इसरो के जरिए एक साथ 104 सैटेलाइट का सफल लॉन्च किया गया है। अभी तक यह रिकार्ड रूस के नाम था जो 2014 में 37 सैटेलाइट एक साथ भेजने में कामयाब रहा है।
इसरो ने 1990 में ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान पीएसएलवी को विकसित किया 1993 में इस यान से पहला उपग्रह ऑर्बिट में भेजा गया । जो भारत के लिए गर्व की बात थी । इससे पहले यह सुविधा केवल रूस के पास थी।
वर्ष 2008 में इसरो ने चंद्रयान बनाकर इतिहास रचा था। इस मानव रहित अंतरिक्ष यान को चांद पर भेजा गया था। इससे पहले ऐसा सिर्फ छह देश ही कर पाए थे।
भारतीय मंगलयान ने इसरो को दुनिया के नक्शे पर चमका दिया। मंगल तक पहुंचने में पहले प्रयास में सफल रहने वाला भारत दुनिया का पहला देश बना। अमेरिका रूस और यूरोपीय स्पेस एजेंसियों को कई प्रयासों के बाद मंगल ग्रह पहुंचने में सफलता मिली।
आज हमारा खुद का नेविगेशन सिस्टम है।
यह जानना समीचीन होगा कि चन्द्रयान- 1 की व्यापक सफलता के बाद जिसमें भारत ने आरबिटर लांच करने में सफलता पाई थी चन्द्रयान- 2 की कल्पना की गई । 12 नवंवर 2007 को मनमोहनसिंह सरकार ने रूस के साथ एक सयुक्त परियोजना के रूप में चन्द्रयान-2 का अनुबंध किया । चूंकि हमारे वैज्ञानिक आरबिटर तक की सफलता हासिल कर चुके थे किन्तु हमारे पास लेण्डर तकनीकी नहीं थी अतः चन्द्रमा की सतह पर उतारने के लिए रूस की रसकोमास एजेंसी से समझौता हुआ तथा इस परियोजना के लिए मनमोहनसिंह सरकार ने धन उपलब्ध कराया । 2013 में यह प्रोजेक्ट जब अपने अंतिम चरण में पहुंचा तो रूस ने इस अनुबंध से वापस हटने की घोषणा कर दी । क्योंकि उनका लेण्डर जो उन्होंने मंगल पर भेजने के लिए छोड़ा था वह असफल हो गया था । अब इस अवस्था में रूस ने जब हमें आधे रस्ते छोड़ दिया तो इस बड़ी चुनौती को भारत के वैज्ञानिकों ने स्वीकारा एवं लेण्डर के लिए स्वदेशी तकनीकी विकसित करने का बीड़ा उठाया। इसमें अन्याय होगा अगर भारत की दो महान महिला वैज्ञानिक ऋतु करीधल एवं एम.वनीता जो कि उस प्रोजेक्ट की डायरेक्टर है उन्हें इसका श्रेय न दिया जाए । इन दोनों वैज्ञानिकों की लगन और परिश्रम से ही आज चन्द्रयान-2 पूरी दुनिया में चर्चित हुआ है ।

इन उपलब्धियों की चर्चा इसलिये की जा रही है क्योंकि ये शुद्ध रूप से हमारे वैज्ञानिकों की प्रतिभा और समर्पण का परिणाम है। इन पर हर नागरिक को गर्व है। यह वैज्ञानिकों की क्षमता और मेहनत का परिणाम है। इसे कुछ लोग नेताओं की व्यक्तिगत उपलब्धि मानते है, तो मानें। असली देशभक्त जानते है कि सच क्या है।

(लेखक स्वतंत्र विश्लेषक एवं कांग्रेस विचार विभाग के अध्यक्ष है)