भारतमाता, बुलेटवाहिनी…!

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जयरामशुक्ल

इस चुनाव बाद काफी कुछ नया होने वाला है। आज जहां गाांव दिख रहे हैं वहां कल शहर उग आएंगे। भारतमाता ग्रामवासिनी नहीं रह जाएंगी। सवारी के लिए बुलेट ट्रेनों का इंतजाम किया जा रहा है।

गरीब रिसॉर्ट में रहेंगे,हर महिलाओं के पास नेटफ्री एंड्रॉयड मोबाइल होगा, बच्चे पैदा होते ही कम्यूटर से खेलेंगे। किसानों की खेती कारपेरेट्स करेंगे, उसके एवज मे जो नगदी मिलेगी उसे वे शॉपिंगमॉल में उड़ाएंगे।

कल्लूलाल की पार्टी का घोषणापत्र लल्लूलाल की पार्टी के पिछले घोषणापत्र से एक कदम आगे है। उनका चुनावी दस्तावेज इनके खयाली दस्तावेज के सामने जरा फीका है। दोनों में जो सपने दिखाए गए हैं वो कोई नए नहीं हैं।

जिंदगी की मगजमारी में आदमी जिसे कि वोटर कहा जाता हेै ,भूल जाता है कि पांच साल पहले जो घोषणा पत्र आया था उसकी इबारत क्या थी।

वैसे चुनावी घोषणापत्र के वादों पर वाकई अमल होता तो अब तक भारत एक बार फिर सोन चिरैय्या बनकर चहकता। पर ऐसा हो न सका।

राजनीतिक दलों के ये चुनावी संकल्प सत्ता में आते ही इन्हें न सिर्फ भूल जाते हैं अपितु ठीक इससे उलट चलने लगते हैं।

विषमता की खाई और चौड़ी होती जाती है। देश के हालातों की नग्न सच्चाई ये आांकडे़ स्वमेव बयान कर देते है। अमीरों के मामले में अपना देश अमेरिका, चीन के बाद तीसरे नंबर पर है। देश की 98 प्रतिशत दौलत महज दो प्रतिशत अमीरों के पास बंदी है।

इसके उलट करोड़ों परिवारों के घर में आज भी बिजली नहीं, जबकि अंबानी बंधुओं के लिए जितनी घरेलू बिजली खप जाती है उतने में एक लाख की आबादी वाला एक कस्बा रोशन हो सकता है।

भूख के सूचकांक यानी हंगर इनडेक्स में भारत का स्थान 120 देशों में 63वें क्रम पर है। दुनिया के 21 प्रतिशत कुपोषित बच्चे अपने देश में ही रहते हैं यानि कि इस मामले में हम अफ्रीकी देशों की जमात में शामिल हैं। देश मे 3 करोड़ लोग आज भी गुलामों जैसा जीने के लिए अभिशप्त हैं।

दुनिया के 200 विश्वविद्यालयों में देश का कोई विश्वविद्यालय शामिल नहीं। इन बातों का जिक्र इसलिए सन् 52 से लेकर अब तक इन्हीं मुद्दों को केन्द्र पर रखते हुए घोषणापत्रों के ख्याली पुलाव पकाए गए हैं।

यदि तब से अब तक के सभी घोषणापत्रों को मिलाकर एक किताब का रूप दिया जाए तो कई भागों में जो महाग्रंथ तैय्यार होगा वह दुनिया का सबसे बड़ा झूठपुराण होगा।

झूठ बोलने में वैसे अपना जाता भी क्या है। एक झूठ को साधने के लिए दूसरे झूठ बोलते जाओ, झूठ पर झूठ फिर झूठ पर झूठ एक ऐसा वितान तान दों कि वोटर अगले पांच साल तक इसी की भूल-भूलैय्या में घनचक्कर खाता रहे। चुनाव आए तो फिर उसी झूठ को नए मुलम्मे की तरह पेश कर दो।

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