हिंदी रचनाकर्म से इस ‘तलाक’ के आखिर क्या मायने ?

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अजय बोकिल

क्या‍ हिंदी अब सृजन की, मनोभावों को अभिव्यक्त करने की और अपने समय से जूझने की भाषा नहीं रह गई है? आज इसमें जो लिखा जा रहा है वह सब ‘हिंदू मुसलमान, जय श्री राम और वंदे मातरम्’ पर जाकर खत्म हो रहा है? ऐसी स्थिति में कोई संवेदनशील ‍कवि या लेखक (पत्रकार भी) कोई कुछ क्यों लिखे? ये तमाम सवाल कवि लेखक मंगलेश डबराल के एक संक्षिप्त वक्तव्य के बाद उठ रहे हैं, जिनको लेकर साहित्य जगत में बवाल मचा है। मंगलेश के इस बयान के बाद ज्यादातर हिंदी रचनाकार उन पर हमलावर हो गए हैं। लोगों ने इसे मंगलेश का निजी मोहभंग अथवा रचनात्मक निष्क्रियता करार देते हुए हिंदी को इसमें घसीटने की कड़ी आलोचना की है। कुछ का कहना है कि हिंदी के दम पर काफी कुछ अर्जित करने के बाद इस तरह हिंदी से रचनात्मक ‘तलाक’ लेने के असल मायने क्या हैं? कई लेखकों-कवियों ने मंगलेश की टिप्पणी को नकारात्मक मानते हुए कहा कि उनकी राय जो कुछ हो, हमे हिंदी में अपने रचना कर्म और धर्म पर गर्व है। अब सवाल यह है कि स्थापित कवि मंगलेश डबराल ने अपनी उम्र के सातवें दशक में आकर ऐसा क्यों कहा? बीते पांच सालो में ही हिंदी से उनका मोहभंग क्यों हुआ और क्या किसी रचनाकर्मी को इस तरह अपनी भाषा से रिश्ते तोड़ लेने का सांस्कृतिक और नैतिक अधिकार है? अगर है तो उसे किस रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए? किया भी जाना चाहिए या नहीं ?
पहले मंगलेश डबराल की टिप्पणी देखें। मंगलेश ने लिखा है- ‘हिंदी में कविता, कहानी, उपन्यास बहुत लिखे जा रहे हैं, लेकिन सच यह है कि इन सबकी मृत्यु हो चुकी है। हालांकि ऐसी घोषणा नहीं हुई है और शायद होगी भी नहीं, क्योंकि उन्हें खूब लिखा जा रहा है। लेकिन हिंदी अब सिर्फ ‘जय श्रीराम’ और ‘वंदे मातरम’ तथा ‘मुसलमान का एक ही स्थान- पाकिस्तान या कब्रिस्तान’ जैसी चीजें जीवित हैं। इस भाषा में लिखने की मुझे बहुत ग्लानि है। काश इस भाषा में न जन्मा होता!’
मंगलेश डबराल को हिंदी जगत ने उनके पहले काव्य संग्रह ‘पहाड़ पर लालटेन’ से जाना। उसके बाद उनके और भी कविता संग्रह आए। कई पुरस्कारों से सम्मानित मंगलेश को वाम और उदारवादी खेमे का महत्वपूर्ण कवि माना जाता है। लेकिन अब जो बात उन्होंने कही है, उसके पीछे क्या कारण है? क्या यह बदले सांस्कृतिक राजनीतिक माहौल में बुद्धिजीवी समुदाय द्वारा छोड़ा गया नया शोशा है या फिर देश की वर्तमान ‍परिस्थिति में अपनी ‘सांस्कृतिक’ हार की स्वीकारोक्ति है? इस पर गहराई से सोचने की जरूरत है। मंगलेश यह तो मानते हैं कि ‘हिंदी में कविता, कहानी और उपन्यास खूब लिखे जा रहे हैं, लेकिन इन सबकी मृत्यु हो चुकी है। हालांकि ऐसी घोषणा नहीं हुई है। और शायद होगी भी नहीं।‘ यानी साहित्य रचा तो जा रहा है, लेकिन वह निष्प्राण है या फिर वेंटीलेटर पर है। ऐसा साहित्य ( काफी हद तक पत्रकारिता भी) कबाड़ से ज्यादा कुछ नहीं है। वह काफी कुछ उसी तरह का है, जो किसी जमाने में वामपंथ को सर्वश्रेष्ठ विचारधारा बताने के लिए या‍ फिर जर्मनी में नाजीवाद को महिमामंडित करने के लिए लिखा जा रहा था। आज उसका कोई विशेष मोल नहीं है। अर्थात वह नारेबाजी और एक विशिष्ट विचार और सोच को प्रस्थापित करने वाला प्रचार साहित्य ही था और इन विचारधाराअों के (चंद कालजयी रचनाअों को छोड़कर) सत्ता विहीन होते ही कूड़ा हो चुका है। आज कमोबेश यही हालत कथित राष्ट्रवादी ‍साहित्य की है। यहां मंगलेश ने ‘जय श्री राम’ और ‘वंदे मातरम्’ को इस सोच का प्रतिनिधि जुमला माना है। क्योंकि ये नारे अब राष्ट्रवाद का उद्दाम प्रतीक बन गए हैं। इसकी संभावित परिणति एकजातीय और एकरूप समाज का ‍निर्माण है, जहां सब रंगों को एक रंग में विलीन हो जाना है। ऐसा समाज यदि बना तो उस वट वृक्ष की मानिंद होगा, जिसके नीचे हरे तिनकों का पनपना भी मुश्किल है।
मंगलेश डबराल के कथन पर टिप्पणी करते हुए प्रो. अपूर्वानंद ने एक अच्छी बात कही है कि मंगलेश के कथन में जो व्यथा है, उसे नजर अंदाज करने के लिए खासी क्रूरता चाहिए। या यही कहा जा सकता है कि हिंदी अब पूरी तरह अभिधा की भाषा हो चुकी है। उसमें व्यंजना का स्थान ही नहीं रहा। इसमें शक नहीं कि जैसे-जैसे समूचे भारतीय समाज को एकरस और एकांगी बनाने की कोशिश हो रही है, उसी गति से समाज की समझ भी अभिधात्मक हो रही है। आज हर बात को उसके सपाट और रूखे भाव में देखने, समझने और सुनने की वृत्ति बढ़ती जा रही है। शब्द की कोई व्यंजना शक्ति भी होती है, जो भाषा को तेवर देती है और समाज की समझ को समृद्ध करती है, यह बात खारिज की जा रही है। लेकिन भाषा का यह संकट तो हर क्षेत्र में है। अगर आप निश्चि त जुमलों की सरगम में अपनी बात नहीं कहेंगे तो आपको किसी भी अवांछित श्रेणी में धकेला जा सकता है। सच्चे लेखक के लिए ऐसा करना बेहद कठिन और अपने आप से समझौता करने जैसा है।
भाषा का यह सतहीपन और भावों का अवमूल्यन जीवन के हर क्षेत्र में हावी होता जा रहा है। साहित्य के साथ पत्रकारिता भी इसकी चपेट में तेजी से आ रही है। आज तकरीबन हर न्यूज चैनल ‘खबर के पीछे की खबर’ दिखाने का दावा करता है। मानो खबर का कोई पिछवाड़ा भी हो। वास्तव में होना दृश्य के पीछे छिपे सत्य का अनावरण चाहिए, लेकिन इस पीछे की खबर को यथासंभव टीआरपी की चाशनी में पगा कर पेश किया जाता है। इसी तरह कहने को आज व्यंग्य खूब लिखा जा रहा है, लेकिन व्यंग्यार्थ इक्का-दुक्का रचनाअों में ही नजर आता है। केवल सपाट बयानी या चुटकुले बाजी को ही व्यंग्य समझा जा रहा है।
डबराल के बयान को अपने समय के सच के संदर्भ में समझना पड़ेगा। हम चाहें तो अपने समय को यह कहकर ठुकरा सकते हैं कि पूरा समाज बहका हुआ है, हम ही सयाने हैं। समाज का एक बड़ा वर्ग अगर ‘जय श्री राम’ में ही अपनी मुक्ति और भविष्य का उत्थान देख रहा है या उसे दिखाया जा रहा है तो इसे भी गहराई से समझने की जरूरत है। ये ‍परिस्थितियां किन कारणों से निर्मित हुईं, यह भी देखने की जरूरत है। लेकिन यह जयकारा रचना कर्म की भी भावभूमि है, ऐसा मान लेना सही नहीं होगा।
मंगलेश की ‘अपनी ही भाषा से ग्लानि’ की बात गले उतरने वाली नहीं है। रचनाकार का काम अपने समय से भिड़ना है न कि पलायन। कोई ‍िकस भाषा में जन्मे यह उसके अधिकार में नहीं होता, ठीक उसी तरह कि कोई अपने जन्मदाता मां-बाप का सिलेक्शन नहीं कर सकता। इसीलिए भाषा को ‘मां’ की संज्ञा दी गई है कि उसका कोई विकल्प नहीं है। अभिव्यक्ति की भाषा का चुनाव किया जा सकता है, लेकिन मातृ भाषा तो विरासत में ‍िमलती है। उससे परायापन कैसा? हिंदी हमे विरासत में मिली है। उसका उपयोग हम कितना और कैसे करते हैं, यह हम पर निर्भर है। बेशक, कवि धूमिल ने जिसे कभी ‘मदारी की भाषा’ कहा था, आज उसी का इस्तेमाल ज्यादा किया जा रहा है। इसे रोकने के लिए भी हमे नकेल वाली भाषा चाहिए। हिंदी में वो ताकत है। इससे दूर भागना मदारी के हाथ में महल की चाबी देने जैसा है।
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