असमय मौतों पर सवाल क्यों न हो…?

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ज़हीर अंसारी
लोकसभा के चुनाव की तपिश गर्मी के तापमान के साथ-साथ बढ़ती जा रही है। राजनैतिक दल अपनी म्यानों से तलवार निकाल चुके हैं। भोर से लेकर मध्य रात्रि तक ज़ुबानी तलवारबाज़ी चल रही है। इधर दलीय समर्थक सोशल मीडिया पर दौंदरा मचाए हुए है। कोई दार्शनिक की तरह ज्ञान बघार रहा है तो चिंतक बनकर। मानो चुनाव दल नहीं समर्थक लड़ रहे हैं। हालाँकि समर्थक और वोटर ही मिलकर सरकार बनाते हैं लेकिन जिन मुद्दों पर बहस और चर्चा होनी चाहिए, उनको न तो राजनैतिक दल छू रहे हैं और न ही समर्थक। वोटर बेचारा निरर्थक फ़ुटबाल बना कभी इस गोल पोस्ट की तरफ़ देखता है तो कभी उस तरफ़। इस तरफ़ और उस तरफ़ के फेर में वोटर अपनी जान की सुरक्षा तक पर विचार नहीं कर पाता। सरकारी मशीनरी और अराजक सिस्टम की वजह से हर साल लाखों लोग असमय मौत के मुँह में चले जाते हैं।

हम बातें इक्कीसवीं सदी की करते ज़रूर हैं मगर सियासत और सोच वही पुरानी है। राष्ट्रवाद से लेकर जात-पात तक वोटों का गणित बिठाते हैं। और मुद्दों की तरह असमय होने वाली मौतों पर न समाज और न ही राजनैतिक दल चर्चा को तैयार हैं। बदक़िस्मती कि इनकी सोच चुनाव जिताऊ फ़ार्मूले तक सिमटकर रह गई है। नासमझ जनता भी कॉमन मुद्दों को बड़ा मुद्दा मानकर अपने भविष्य के साथ खिलवाड़ कर जाती है। तात्कालिक लाभ अथवा राजनैतिक प्रभाव में फँसकर भावी पीढ़ी के जीवन से खेल जाती है।

देश में असमय होने वाली मौतें एक बड़ा मुद्दा है। इस मुद्दे पर कोई भी पार्टी आश्वासन तो छोड़ चर्चा तक नहीं करती। सरकारी आँकड़े बताते हैं कि देश में सड़क दुर्घटनाओं में हर साल 55-60 हज़ार लोग मर जाते हैं और लाखों घायल हो जाते हैं। इनमें से कई हज़ार आजीवन विकलांगता से जूझते रहते हैं। इसी तरह क़रीब 15-17 हज़ार पैदल चलने वाले असमय मौत के काल में समा जाते हैं। इसके अलावा देश के लगभग 10-12 लाख लोग वायु प्रदूषण की वजह से हर साल असमय मर रहे हैं। स्टेट आफ ग्लोबल एयर की 2019 रिपोर्ट कहती है कि भारत में सिर्फ़ सन 2017 में 12 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण के कारण हुई। वायु प्रदूषण से स्ट्रोक, मधुमेह, दिल का दौरा और लंग्स कैंसर जैसी बीमारियाँ बहुतायत में बढ़ रही है। द लैंसेट काउंटडाउन की रिपोर्ट कहती है कि 2015 में 1.24 लाख लोगों की मौत घरों के भीतर होने वाले वायु प्रदूषण की वजह हुई है। कमोबेश हर हाल इतनी असमय मौतें होती हैं। वजह साफ़ है कि भारत के 60 फ़ीसदी घरों में आज भी ठोस ईधन से खाना बनता है, सड़कों पर वाहनों का भारी दबाव बढ़ गया है, पर्यावरण संरक्षण के लिए सिर्फ़ काग़ज़ी घोड़े दौड़ रहे हैं, प्रदूषण दिनों दिन बढ़ रहा है।

बहैसियत वोटर हम सिर्फ़ तात्कालिक लाभ और मुफ़्त की योजनाओं को लपकने की मानसिकता तक सीमित रह गए। पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण रोकथाम और ट्रेफ़िक एक्ट पर कोई सवाल नहीं करता और न ही राजनैतिक दल इस विषय पर चिंतित दिखाई पड़ते हैं। असमय जाने वाली जानों के लिए बहुत ज़रूरी है कि वोट करने से इस विषय पर प्रत्याशियों से जवाब लिया जाना चाहिए। पूछा जाना चाहिए कि वोट ज़रूरी है या असमय होने वाली मौतों को रोकने प्रयोजन।