फजीहत की बाढ़ और संदेह की लहरों में सिंधिया ..

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राघवेंद्र सिंह

मध्यप्रदेश की राजनीति पर इन दिनों असंतोष संदेह और एक दूसरे की फजीहत कराने वाले बादल छाए हुए हैं। इन मानसूनी घटाओं की चपटे में भाजपा और कांग्रेस के नेता कभी बूंदा बांदी कभी रिमझिम तो कभी तेज बौछारों में भीग रहे हैं। अगर कोई जानकार अपनी सारी समझदारी लगा भी दे तो नेताओं के गीले हुए चेहरों से ये पता नहीं कर सकता कि ये आंसुओं से तर हुए हैं या बारिश से। कांग्रेस सत्ता में है और लगड़े लूले बहुमत से वह भाजपा के नारायण त्रिपाठी और शरद कोल की बैसाखी से थोड़ी लचक के साथ तैमूरी दिखाई दे रही है। मुगलिया हुकुमत को भारत में स्थापित करने वाले बादशाह तैमूर को एक पैर कमजोर होने के कारण तैमूर लंग कहा जाता था। सो कमलनाथ सरकार को तैमूरी सरकार कोई कहे तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। वैसे चौदहवीं सदी का महान बादशाह रहा है तैमूर। इसकी निष्ठुरता और हुकुमत के चर्चे चीन तक होते थे।
तैमूर की चर्चा फिर किसी दिन करेंगे अभी तो सत्ता के लिए जितनी निर्ममता होनी चाहिए प्रदेश की कांग्रेस सरकार कर रही है। उसके अपने युवातुर्क ज्योतिरादित्य सिंधिया भी उसका शिकार हो रहे हैं।हालत ये है कि बदलते राजनैतिक माहौल में सिंधिया पाला बदल सकते हैं इसकी चर्चा भी सियासी हलकों में संजीदगी के साथ होने लगी है। सरकार में उनके समर्थक मंत्रियों की उपेक्षा और फिर संगठन में प्रदेश अध्यक्ष की दावेदारी पर सिंधिया की अनदेखी उन्हें फजीहत की बाढ़ में बहा रही है। उनके पुस्तैनी संसदीय क्षेत्र से पराजय के सदमें को सिंधिया परिवार भुला नहीं पा रहा है। ऊपर से प्रदेश कांग्रेस में उनके प्रवेश को रोकने के लिए कांग्रेसी नेता तटबंधों को मजबूत कर रहे हैं। ऐसे में सिंधिया समर्थकों का गुस्सा भी असंतोष की लहरों में बदल रहा है। हालांकि मुख्यमंत्री कमलनाथ बहुत गंभीरता के साथ सभी को साथ लेकर गुटीय संतुलन बनाए हुए हैं लेकिन प्रदेश अध्यक्ष के नाम पर सिंधिया की दावेदारी को उनके चाणक्य दिग्विजय सिंह शिविर जिस तरह खारिज करता है उसमें कमलनाथ की खामोशी ग्वालियर महाराज को बेचैन करती है। यद्पि दिल्ली में कांग्रेस की कमान एक बार फिर सोनिया गांधी के हाथ में है ऐसे में सिंधिया को कितनी गंभीरता से लिया जाएगा यह आने वाले दिनों में सबको पता चल जाएगा। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस से मोहभंग होने की जो घटाएं उठ रही हैं उसमें हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा अलग पार्टी बनाने की तैयारी में हैं। अगर ऐसा होता है तो मध्यप्रदेश समेत अन्य राज्यों के असंतुष्ट कांग्रेसी भी कमजोर हो रहे हाईकमान को आंखें दिखा सकते हैं। चूंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया को लंबी राजनीतिक पारी खेलनी है ऐसे में वे कांग्रेस में लंबे समय तक उपेक्षा की बाढ़ में नहीं बह सकते। यह उनके राजनीतिक करियर के लिए भी ठीक नहीं होगा। इस बीच प्रदेश भाजपा में सिंधिया को लेकर गंभीर रणनीति पर बंद कमरों में बातचीत हुई है। यह तब और ज्यादा हुआ जब कांग्रेस ने उनके दो विधायकों पर डोरे डाले। जवाबी कार्यवाई में सिंधिया कैंप उनके लिए आसान टारगेट है। हम इस बात पर नहीं जाते कि भाजपा सिंधिया को मुख्यमंत्री या केन्द्र में कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने की बात करेगी लेकिन इतना तय है कि अगर कुछ आसमानी सुल्तानी होता है तो सिंधिया भाजपा के लिए जनरेशन नेक्स्ट का सुदर्शन सौम्य और वैभवपूर्ण चेहरा हो सकते हैं। मोदी और शाह (मोशा )की जोड़ी इस तरह के जोखिम पूर्ण धमाकेदार फैसले करने के लिए जाने भी जाते हैं। मसला मुख्यमंत्री के पद पर चाहे हरियाणा में संघ के खांटी प्रचारक मनोहर लाल खट्टर की ताजपोशी का हो या झारखंड में रघुवरदास का हो या फिर महाराष्ट्र में देवेन्द्र फड़नवीस । इसी तरह मामला दिल्ली चुनाव में मुख्यमंत्री चेहरा के रूप में किरण बेदी का हो । केन्द्रीय मंत्रिमंडल में भी विदेश मंत्री के पद पर एस.जयशंकर प्रसाद की ताजपोशी भी मोशा ने चौंकाने वाला फैसला लिया था। वैसे अब पार्टियों में वफादारी को लेकर ज्यादा गंभीरता नजर नहीं आती। भाजपा तक में अवसरवादियों की पौबारह है और कांग्रेस तो भारतीय राजनीति में प्रवाहमान उस नदी की तरह है जिसमें जो भी आता है उसके जैसा हो जाता है। इसलिए वह आया राम गया राम को लेकर आमतौर से ज्यादा भावुक नहीं रहती है। सिंधिया भी कांग्रेस की इस तासीर के वाकिफ हैं। उपेक्षा की तेजाबी बारिश से अगर वे झुलस रहे हैं तो भाजपा की सत्ताभरी छांव उन्हें राहत दे सकती है। इसमें भाजपा और सिंधिया दोनों का लाभ है। सबको पता है उनकी दादी विजयाराजे सिंधिया जनसंघ से लेकर भाजपा को पालने पोषने वाली संस्थापक नेताओं में शामिल हैं। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधराराजे और मध्यप्रदेश में पूर्व मंत्री यशोधरा राजे पहले से ही भाजपा की दिग्गज नेताओं में शामिल हैं। ऐसे माहौल में अगर कांग्रेस हाईकमान सिंधिया को लेकर सतर्क हो जाता है तो राजनैतिक गलियारों में जो बातें पंख लगाए उड़ रही हैं उन पर विराम भी लग सकता है। लेकिन ये तभी संभव है जब सिंधिया के साथ उनके समर्थक भी संतुष्ट हों। संगठन के मामले में उनके कद के हिसाब से पद प्रदान किया जाए। हालांकि कांग्रेस के नेता सियासी मानसून की इन बदरियों को बरसे बिना ही गुजर जाने की बात कह सकते हैं। चूंकि असंतोष के इन बादलों की गरज चमक दिखाई और सुनाई देना कम हो गई है इसलिए ये कभी भी बरस जाएं तो अचरज नहीं होगा क्योंकि सरकारों का तख्ता पलट अक्सर खामोशी से होता है। हल्ला बोलकर नहीं।