कब बदलेगी सिवनी जिले की तकदीर

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आनंद खरे

सिवनी *मध्यप्रदेश* = सिवनी जिले की तकदीर बदलने के लिये कमजोर नेतृत्व और बाहरी राजनैतिक शक्तियों के हाथों में जिले के नेतृत्व की निर्भरता से मुक्ति पाये बिना जिले का भविष्य नही सुधारा जा सकता। लंबे समय से जिले का नेतृत्व बाहरी अस्थिर राजनैतिक व्यक्तियों द्वारा किया जा रहा है। जिसका दुखद परिणाम यह है कि जिले का जो विकास होना चाहिऐ वह नही हो सका। जिले के राजनैतिक व्यक्तियों की शक्तियाॅं बाहरी व्यक्तियों के हाथों में होने से जिले के हितों के साथ बड़ा खिलबाड हो रहा है। जिले में शक्ति संपन्न राजनैतिक नेतृत्व पैदा करने की आवश्यकता जिले के हित में सार्थक पहल होगी। शक्ति संपन्न नेतृत्व पेदा करने के लिये जिले के जनमानस को सामूहिक प्रयास करने की आवश्यकता है। जिले के हितो पर जो विपरीत प्रभाव पड़ रहा है वह बाहरी और अस्थिर राजनैतिक शक्तियों के कारण है जिले के जनमानस में वह जागृति आवश्यक हे कि जिले के राजनैतिक दलों को विकास के मुददो पर एक मत से कार्य करने का समर्थन प्राप्त हो और जिले के विकास से समझौता करने वाले व्यक्तियों का पुरजोर विरोध हो। जिले के राजनैतिक अतीत का यदि सिहालोकन किया जाये तो स्पष्ट हो जायेगा कि जिले में जनता से जुड़े हुये नेताओं का आभाव रहा है। राजनैतिक दल तय करते है कि कौन व्यक्ति जनता का नेता होगा। जनता के बीच उसकी लोकप्रियता या किये कार्याे से उसका कोई संबंध नही होता। किसी एक राजनैतिक दलों की स्थिति है।
थोपे नेताओ का प्रचलन- नये राजनैतिक व्यक्ति को जिले की जनता पर थोप दिया जाता है और वह जनता का समर्थन प्राप्त कर पाॅच साल कार्य करता है जनता से जुडता है उनकी समस्याओं को समझते हुये कार्य करने का मन बनता है तो उसे राजनैतिक दल दूसरा मौका भी नहीं देते और बदल दिया जाता है। सिवनी जिले से जुडे़ इस राजनैतिक सोच के कारण जिले में सशक्त नेतृत्व पैदा नहीं हो पा रहा है।
देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा के संदर्भ में यदि सिंहालोकन किया जाये तो स्पष्ट हो जायेगा कि जिले की इस मामले में दुर्भाग्य पूर्ण स्थिती रही है। सन् 1997 में सिवनी संसदीय क्षेत्र का निर्माण हुआ तब यहां से जनता पार्टी के निर्मल चंद जैन चुनाव जीते जिनका कार्यकाल महज ढाई साल रहा। इसके पश्चात 1980 एवं 1984 के निर्वाचन में गार्गीशंकर मिश्रा निर्वाचित हुये जिनका सिवनी जिले से जीतने तक सारोकार रहा। 1989 में प्रहलाद पटेल निर्वाचित हुये परंतु इनका कार्यकाल भी एक वर्ष का ही रहा 1991 में मध्यावती चुनाव हुये जिसमें सुश्री विमला निर्वाचित हुये।1996 के निर्वाचन में प्रहलाद पटेल पुनः निर्वाचित हुये परंतु इनका कार्यकाल फिर ढाई साल का ही रहा। 1998 में मध्यावती चुनाव हुये जिसमें पुनः सुश्री विमला वर्मा निर्वाचित हुई परंतु इनका कार्यकाल भी लंबा नही चला एक साल के बाद ही चुनाव फिर चुनाव हो गये जिसमें रामनरेश त्रिपाठी भाजपा के चुनाव जीत गये यह सिवनी में कम समय ही दे पाते थे। 2004 के लोकसभा चुनाव में श्रीमति नीता पटेरिया सिवनी संसदीय क्षेत्र की अंतिम सांसद के रूप् में निर्वाचित हुई और इसके बाद परिसीमन में यह लोकसभा विलुप्त हो गयी। सिवनी जिले की राजनैतिक भौगोलिक स्थिती से भी इनका बहुत परिचय नहीं था पहली बार सांसद बनी थी वह विकास का कीर्तिमान स्थापित नहीं कर पायी जो जिले की अपेक्षा थी।
2009 के निर्वाचन में सिवनी जिले की दो विधानसभाएॅं बालाघाट और दो विधानसभाएं मंडला जिले में विभाजित हो गयी । मंडला लोकसभा से कांग्रेस के बसोरी सिंह चुनाव जीते और बालाघाट संसदीय क्षेत्र से के.डी. देशमुख निर्वाचित हुये। मंडला निर्वाचित बसोरी सिंह निष्क्रिय सांसद रहे तो के.डी. देशमुख का सिवनी जिले की राजनीति से कोई सारोकार नहीं। सन् 2014 के निर्वाचन में मंडला से फग्गनसिंह कुलस्ते निर्वाचित हुये और बालाघाट लोकसभा चुनाव क्षेत्र से बोधसिंह भगत निर्वाचित हुये। संासद कुलस्ते जहां जिले के लिये कोई विशेष कार्य नहीं कर सके वहीं बोधसिंह भगत जिले की राजनैतिक के विकास की अटकी योजनाओं को गति देने में मेहनत करते रहे पहली बार सांसद निर्वाचित हुये थे। दूसरी बार कुछ उम्मीद की जा सकती है परंतु इन्हें भाजपा दुबारा टिकिट देती है या नहीं यह सुनिश्चित नहीं है।