रसोई से अंतरिक्ष तक 8 आना..

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स्नेहा चौहान

दुनिया और समाज की संघटना और अस्तित्व को स्त्री-पुरुष को साथ ही देखा गया। यह सह अस्तित्व की स्थापित मान्यता है। इसे अलग करके या आधी आबादी/पूरी आजादी के रूप में वर्णित करना भी कई मायनों में सच को आधा अधूरा बना देने जैसा है। दुनिया को चलाने या उसके चलने में स्त्री और पुरुष दोनों घटकों की भूमिका समान और बराबरी की है। बहुत पुरानी पर्दा, मर्यादाओं ने यह साबित किया कि हम कम नहीं। इसे मान सकते हैं कि महिलाओं ने कुछ करके बताया कि हमारे बिना भी सब कुछ नहीं। आध्यात्म, साहित्य समाज संस्कृति, सेना, देश, परिवार, कामकाज, पत्रकारिता, मनन, चिंतन, सिनेमा,कला, संगीत, शिक्षा, स्वास्थ्य, उत्थान, स्वतन्त्रता सहित कोई भी क्षेत्र या भूमिका रही हो महिला को नकारने की कोशिश पुरुष ने तो कम ही की है। हां महिलाओं के बीच से ही विरोध, बंदिश और भय की शुरुआत हुई।
हम किसी भी क्षेत्र में देखें जब भी मौका मिला या आगे आईं तो महिलाओं ने अपनी प्रतिभा से अचंभित ही किया। द्रौपदी, रानी लक्ष्मी बाई, दुर्गावती, नूरजहां, पद््मावती यदि युद्ध के उदाहरण हैं, तो अनुसूइया, मंदोदरी, तुलसी, सती को आध्यात्म में सम्मान से देखा जाता है। महादेवी वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान,अमृता प्रीतम, इश्मत चुगतई, महाश्वेता देवी कात्यायनी, ममता कालिया,बाबुषा कोहली, शिवानी का नाम साहित्य के अधूरेपन को पूरा करता है। खिलाडिय़ों में पीटी ऊषा, करणम मल्लेश्वरी, सानिया मिजा, सायना नेहवाल, मेरी कॉम, मधु यादव की धमक पदकों की खनक सुनाती है। मधुबाला, मीना कुमारी, दुर्गाखोटे, वहीदा रहमान, राखी, रेखा, करीना कपूर, नूतन की लम्बी परम्परा आज भी कायम है। हर दिन एक चेहरा उभरता और क्षितिज पर स्थापित हो जाता है। महिलाओं के योगदान को जब संगीत-कला में देखते हैं तो लता मंगेशकर के सुर और ख्याति पुरुष गायकों के लिये अभी भी चुनौती है। ये ऐसी बातें नहीं हैं जो पहली बार लिखी जा रही हों या महिला के पक्ष में समर्थन जुटाने की कोशिश है। स्त्री की भूमिका और उसके सच को लेकर उठती आवाजों का यह जवाब है कि महिलाएं आधी आबादी भले ही कही जाएं, लेकिन 8 आना पुरुष को 16 आना टंच बनाने के लिये अनिवार्य है, तभी इस दुनियाको दौड़ाया चलाया और संवारा जा सकता है। अपने अस्तित्व को बचाय रखने की जद्दोजहद के बीच महिलाओं को मान लेना होगा कि दुनिया के हर क्षेत्र में उसकी हिस्सेदारी बराबरी की है। स्त्री विमर्श, स्त्री पक्ष, स्त्री अस्तित्व को सहानुभूति के बाहर निकलकर स्थापित करने पर बहस चले यही आधी आबादी का सच होगा। घर के किचिन से अंतरिक्ष चंद्रमा तक अपने पद चिन्ह जमाने वाली महिला अब खैरात की दरकार नहीं रखती। उसे कृपा और सहयोग नहीं, हक-हुकूक को पाना है। कमजोरी नहीं ताकत बनना है। देश की सेना, पुलिस, प्रशासन, राजनीति पत्रकारिता में आधुनिक युग में महिलाओं ने अपनी मौजूदगी दर्ज की है। यह निरंतर यात्रा है। इसमें विश्राम की जगह नहीं है। अब महिलाओं को अपना आदर्श बनाने के लिये किसी पुरुष को रोल मॉडल चुनने की शायद जरूरत नहीं है। दुनिया में ऐसे ढेरा व्यक्तित्व हैं जो महिलाओं के बीच में हैं। इंदिरा गांधी, सरोजनी नायडू, सुषमा स्वराज, ममता बैनर्जी, सुमित्रा महाजन, प्रतिभा पाटिल, मेघा पाटकर, मृणाल पाण्डे, प्रभा दत्त, नीरजा, गीताश्री, नीता शर्मा, निधि कुलपति, अमृता राय सिंह, बरखा दत्त, सोनिया गांधी ,प्रियंका गांधी वडेरा सहित सैकड़ों नाम हैं जो अलग-अलग क्षेत्रों में रुचि रखने वाली लड़कियों को प्रेरित कर सकते हैं। असल में बराबरी और आधी आबादी के आगे बढऩे में कोई दिक्कत नहीं है। छोटी रुकावटें सभी को हैं, चाहे पुरुष हो या महिला। जरूरत है ढृढ़ विचार, संकल्प, प्रतिबद्धता, जीवट, साहस, निश्चय, समर्पण, लगन और कड़ी मेहनत की। बस यहीं बात पर अटकती है। शार्टकट एप्लीकेशन कहीं नहीं है। मी टू… केम्पन का समर्थन या हाय तौबा हमें कमजोर करती है। यह मान लेना कि यह आवाज उठाने का साहस है मी टू…। गलत होगा। इसमें कुचेष्टा भी हो सकती है। किसी बुरी बात का तत्काल विरोध न करना कैसे सही माना जा सकता है। दूसरे आधुनिकता पर भी बात कर लेना चाहिये। यह वह दौर है जब कुछ भी यानि कुछ भी करना, कहना, लिखना या प्रदर्शित करना आधुनिक नहीं हो सकता। आज के दौर में स्त्री विमर्श का विषय शोषण, उत्पीडऩ, प्रताडऩा न होकर आधुनिकता होना चाहिये। यदि आधी आबादी कुछ मिसाल कायम करना चाहती है तो उसे बहस करना चाहिये कि वह भौतिक रूप (पहनावा, प्रदर्शन) से आधुनिक है या वैचारिक (विचार, मानसिक, चिंतन) रूप से। इसका अच्छा उदाहरण अरुंधति राय है। बहस जारी रहे और 8 आना + 8 आना = 16 आना की जोड़ी।