ऐसी ही हेड मास्टरी जारी रखें मोदी

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रविंद्र बाजपेयी

कुछ लोग इसे हेड मास्टरी भी कह सकते हैं लेकिन संसद की बैठकों से रोस्टर ड्यूटी वाले केन्द्रीय मंत्रियों की अनुपस्थिति को गंभीरता से लेकर प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने जन आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति ही की है। गत दिवस संसदीय दल की साप्ताहिक बैठक में उन्होंने सांसदों को नसीहत दी कि पहली बार जो प्रभाव होता है उसी का असर अंत तक कायम रहता है। उन्होंने रोस्टर ड्यूटी से गायब मंत्रियों की जानकारी रोजाना शाम को उन तक पहुंचाने भी कहा। श्री मोदी ने सांसदों को उनके क्षेत्र में अधिकारियों से मिलकर केंद्र की योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु प्रयासरत रहने की सलाह भी दी। जहां तक बात रोस्टर की है तो संसद सत्र के दौरान सदन में एक न एक मंत्री को सदैव उपस्थित रहने के लिए कहा जाता है। जिससे विपक्ष द्वारा उठाए गये किसी भी मुद्दे पर सरकार की तरफ से तत्काल जवाब दिया जा सके। प्रधानमन्त्री के संज्ञान में ये बात कहीं से आई कि रोस्टर ड्यूटी वाले कतिपय मंत्री उन्हें सौंपे गये दायित्व का निर्वहन करने की बजाय सदन से गायब रहते हैं। संसदीय दल की बैठक में ही उनकी सूची मांगकर उन्होंने एक तीर से कई शिकार कर डाले। रोस्टर ड्यूटी में लापारवाही बरतने वाले मंत्रियों को फटकारकर उन्होंने बाकी मंत्रियों के साथ सांसदों को भी ये सन्देश दे दिया कि निठल्लापन बर्दाश्त नहीं किया जावेगा। साथ ही मंत्रियों को ये चेतावनी भी मिल गई कि उनकी मटरगश्ती पर नजर रखी जा रही है। मंत्री परिषद् की पहली बैठक में ही उन्होंने सभी मंत्रियों को संसद सत्र के अलावा सुबह कर्मचरियों के साथ ही मंत्रालय में पहुंचने के निर्देश दिए थे। वे स्वयं भी ऐसा करते हैं। उनकी ये कार्यशैली प्रशंसायोग्य है क्योंकि हमारे देश में जनता द्वारा चुने जाने के बाद विधायक और सांसद मंत्री बनते ही खुद को राजा-महाराजा समझने लगते हैं। यही नहीं उनके परिजन तक राजपरिवार के सदस्य के तौर पर पेश आते हैं। जबकि विश्व के विकसित देशों में न सिर्फ मंत्री बल्कि वहां के जनप्रतिनिधि भी अपने कर्तव्यों के निर्वहन हेतु सदैव तत्पर और गंभीर रहा करते हैं। 2014 में प्रधानमन्त्री बनते ही श्री मोदी ने मंत्रियों की चाबी कसना शुरू कर दी थी। परिणामस्वरुप मंत्रालय की कार्य संस्कृति में जबरदस्त गुणात्मक सुधार हुआ। सबसे बड़ा क्रांतिकारी बदलाव ये आया कि जो अधिकारी दफ्तर के समय जाकर गोल्फ खेला करते थे वे सब अपने टेबिल पर नजर आने लगे। प्रधानमन्त्री जिस मंत्री को चर्चा हेतु बुलाते यदि उसे अपने विभाग की समुचित जानकारी नहीं होती तो वे दोबारा पूरी तैयारी के साथ आने को कहते। इस कारण अनेक मंत्री तो निजी तौर पर ये कहते भी सुने गए कि ये बड़ा ही पल्लेदारी वाला काम है। प्रधानमंत्री पर ये आरोप भी लगा कि उन्होंने राजनीतिक नेतृत्व की उपेक्षा करते हुए नौकरशाहों को महत्व देना शुरू कर दिया जिससे मंत्रियों की वजनदरी कम हो गयी। बाद में जब मंत्रीमंडल के विस्तार में आर.के सिंह , सत्यपाल सिंह, हरदीप पुरी और अल्फोंस जैसे अनुभवी पूर्व नौकरशाहों को मंत्री पद दे दिया तब ये शिकायत और तेज हो गयी। लेकिन बजाय विचलित होने के श्री मोदी ने दूसरी पारी में पूर्व विदेश सचिव एस. जयशंकर को विदेश मंत्री बनाकर अपनी प्राथमिकता और पसंद को खुलकर व्यक्त कर दिया। रोस्टर ड्यूटी से गायब रहने वाले मंत्रियों की खोज-खबर लेने का उनका तरीका भी अच्छा लगा। यही काम वे चुपचाप करते तब जंगल में मोर नाचा वाली स्थिति रहती लेकिन संसदीय दल की बैठक में सबके सामने पूछताछ करने से उसका व्यापक असर होगा और सांसद भी अपने काम में मुस्तैद रहेंगे। नरेंद्र मोदी की कार्यप्रणाली की तुलना अक्सर अमेरिका की अध्यक्षीय शासन व्यवस्था से की जाती है। 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने जिस चतुराई से खुद को केंद्र बिंदु बनाया उसकी वजह से विपक्ष निहत्था होकर रह गया। चुनाव के अंतिम दौर में तो श्री मोदी जनसभाओं में ये कहने लगे थे कि आप कमल का बटन दबायेंगे और वोट मोदी को मिलेगा। इस तरह उन्होंने प्रत्याशी को पूरी तरह से गौण बना दिया। उनके पूरे प्रचार अभियान में कहीं भी भाजपा या एनडीए सरकार का नारा नहीं गूंजा। फिर एक बार मोदी सरकार के उद्घोष से पूरा माहौल प्रभावित रहा। परिणामों के बाद जब भाजपा के अनेक निकम्में सांसदों और बेहद कमजोर कहे जाने वाले उम्मीदवारों के जीत जाने पर अचरज व्यक्त किया गया तब जनता की बीच से यही जवाब मिला कि उसने प्रत्याशी को नहीं अपितु श्री मोदी को मत दिया था। प्रधानमन्त्री इस वास्तविकता को अच्छी तरह से समझते हैं और इसीलिये वे चाहे मंत्री हों या सांसद सभी की क्लास लगाते रहते हैं। बीते दिनों इंदौर में वरिष्ठ भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय के विधायक पुत्र द्वारा नगर निगम कर्मी के साथ की गई मारपीट पर भी उन्होंने संसदीय दल की बैठक में खुलकर कहा कि बेटा किसी का भी हो उसे इस तरह की छूट नहीं दी जा सकती। संसदीय प्रजातंत्र का ये एक अच्छा रूप है जिसमें अपने अधिकारों के साथ ही कर्तव्यों के निर्वहन पर भी उतना ही जोर दिया जा रहा है। नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए ये साबित कर दिया था कि यदि आप में सीखने की प्रवृत्ति और लक्ष्य निर्धारित करते हुए आगे बढऩे का हौसला है तब सफलता भी सुनिश्चित है। गत दिवस उन्होंने एनआईए संशोधन विधेयक पर हुए मतदान के दौरान गैर हाजिर रहे सांसदों की भी खिचाई कर दी जिसके बाद सफाई आने का दौर शुरू हो गया। आज तो खैर टीवी का जमाना है लेकिन उस दौर में जब संसद की कार्रवाई रेडियो और अखबारों से पता चलती थी तब सदन में होने वाली बहस और दोनों पक्षों के नेताओं के भाषण उच्चतम स्तर के हुआ करते थे। पं. नेहरु पूरे समय सदन में रहकर बहस सुनते थे। विपक्ष हो-हल्ला नहीं करता था और भारी बहुमत के बाद भी सत्ता पक्ष उसकी बात सुना करता था। इसमें दो मत नहीं हैं कि सदन के भीतर सदस्यों के आचरण और बहस के गिरते स्तर ने समूची राजनीति को बदनाम किया है। उस दृष्टि से सत्तारूढ़ मंत्रियों और भाजपा सांसदों को सदन से नदारद रहने के लिए फटकार लगाकर प्रधानमंत्री ने स्वागतयोग्य कदम उठाया है। अब ऐसी ही उम्मीद विपक्ष से भी है। सही बात तो ये है कि संसद का समुचित उपयोग करने की बुद्धिमत्ता विपक्ष से ज्यादा अपेक्षित है क्योंकि देश की जनता तक अपनी बात पहुंचाने का उससे बेहतर और प्राभावशाली मंच दूसरा नहीं हो सकता।