सरकार की मंशा बैंकों के सुधार में नहीं थी

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राकेश दुबे

आज चुनाव की दहलीज पर खड़ी भाजपानीत सरकार ने वादा किया था कि वह बैंक संचालन को बेहतर बनाएगी और जवाबदेही सुनिश्चित करेगी। सरकार के पांच वर्ष के शासन के बाद भी बैंकों के चेयरमैनों की अतीत की या हालिया गड़बडिय़ों, भारतीय रिजर्व बैंक की बैंकिंग निगरानी शाखा या वित्त मंत्रालय में निरंतर मजबूत होती बाबूशाही को लेकर कोई जवाबदेही सुनिश्चित करने का काम नहीं हुआ है। यही कारण है कि ऋण देने में होने वाले भ्रष्टाचार, बड़े पैमाने पर होने वाले नुकसान और बैंकों के पुनर्पूंजीकरण आदि को लेकर कुछ खास नहीं हो सका है। इससे भ्रष्ट और नाकारा बैंकों में जनता की अरबों रुपये की राशि निंरतर इस तंत्र को सुचारु रूप से चलाते रहने के लिए इस्तेमाल होती रही है। परिणाम स्वरूप देश की आबादी का २५ प्रतिशत हिस्सा अत्यधिक गरीबी में जीवन बिता रहा है।
सरकारी बैंकों में तीन तरह का भ्रष्टाचार देखने को मिला है। कुटिल कारोबारियों को भारी भरकम ऋण देने का मामला इनमें से एक है और यह उच्चतम स्तर पर राजनीतिक हस्तक्षेप से संभव होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसे ही फोन बैंकिंग कहते हैं। दूसरा है दिवालिया कंपनियों को लेकर नियामकों, रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय के बीच सहानुभूति का मामला। इन्होंने फंसे हुए कर्ज के निपटान की प्रक्रिया में नियमित रूप से समझौते किए। आरबीआई की सीडीआर, एसडीआर, एस४ आर, सीडीआर२ और ५/२५ जैसी योजनाएं फंसे हुए कर्ज को निरंतर जारी रखने का जरिया भर थीं।
यहाँ यह याद रखना जरूरी है कि ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता को लागू करने के साथ-साथ ‘प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन’ की परिभाषा में बदलाव, बैंकों द्वारा किसी ऋण को डिफॉल्ट घोषित करने के समय में बदलाव से लेकर राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट द्वारा कई अपवाद आदेशों तक अनेक परिवर्तन भी किए गए हैं। सरकारी बैंकों से दिए जाने वाले ऋण में तीसरी समस्या है शाखाओं से लेकर क्षेत्रीय कार्यालयों तक में छोटे मोटे ऋण जारी करने से लेकर उनको बट्टे खाते में डालने तक में होने वाला भ्रष्टाचार। मोदी सरकार के कार्यकाल में राजनीतिक हस्तक्षेप में जो कमी आई है वह फंसे हुए कर्ज के संबंध में एक बड़ा कदम है लेकिन उससे समस्या हल नहीं होने वाली। बल्कि निरंतर नई पूंजी डालने से समस्या आगे भी जारी रहेगी।
सरकारी बैंकों को लेकर क्या किया जा सकता है, जबकि हम यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि अकेले पूंजी डालने से इसकी समस्या दूर नहीं होने वाली। एक नजर डालते हैं नायक समिति की रिपोर्ट की अनुशंसाओं को लागू करने संबंधी बयान पर। समिति ने अपनी रिपोर्ट मई २०१४ में सौंपी थी। उसी वक्त केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आई थी जिसका नारा था, ‘न्यूनतम सरकार अधिकतम शासन।’ सरकार का यह भी कहना था कि ‘कारोबारी जगत में सरकार के हस्तक्षेप की कोई वजह नहीं।’ ऐसी सरकार जो साहस, संचालन, समझ और लचीलेपन के मानकों पर गर्व करती है, उसने ठीक पिछली सरकारों की तर्ज पर सरकारी बैंकों की समस्या खत्म करने की दिशा में आधारभूत कदम उठाने से दूरी बनाए रखी है। अर्थात भविष्य की सरकारों के अधीन भी सरकारी बैंक भ्रष्टाचार से ग्रस्त ही रहेंगे, राजनेता तब भी उन्हें प्रभावित करेंगे, विकृत पूंजीवाद हावी रहेगा और नियामक विफल होते रहेंगे।