नई सरकार [?] इस मुद्दे पर दो-दो हाथ जरूरी है

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राकेश दुबे

मोदी सरकार की वापिसी हो या कोई और सरकार बने, आने वाली नई सरकार का सीधा मुकाबला जिस समस्या से होगा वो देश की बेरोजगारी है | वैसे मोदी सरकार बेरोजगारी समेत कई बुनियादी मुद्दों पर किये गये वायदे पूरे करने में सफलता के उस पैमाने को नहीं छू सकी है जो उससे अपेक्षित था | मोदी सरकार ने देश में मेक इन इण्डिया, डिजिटल इण्डिया, स्टार्टअप एण्ड स्टैण्डअप इण्डिया आदि को लेकर पूरी ताकत झोंकी, परन्तु रोजगार की स्थिति संतोषजनक नहीं है। संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन की रिपोर्ट की मानें तो वर्ष २०१७ में भारत में बेरोजगारों की संख्या २०१६ की तुलना में थोड़ी बढ़ी थी वर्ष २०१८ में भी यह क्रम जारी रहा।जो निरंतर है |
एनएसएसओ की ताज़ा रिपोर्ट यह दर्शाती है कि मोदी शासनकाल में बेरोजगारी तुलनात्मक कहीं अधिक बढ़ी है। नोटबंदी के बाद हालात तेजी से बिगड़े हैं। महिला कामगार सबसे ज्यादा बेरोजगारी की शिकार हुई हैंआंकड़े कहते है ४५ सालों में सबसे ज्यादा बेरोजगारी के आंकड़े २०१७-१८ के हैं | वर्ष २०१७ में मैन्यूफैक्चरिंग, कन्स्ट्रक्शन तथा ट्रेड समेत ८ प्रमुख सेक्टरों में सिर्फ २ लाख ३१ हजार नौकरियां ही मिली हैं |जबकि २०१५ में यही आंकड़ा १ लाख ५५ हजार पर ही आकर सिमट गया था। हालांकि २०१४ में ४ लाख २१ हजार लोगों को इन क्षेत्रों में नौकरी मिली थी। २०१४ के घोषणापत्र में रोजगार भाजपा का मुख्य एजेण्डा था। रोजगार को लेकर सरकार कमजोर दिखाई दी है| सरकार को रोजगार बढ़ाने की जगह लाखों खाली पदों को ही भरना था । आंकड़े इस ओर इशारा करते हैं कि देश में १४ लाख डॉक्टरों की कमी है, ४० केन्द्रीय विश्वविद्यालय में ६ हजार से अधिक पद खाली हैं।देश के सर्वाधिक महत्वपूर्ण माने जाने वाले आईआईटी, आईआईएम और एनआईटी में भी हजारों में पद रिक्त हैं और इंजीनियरिंग कॉलेज २७ फीसदी शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं जबकि 1१२ लाख स्कूली शिक्षकों की भी भर्ती जरूरी है।
अब सवाल है कि कोई भी सरकार महत्वपूर्ण रिक्तियों को बिना भरे रोजगार देने को लेकर चिंता मुक्त कैसे हो सकती है। इन्हीं सब स्थितियों को देखते हुए विपक्ष से लेकर बेरोजगार युवा तक सरकार पर लगातार हमले करते रहे हैं। और करेंगे | चुनावी समर में भले ही ऐसे मुद्दे फलक से गायब हों पर हकीकत यह है कि आज भी इस मुद्दे पर पक्ष- प्रतिपक्ष कमजोर है।
६५ प्रतिशत युवाओं वाले देश में शिक्षा और स्किल के स्तर पर रोजगार की उपलब्धता स्वयं में एक बड़ी चुनौती है। मुद्रा बैंकिंग के माध्यम से १२ करोड़ से अधिक लोकन धारकों को रोजगार की श्रेणी में सरकार गिनती है जो पूरी तरह गले नहीं उतरती है | वर्ष २०२७ तक भारत सर्वाधिक श्रम बल वाला देश होगा। अर्थव्यवस्था की गति बरकरार रखने के लिए सोजगार के मोर्चे पर भी खरा उतरना होगा। भारत सरकार के अनुमान के अनुसार साल २०२२ तक २४ सेक्टरों में ११ करोड़ अतिरिक्त मानव संसाधन की जरूरत होगी। ऐसे में पेशेवर और कुशल का होना उतना ही आवश्यक है। सर्वे कहते हैं कि शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी की स्थिति काफी खराब दशा में चली गई है। १८ से २९ वर्ष के शिक्षित युवा में बेरोजगारी दर १०.२ प्रतिशत जबकि अशिक्षितों में २.२ प्रतिशत है ।स्नातक क्षेत्र में बेरोजगारी का दर १८.४ प्रतिशत पर पहुंच गई है। उससे उपर भी हालर ठीक नहीं है |
इसमें कोई दो राय नहीं कि सभी को सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती। ऐसे में स्वरोजगार एक विकल्प है। रोबोटिक टेक्नोलॉजी से नौकरी छिनने का डर फिलहाल बरकरार है इसमें संयम बरतने की आवश्यकता है। ऑटोमेशन के चलते इंसानों की जगह मशीनें लेती जा रही हैं इससे भी नौकरी आफत में है। छंटनी के कारण भी लोग दर-दर भटकने के लिए मजबूर है। जो बेरोजगार बाहर घूम रहे हैं उनके लिए रोजगार सेक्टर में नये उप-सेक्टर सृजित किये जायें। यह सब आने वाली सरकार को करना होगा |