गाय का धर्म ‘हिंदू’ तो फिर बाकी प्राणियों का क्या ?

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अजय बोकिल

यह ‘हिंदुत्व ज्ञान’ का नया झरोखा है। अब तक हिंदू धर्म में गाय सहित कई प्राणियों को देव तुल्य मानकर उनकी पूजा और सेवा की जाती रही है, लेकिन पशुअों का अपना भी कोई धर्म होता है, यह यूपी के बाराबंकी के एक भाजपा नेता ने हमे बताया है। रंजीत श्रीवास्तव नामक इन सज्जन ने मृत गायों के दाह संस्कार के लिए नया विद्युत श्मशान गृह बनवाने का संकल्प भी लिया है। मृत गायों को दफनाने की प्रचलित रीति का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि गायों का अंतिम संस्कार ‘मुस्लिम धार्मिक परंपरा’ के अनुसार नहीं किया जा सकता। स्थातनीय नगर पालिका की बैठक में श्रीवास्तवजी ने कहा कि गायों की पार्थिव देह को सफेद कपड़े में लपेटकर उसका शवदाह गृह में विधिवत अंतिम संस्कार किया जाए। श्रीवास्तवजी नगरपालिका अध्यक्ष-पति भी हैं। उन्होंने इस महत्वपूर्ण मुद्दे की अोर राज्य के मुख्यभमंत्री योगी आदित्यनाथ का ध्यान आकोर्षित किया है। योगीजी ने इस पर अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। वो इस नेक सुझाव को कितनी गंभीरता से लेते हैं, यह देखने की बात है।
बहरहाल श्रीवास्तवजी के इस धर्मानुराग ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है कि क्या जीव-जंतुअों का भी कोई धर्म होता है? या होना चाहिए? अगर होता भी है तो क्या उसे किसी विशिष्ट मानव धर्म के आलोक में देखा जाना चाहिए और क्या उसी के मुताबिक उस पर अमल भी होना चाहिए? गायों का दाह संस्कार करने के विचार के पीछे समझ की कई पर्तें हैं। गाय हिंदू धर्म में एक अत्यंत पवित्र प्राणी है। उसे मां के समकक्ष मानकर पूजा जाता है। हिंदू और जैन धर्म में भी गोसेवा बड़ा पुण्य कर्म है। यही पुण्य कार्य मोक्ष दिलाने में मददगार होता है। यानी गाय इहलोक और परलोक दोनो में आपके कल्याण की गारंटी देती है। अपने देश में गायों की सेवा के लिए कई गोशालाएं हैं। गो ग्रास हमारी परंपरा का हिस्सा है। गो भक्त राह चलते गाय दिखते ही उसे स्पर्श करके अपना जीवन धन्य मानते हैं। इस हिसाब से हिंदू धर्म में गायों की हैसियत अन्य पशुअों की तुलना में वीवीअाईपी की है।
जीवित गाय के प्रति इस अटूट श्रद्धा के बावजूद मृत गायों को लेकर हिंदू समाज में कोई खास आग्रह नहीं रहा है, सिवाय इसके कि परलोक को भी गोलोक के रूप में पारिभाषित किया गया। गाय के मरने के बाद उस पर समाज के उस वर्ग का अधिकार माना जाता रहा है, जो गाय के अंगों के भौतिक उपभोग के लिए काम करता रहा है। इस अर्थ में गाय मृत्यु के बाद भी समाज के इस वर्ग की आजीविका का आधार रही है। जबकि आवारा गायों को अक्सर आदर के साथ दफनाने का रिवाज रहा है। तकरीबन यही प्रक्रिया अन्य प्राणियों के मामले में भी अपनाई जाती रही है। इसका कारण शायद यह है कि जलाने की तुलना में दफनाना आसान और सस्ता भी है। मान लिया जाता है कि दफनाए गए पशु के अवशेष समय के साथ पंचभूत में मिल जाते हैं।
लेकिन किसी के यह ध्यान में नहीं आया था ‍‍कि चूंकि गाय हिंदुअों की आस्था का केन्द्र है, इसलिए उसका धर्म भी हिंदू ही हुआ, या होना चाहिए। उसका जीवन चक्र भी शुरू से लेकर अंत तक हिंदू संस्कारों के अनुरूप ही पूर्ण होना चाहिए। इस अर्थ में यह आस्था का गो-विस्तार है और इस दृष्टि से ठीक भी है कि जब गाय की सेवा से मनुष्य स्वर्ग लोक में जाता है, तब खुद गाय के साथ मरने के बाद ऐसा कुछ क्यों हो, जिससे वह स्वर्गवासी होने से वंचित रह जाए।
यहां पेंच यह है कि यह ‘विशेषाधिकार’ गाय को ही क्यों? हिंदू धर्म में गाय के अलावा करीब एक दर्जन ऐसे पशु-पक्षी हैं, जिन्हें देव तुल्य माना गया है। उदाहरण के लिए गणेश का वाहन चूहा है तो मां दुर्गा का वाहन सिंह है। विष्णु का वाहन गरूड़ है तो शंकर का नंदी ( बैल) है। सरस्वती हंस पर विराजती हैं तो कार्तिकेय मोर पर सवारी करते हैं। यमराज का प्रिय वाहन भैंसा है। देवताअों के इस ‘वाहन आवंटन’ के पीछे हमारे पूर्वजों की सोच यही रही होगी कि लोग इन प्राणियों का संरक्षण करें और प्रकृति की जैव विविधता का सम्मान करें। अब यदि गायों का अंतिम संस्कार हिंदू रिवाज से होगा तो कल को इन सभी प्राणियों को भी हिंदू मानकर उन सभी के लिए विद्युत दाह गृह हमे बनाने होंगे।
एक और बात। हिंदू और उससे निकले अन्य धर्मों जैसे बौद्ध, जैन और सिख धर्म में भी शवों को दहन करने की परंपरा है। वह वैज्ञानिक भी है क्योंकि मृत देह वापस पंच तत्व में समािहत हो जाती है। लेकिन हिंदुअों में मृत शिशुअो और बच्चों को दफनाने का ही रिवाज है। तो क्या इस अंतिम संस्कार को भी ‘मुस्लिम’ माना? हिंदुअोंकी ही एक शाखा लिंगायतों और द्रविड़ परंपरा में भी शवों को जलाने के बजाय उन्हें दफनाया जाता है। ये लोग जो गायें पालते हैं, उनका अंतिम संस्कार कैसे किया जाना चाहिए?
अब गाय से जुड़ा एक और पहलू। मुंबई आईआईटी कैम्पस में आवारा गाय घुसने से प्रबंधन के सामने यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया कि अब क्या करें। गाय को हकाल नहीं सकते और गाय ( साथ में सांड भी) के रहते चैन से जी भी नहीं सकते। ऐसे में प्रबंधन ने बीच का रास्ता एक कमेटी का गठन कर ‍निकाला कि वो ‘मनुष्यों और जानवरों के बीच संघर्ष’ पर अपनी रिपोर्ट देगी। उसके बाद तय होगा कि इस समस्या से कैसे निपटा जाए।
इसमें संदेह नहीं कि गायों की रक्षा हो, पूजा हो, गाय को मां समान मानें, लेकिन उस मूक पशु का ‘धर्मांकन’ तो न करें। क्योंकि शास्त्रों में ‘मानव धर्म’ तो सुपरिभाषित है, लेकिन ‘पशु धर्म’ की व्याख्या और उनके अंतिम संस्कार रीति की शायद ही कोई संहिता हो। दरअसल गाय की मुश्किल यह है कि देवत्व के साथ-साथ उसे अब हिंदुत्व की उस संहिता का हिस्सा भी होना पड़ रहा है, जिसके बारे में खुद उसने भी न सोचा होगा। श्रीवास्तवजी का सुझाव मान लिया जाए तो देश में ( बढ़ती आबादी के कारण) पहले ही कम पड़ते श्मशान घाटों की संख्याब और ‍िकतनी बढानी पड़ेगी, यह सोचा जा सकता है। जब गाय ( और अन्य पवित्र प्राणियों का भी) का दाह संस्कार होगा तो कल को उनकी उत्तर क्रिया और पिंडदान की मांग भी उठेगी। हो सकता है कि जिसकी सेवा से मोक्ष मिलता हो, कल को उसे ही मोक्ष दिलाने के लिए नया धार्मिक -राजनीतिक अभियान छेड़ना पड़े। साथ ही हर पशु पक्षी की धार्मिकता सुनिश्चित करने नया पिटारा भी खोलना पड़े।