पहली बार तनख़्वाह को मोहताज बीएसएनएल…..

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ज़हीर अंसारी .

हिंदुस्तान की सबसे बड़ी दूरसंचार कम्पनी एमटीएनएल और बीएसएनएल भारी घाटे में चल रही हैं। घाटे की वजह से इन दोनों कम्पनियों की आर्थिक स्थिति इतनी बदतर हो गई है कि तनख़्वाह बाँटने के लाले पड़ गए हैं। दूरसंचार विभाग की स्थापना के बाद ऐसा पहली बार हो रहा है जब कर्मचारियों को वक़्त पर वेतन नहीं दिया गया। अधिकारी और कर्मचारियों को फ़रवरी माह की तनख़्वाह अब तक नहीं मिली। इस बात को लेकर स्टाफ़ का जहाँ आक्रोश बढ़ रहा है तो वहीं सरकार को लेकर तरह की नकारात्मक बातें कही जा रही हैं।

बीएसएनएल कर्मचारी संगठनों का सीधा आरोप है कि प्रायवेट टेलीकाम कम्पनियों को पोषित करने सरकारी अंडरटेकिंग वाली एमटीएनएल और बीएसएनएल कम्पनियों की जड़ों में मठा डालकर सुखा दिया गया है। एक तरफ़ प्रायवेट कम्पनियों का मुनाफ़ा तेज़ी से बढ़ रहा है तो वहीं एमटीएनएल और बीएसएनएल की माली हालत का कचूमर निकाल दिया गया। समय-समय पर होने वाला अपग्रेडेशन जानबूझकर कर नहीं करवाया गया जिसकी वजह से इन कम्पनियों की उपभोक्ता संख्या में भारी गिरावट हुई।

जानकारी के मुताबिक़ नीति आयोग ने एमटीएनएल को एक हज़ार करोड़ रुपए की मदद वेतन बाँटने के लिए दी है मगर बीएसएनएल स्टाफ़ की सेलरी पर ऊपर तक सब मौन हैं। कम्पनी के डायरेक्टर और सीएमडी यूनियंस नेताओं से मिलने क़तरा रहे हैं। एक अफ़सर ने प्रायवेट संचार कम्पनियों का नाम लेकर बताया कि किस-किस को बीएसएनएल की रीढ़ तोड़कर लाभ पहुँचाया गया है। यह सब दिख सबको रहा है मगर विरोध का साहस कोई जुटा नहीं पा रहा है।

ये वाक़ई ताज्जुब वाली बात है कि बीएसएनएल स्टाफ़ को अभी तक फ़रवरी का वेतन नहीं मिला है। अभी तक इस तरह की ख़बरें राज्य सरकारों या स्थानीय निकायों से आती थीं कि कर्मचारियों को तनख़्वाह बाँटने लाले पड़े हैं, अब बीएसएनएल को इससे दोचार होना पड़ रहा है। यह स्थिति सिर्फ़ जबलपुर की नहीं बल्कि बीएसएनएल के 1 लाख 70 हज़ार कर्मचारी-अधिकारियों की है जिन्हें अब तक वेतन नहीं मिला।