‘सुकून’ है तो नर्मदा माई के आंचल में…

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-राहुल मिश्र ‘जबलपुरिया’

आज जब दोपहर बाद घर से निकल रहा था,तभी धन्नालाल जी भी लद लिए। कहने लगे, चलो सिविक सेंटर छोड़ दो। वहां पहुंचते ही उनके विचार बदल गए। कहने लगे कि चलो कहीँ और चलें..उनके मिज़ाज से वाकिफ होने के चलते मैंने ना-नुकुर नही की। बस इतना कहा कि चार बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस है। तपाक से वे बोले, तो अभी तो 2 भी नही बजा। चलो सदर चलो। हम सदर पहुंच गए। जैसे ही दूसरे पुल से सदर की तरफ टर्न होने लगे, धन्नालाल जी ने फिर टोका। कहा, यार ऐसा करो सिविल लाइंस चलो। वहां बैठेंगे। गाड़ी उधर मुड़ गई। सिविल लाइंस में घुसते ही जब उन्होंने कहा कि यहां भी नही…कहीं और..तो मेरा माथा घूम गया। सब्र का बांध टूटते टूटते बचा और मैने हल्के गुस्से से बस इतना कहा कि अच्छे से सोचकर बताओ कि कहां चलना है और क्यों..?
काफी देर सोचकर वे बोले, अच्छा अब नर्मदा किनारे ही चलो, वहीं सुकून मिलेगा।
हम लोग जा पहुंचे ग्वारीघाट। नाव से उस पार गुरुद्वारे के समीप एक शांत और सुनसान टीले पर जब हम बैठ गए, तो मैंने पूछा कि पहले आप सीधे यहां क्यों नही लाए..?
• बस वे जैसे भरे बैठे थे, शुरू हो गए। कहने लगे मुझे कुछ देर शांति से बैठना था। सो सोचा कि सिविक सेंटर चलूं। आखिर ‘सिविक’ यानी ‘नागरिक’ लोगों का ‘सेंटर’ यानी ‘केंद्र’ है ये। यहां तो रहने, काम करने और आने वाले सब ‘सिविक’ ही होते हैं। अब यहां के और यहां आने वालों में ‘सिविक सेंस’ यानी ‘नागरिक भावना’ तो होगी ही न…? वरना इन्हें ‘सिविक’ क्यों कहा जाता…? फिर ये ‘सिविक’ लोगों का ‘सेंटर’ है। यहां तो सब कुछ अन्य ‘सेंटरों’ जैसे ही होगा। जैसे ‘जूस सेंटर’, ‘गारमेंट सेंटर’, ‘कॉफी सेंटर’, ‘डोसा सेंटर’ आदि-आदि। मतलब एक खास किस्म की सभी आकार-प्रकार और सभी गुणधर्म वाली चीजों का एक जगह सुव्यवस्थित जमावड़ा। इन ‘सेंटरों’ में मिलने वाली चीज की हर वैराइटी अलग-अलग कायदे औऱ सलीके से रखी होती है। सो ‘सिविक’ और ‘सेंटर’ के इन मायनो को जोड़कर मेरे दिमाग मे आया कि ये ऐसी जगह होगी, जहाँ सभी ‘ सिविक/नागरिक’ सुव्यवस्थित, ‘सिविक सेंस/नागरिक भावना’ से ओतप्रोत लोग होते होंगे। यहां हर किसी को ‘साफ-सफाई’ का ख़्याल होगा। हर कोई ‘नियमों का पालन’ करता होगा। यातायात और पार्किंग ‘सुव्यवस्थित’ होगी। लोग खुद ही सड़कों पर गाड़ियां खड़ी नही करते होंगे। कोई कहीँ भी ‘गुटखे/पान की पिच्च’ नही करता होगा। दिवालें और सड़कें साफ-सुथरी होंगी। और भी कई ऐसी सुव्यवस्थाएँ यहां हंड्रेड परसेंट होंगी, क्योंकि ये ‘सिविक सेंस/नागरिक भावनाओं’ वाले ‘सिविक/नागरिक’ लोगों का ‘सेंटर/केंद्र’ है।“
पर यहां घुसते ही जो देखा, उससे मन खिन्न हो गया। ‘सिविक सेंस’ वाले लोग सड़कों पर ऐसे गाड़ी चला रहे थे, जैसे किसी बड़े और खाली स्टेडियम में मस्ती से ड्राइव कर रहे हों। कोई दांये से जा रहा था, कोई बाएं से और कोई-कोई तो न दांये, न बाएं, न बीच में। कौन कहाँ किस तरफ से और कितनी रफ्तार से चला आये, अंदाजा नही लगाया जा सकता। गन्दगी और बदबू इतनी कि सर फटने लगा था। इसलिए मैंने सोचा कि यही ‘सिविक सेंस वालों का केंद्र’ है तो मुझे एक पल भी यहां सुकून नही मिल सकता।“
“ फिर ‘सदर’ चलने की बात इसलिए की, क्योंकि ‘सदर’ का मतलब होता है ‘आला मुक़ाम’, सबसे ऊंचा, अच्छा स्थान या ‘सबका मुखिया’। मतलब जो शहर/’संस्कारधानी’ की सबसे बेहतरीन जगह हो। जहां सारे ‘नियम-कायदों’ का पालन किया जाता हो। जहां संस्कार अपने उच्चतम स्तर पर हों। जो जगह ‘आला’ या ‘उच्च’ लोगों के निवास-व्यापार, विहार-विचरण की हो। जहाँ ‘बुद्धिजीवियों’ का जमावड़ा लगता हो।“
पर जैसे ही तुम्हारी गाड़ी ने वहां एंट्री ली, अचानक दिमाग मे कौंधा कि इस जगह तो मुझे सुकून कतई नही मिलेगा। नाम से एकदम उल्टा है ‘सदर’ तो। यहां दुकानें ज्यादातर तो सड़क पर और नीचे(फुटपाथ) पर लगती हैं। काहे का ‘ऊंचा स्थान’…? बिना बांह, ‘सीनादिखाऊ’ और ‘घुटने’ के नीचे कपड़े पहनने के लड़कियों/युवतियों के ‘आला संस्कार’, ‘पल्सर’ पर तीन-तीन लदे ‘लौंडों’(जबलपुरिया में)/लड़कों के रोड पर फूहड़ ‘ स्टंट’, ‘बेकायदा और बेकाबू’ फिकरेबाजी देखनी-सुननी हो तो बेशक ‘सदर’ से आला जगह नही है। रही मुखिया या ऊंचे दर्जे की तो इस मामले में कुछ हद तक ये अर्थ सही भी है। जो चीज शहर के दूसरे बाजारों में 100 ₹ की मिल जाएगी, वो यहां 3 सौ से नीचे की नहीं है। शहर में ‘छोटे’ लोगों को मोलभाव की सहूलियत है। पर यहां ‘ऊंचे’ लोग रहते/आते हैं। लिहाजा हर दुकान में हर चीज के रेट ‘फिक्स’ हैं। जमीन के बेहतरीन इस्तेमाल के मसले में भी ये शहर का ‘सदर’ है। यहां की ‘गली नम्बर फलां’ से ‘गली नम्बर ढिकां’ तक मे ये ‘बाज़ीगरी’ बखूबी देखी जा सकती है। इन गलियों की ‘सड़कों’ का ‘दुकानों’ के रूप में ‘बेहतरीन इस्तेमाल’ शायद ही शहर में कहीं और होता हो । पीछे मकान और आगे सड़क पर दुकान। सफाई के मामले में तो केंट बोर्ड का एरिया होने के बावजूद ये क्षेत्र शहर का ‘सदर’ बनने की ‘दौड़’ में अव्वल चल रहा है। इतने ‘आला दर्जे’ के लोगों का इलाका है ये कि रोड तो पक्की 20 मीटर की बनवा ली, पर आधे पर दोनों तरफ ‘गरीब’ ठेलेवालों को जगह दे दी गई।“
“ये सब सोचकर सिविल लाइंस जाने की सोची। सोचा कि अब तो चूक हो ही नही सकती। ‘सिविल’ यानी ‘सभ्य’ और ‘लाइंस’ मतलब कई लोगों के निवास का क्षेत्र। अर्थात ये ‘कई सभ्य लोगों के रहने का क्षेत्र’ है। ये जगह मेरे सुकून के लिहाज से उपयुक्त हो सकती थी। पर सदर से यहां आने के बीच सिविल लाइंस का सीन मेरे जेहन में घूमता रहा। वो दिन भर होनेवाले कॉलेजो/यूनिवर्सिटी के ‘होनहार’ छात्रों के हुल्लड़, हंगामे याद आये। ‘मॉडर्न’ पन की आड़ में सड़कों पर प्रेमी जोड़ों का ‘नंगपन’, बंगलों में चल रहे कई तरह के ‘अड्डों’ की याद आई। हराम की कमाई से खड़े किए गए कई बंगले याद आये। और वो आरटीओ में चलनेवाला दलालों का ‘इकतरफा राज और आतंक’ याद आया।“
“ बस इसीलिए मैने शहर में और कहीं जाने का इरादा छोड़ दिया। ये सोचकर कि जब ‘सिविक सेंटर’, ‘सदर’ और ‘सिविल लाइंस’ एक सुकूंप्रेमी के लिए ‘मुफीद और मुनासिब’ जगह नही, तो फिर दूसरी कोई हो ही नही सकती।“
“ये ख्याल आते ही मैने तुम्हे माँ रेवा के किनारे आने को कहा। में तो देर से समझा पर अब तुम भी समझ लो बाबू…. संस्कारधानी में कहीं सुकून है, तो नर्मदा तीर…वरना कहीं नहीं।“