कपड़े और थाईलैंड ट्रिप भी मुफ़्त चाहिए….

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ज़हीर अंसारी

बस गुरु कपड़े और थाईलैंड ट्रिप और मिल जाए तो ज़िंदगी झक़ास हो जाए। जीवन में आनंद ही आनंद। फिर अपुन की लाइफ़ भी मस्त बीतेगी। अपन भी टाटा-बिडला की तरह ऐश करेंगे।

कुछ इस तरह की चर्चा कल्लू स्वामी और उनका पक्का चेला मल्लू स्वामी आपस में कर रहे थे। दोनों संकरी गली में गुंडई की दम पर पार्क की जाने वाली आटो में बैठे गपशप कर रहे थे। देशी अंगूरी जूस की ठंडक उनके कलेजे तक और सुरुर खोपड़ी के ऊपरी माले तक ज़ोर मारने लगा था। कल्लू स्वामी मल्लू को समझा रहे थे कि बेटा मुफ़लिसी क्या होती है, अब जाकर सियासी नेताओं को समझ आने लगी है। नेताओं को पता है कि जब उनकी औक़ात और हैसियत जनता न समझे तो ग़रीब कार्ड फेंक दो। उन्हें लालच दो। ग़रीब ही नेताओं के लालच को बख़ूबी समझता है। ग़रीब क़ौम इतनी मासूम और नादान है जो चुनाव के वक़्त नेताओं द्वारा फेंकी गई थोड़ी सी लालीपाप चाटकर ख़ुश हो जाती है और नेताओं को पाँच साल के लिए ओरिजनल ब्लैक चाकलेट की फ़ैक्टरी में बिठाल देती है। हम ग़रीब एक दिन चाकलेट चाट कर बल्ले-बल्ले कर लेते हैं, बदले में वो हमें और देश को पाँच सालों तक चाटते रहते हैं। नेताओं और दलों की चाटने की स्पीड इतनी तेज़ होती है कि दीमक भी ख़ुद पर शर्माने लगे।

अरे गुरु, आप काहे टेंशन पाल रहे हो। अगर सरकार, नेता और समाज ने आपके हुनर को समझ पाती और शिक्षा-संसाधन उपलब्ध करवा देती तो आप भी इंकमटैक्स पेयी होते। ग़रीबों के पास अक़्ल और हुनर की कमी नहीं है मगर सरकारी अनदेखी की वजह से मुनासिब मौक़ा नहीं मिल पाया जिसकी वजह से ग़रीब, ग़रीब ही बना रह गया। अब ग़रीब भी ग़रीब ही रहना चाहता है। उसकी सोच-समझ पर लालच का पर्दा पड़ चुका है। लालच में आकर किसी भी ऐरे-ग़ैरे को अपना रहनुमा बना लेता है। जो अच्छी शिक्षा और समान अवसर देने से घबराते हैं। जात-पात, धर्म-अधर्म, आरक्षण और असली-नक़ली नागरिक की बातें करके वोटों की फ़सल काटते हैं। यही तरीक़ा नेताओं को आसान लगता है।

ख़ैर गुरु आप टेंशन क़तई न लो। अब ग़रीबी में भी ऐश है। मुफ़्त अनाज, नमक, इलाज, शिक्षा, मकान, बिजली के साथ साथ पैदाईश से लेकर शादी-ब्याह और मृत्यु तक का ख़र्चा सरकारें उठा रही हैं। अब न्यूनतम आय भी फ़िक्स हो गई है। बारह हज़ार रुपया महीना मिलेगा, अगर उनकी सरकार बनी तो। वैसे इन्होंने ने भी पंद्रह लाख रुपए का वायदा किया था मगर अफ़सोस जुमलों की आँधी में 15 लाख उड़ गये। हो सकता है अब ये भी 15 सालों तक लाख रूपए साल देने का वचन दे दें।

बात तो सही कह रहा बे मल्लू। अपन काहे टेंशन लें। बाप का मकान, बाक़ी सब सरकार का। 72 हज़ार मिले या लाख, आएँगे तो अपने खाते में। अपन को तो सिर्फ़ बटन दबाना है। चिंतन-मनन वो करें जो ग़रीबी रेखा से ऊपर हैं या अमीर हैं।

ठीक कह रहो हो गुरु। दल और नेता ऐसे ही कृपालु बने रहे, मुफ़्तखोरी कराते रहें, अपना खाना-जीना और पीना आसान हो जाएगा।
देश की अर्थ-व्यवस्था, किसान, रोज़गार और ढाँचागत विकास गर्त में जाए हमें क्या। हमारी आड़ में वो मलाई छाने, गुलछर्रे उड़ाएँ, तीन-चार पीढ़ी के लिए धन-संपदा जुटाएँ, हमें क्या।

बस गुरु दो कमी रह गई। सब कुछ मुफ़्त में मिल रहा है। कपड़े और थाईलैंड ट्रिप और मुफ़्त करवा दो। कह दो दलों से आनंदम केंद्रों की जगह ब्राण्डेड कपड़ों का मुफ़्त आउटलेट खुलवा दें और साल में कम से कम एक बार थाईलैंड या बाली का टूर करवा दें। माँ क़सम जो दल ऐसा करेगा उसे मेरी सात पीढ़ियाँ वोट देती रहेंगी।

दोनों की गपशप और आगे चल पाती उसके पहले ही दोनों आटो की पटिया पर औंध गए।