चित्रकूट में रावण के ‘रामराज्य’ के पीछे हमसब

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जयराम शुक्ल

राम के पतित पावन चित्रकूट में रावण-खरदूषण-त्रिसरा-विराध जैसे राक्षसों की संतानें कैसे फलफूल रही हैं, हाल ही की कारुणिक और पीड़ादायी घटना बताती है। बिना किसी रंजिश के महज रूपयों के लिए दो मासूमों का अपहरण और फिरौती वसूलने के बाद भी जिस अंदाज में हत्या की गई उससे तो किसी दुर्दांत राक्षस का भी कलेजा हिल जाए।

आरोपियों के बारे में जो जानकारी निकलकर आ रही है वह सामाजिक जीवन में विश्वास की नींव को हिलाकर रख देने वाली है। मुख्य आरोपी उस ट्रस्ट द्वारा संचालित मंदिर के पुरोहित का बेटा है जिसकी स्कूल में वे दोनों मासूम पढ़ते थे। बच्चों को जंजीर से जकड़कर यमुना नदी में फेंकने वाला उन बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता था। किसी को इन दरिंदों की करतूतों की भनक न लगे इसकी तकवारी वह आरोपी कर रहा था जिसका बाप स्कूल का प्रमुख सुरक्षा अधिकारी है।

3 आईजी, 5 एसपी, 500 पुलिस घेरा डाले पड़ी रही और दरिंदे घटना स्थल की 3 किलोमीटर की परिधि में ही रहकर फिरौती की सौदेबाज़ी करते रहे। मुख्यमंत्री को एक बड़ा क्लू मिल गया कि आरोपियों के वाहन में विरोधी पार्टी का झंडा था। इस दर्दनाक घटना में भी सियासत की छौंक लग गई।

एक सधारण सी रेल दुर्घटना को अपने सिरपर लेकर त्यागपत्र देने वाले लालबहादुर शास्त्री की पार्टी के राजनीतिक वंशधरों से यह उम्मीद लगाई जा रही थी कि वे खुद चित्रकूट पहुंच कर इस घटना की माँनिटरिंग करेंगे और उन दो फूल जैसे मासूमों की जिंदगी बचाने में अपना सर्वस्व लगा देंगे। पर ऐसी उम्मीद करना अब भूल ही है। इन्हीं दिनों मुख्यमंत्री व उनके कई मंत्रीगण विंध्यक्षेत्र के भ्रमण में थे लेकिन उनका मकसद लोकसभा के लिए माहौल बनाने का था। वे फूलमाले, बैंडबाजे, जिंदाबाद, हमारा नेता कैसा हो के शोर में मदमस्त थे।

चित्रकूट की घटना के लिए कोई एक दोषी नहीं है। हमसब हैं जो एक केचुए कापुरुष की भाँति रहे आए और उन मासूमों की रक्षा नहीं कर सके। यह अपराध कोई एक दिन की प्रक्रिया का दुष्परिणाम नहीं है। हम पिछले कई दशकों से चित्रकूट को ऐसा ही गढ़ते आ रहे हैं।

यहां यूनिवर्सिटी खुली, सेवा के पाँचसितारा आश्रम बने, संतमहंत और मोटे हुए,आश्रमों का टर्नओवर बढ़ा लेकिन इसके साथ ही साथ चित्रकूट न किस्म के अपराधों की शरणास्थली में ढलता रहा। यह नशे के कारोबारियों का सेफहैवेन बनता रहा। मंत्री, नेता, अफसर मठाधीशों और भूमाफियाओं से मिलकर बुढापे में अपने तरने के इंतजाम में लगे रहे। पाँच दशक में ये चित्रकूट क्या से क्या हो गया..?

45 साल पहले मैं अपनी दादी के साथ दीपावली मनाने चित्रकूटधाम गया था। दादी ने बताया था कि मंदाकिनी में दीपदान करने से सरग (स्वर्ग) का दरवाजा सीधे खुल जाता है। मेरे अवचेतन में हमेशा दादी द्वारा बखान किया चित्रकूट रहा। भगवान कामतानाथ के दर्शन के बाद दादी ने प्रसाद, पूजा करने के लिए तुलसी की माला व भगवान की तस्वीरें लीं हीं, दूकानदार से चित्रकूट का असली नक्शा मांग बैठीं। दुकानदार अचकचा गया। उसके पास तस्वीरनुमा जो नक्शा था उस पर शायद किसी ने पहली बार संदेह किया। मेरी दादी निरक्षर थीं पर पता नहीं उनके मुंह से चित्रकूट के असली नक्शे की बात कैसे निकल गई।

आज 45 साल बाद एक पत्रकार के नाते चित्रकूट जाता हूं तो हर बार यही सवाल कौंधता है कि मेरी दादी वाले चित्रकूट का असली नक्शा कहां है..?

चित्रकूट आजादी के बाद से ही अभिशप्त है। दस्युजगत के रहस्यमयी (जिसकी जीते जी असली तस्वीर सामने नहीं आ पाई) डकैत ददुआ का दो दशक तक राज चला। वह 1984 में रामू का पुरवा नरसंहार और दर्जनभर रेलकर्मियों का अपहरण करके चर्चित हुआ था.। ददुआ जब तक चुनाव जिताने का औजार बना था तब तक जिंदा रहा। जब उसने अपनों को चुनाव में कुदाना शुरू किया तो मुठभेड़ में मारा गया। यद्यपि शेष परिवार अब भी सकुशल राजनीति में है।

दुदुआ मरा तो सुंदर आया, सुंदर के बाद बलखड़िया और अब तो इतने कि नाम गिन पाना मुश्किल, छोटे-बड़े कोई एक दर्जन से ज्यादा गिरोह. बबली, लवलेश, रजोलवा और पता नहीं कौन-कौन। फिलहाल दस्यु सुंदरी साधना का नाम चंग पर चढ़ा है। ददुआ से पहले खरदूषण, फौजी, सीताराम, हनुमान मारे गए थे. ये सबके सब लाखों के इनामी थे. दस-दस से ज्यादा कत्ल, डकैती और अपहरण दर्जनों में। कितना मारो ये बचे रहेंगे। तीस साल में छोटे-बड़े कोई तीन सौ मारे गए होंगे। रक्तबीज की तरह फिर जिंदा। यहां डकैत क्यों हैं…? इस यक्ष प्रश्न का जवाब सत्तर साल में भी सरकारें नहीं खोज पाईं

एनजीओ, समाजशास्त्री कहते हैं- चूंकि यहां कोई रोजगार नहीं, इसलिए डकैती ही रोजगार है। डाका नहीं डालेंगे तो खाएंगे क्या..? इस पूरे इलाके में 95 फीसद जोत की जमीन पांच फीसद लोगों के पास है, बाकी सब मजदूर.।मजदूरी करके या तो दादुओं (यहां के उच्च वर्ग के लोगों के लिए संबोधन) जूते खाओ या जंगल भागकर गैंग में शामिल हो जाओ।

शुरुआत में यहां डकैती की जड़ में चंबल की तरह स्वाभिमान और मूंछ का सवाल नहीं, वरन् आर्थिक विषमता रही है, पापी पेट का सवाल। लेकिन अब मूल बात यह ज्यादातर डकैत इसलिए यहां पलते पुसते हैं क्योंकि ये चुनाव में नेताओं के काम आते हैं। कई सालों तक तो उन्होंने नेताओं का साथ दिया जब ऐसा लगा कि ये हमारे दम पर ही राजनीति कर रहे हैं तो अपने परिवार व शागिर्दों को राजनीति में उतार दिया. इनमें से कई विधायक, सांसद, ब्लॉकप्रमुख, प्रधान हैं या थे।

ददुआ अब यहां सम्मानित नाम है और अब पूरा नाम शिवकुमार पटेल के साथ अदब से लिया जाता है। ददुआ का नाम वोटों के काम आता है। स्वर्गीय ददुआ का मंदिर भी बना है। ददुआ भी दादुओं के कथित जुल्म से तंग आकर जंगल में कूदा था। ददुआ ने डकैती को संगठित पेशे में बदलकर राजनीतिक गठजोड़ के साथ रसूखदार बना दिया था। मरने के बाद भी चित्रकूट के इलाके में डकैतों की मिसाल ददुआ ही बना हुआ है।

चित्रकूट में अकेली दस्यु समस्या ही नहीं है। यहां हर तरह की मानवनिर्मित विपदाएं हैं.।उनका ओर-छोर ढूंढना रुई के ढेर से सुई ढूंढने जैसा है। और उसे ढूंढना भी कोई क्यों चाहेगा, जब ये वोट बनाने या बिगाड़ने की सबब हैं?

शब्द यदि वाकई में ब्रह्म होते, तो इनकी अवहेलना करने वाले सारे पापी आज नरक में होते और इस धरती का बोझ कुछ कम होता। मैं ये इसलिए कह रहा हूं कि पिछले तीन दशक में भाई लोगों ने चित्रकूट की चिंता में इतने शब्द खर्च कर दिए कि वे अब अपनी अर्थवत्ता, महत्ता ही खो बैठे. कामदगिरि की परिक्रमा और मंदाकिनी में दीपदान देकर अपने पाप धोने आने वालों का पाप यहां के गरीब गुरबों के साथ ऐसे लिपटा है कि ये जीते जी ही नरकवासी बन गए।

चार साल पहले सतना के एक अखबार का संपादन करते हुए मैंने चित्रकूट में गांजा, चरस और स्मैक से बर्बाद होते परिवारों पर जीवंत स्टोरी करवाई थी। गांवों में जाकर रिपोर्टर ने मध्यप्रदेश-उत्तरप्रदेश के बीच सैंडविच बने इलाके से पच्चीस ऐसे परिवारों को खोजा था जिनके बच्चे स्मैक की लत में फंसे थे। तेरह परिवारों की पहचान के साथ उनका सिलसिलेवार ब्योरा दिया। इन तेरह परिवारों के कुलदीपक हमेशा के लिए बुझ गए। शेष बचे परिवारों में भी एक-एक कर मौत का सिलसिला जारी है। चित्रकूट की इस राम कहानी..पर प्रतिक्रिया में एक सोशल एक्टविस्ट अर्चन पंडित ने दोहा भेजा था, आप भी उसे पढ़िए…

‘चित्रकूट में देखिए धर्म-कर्म का स्वांग,

गुरु चेलों को बेचते गांजा, स्मैक, भांग’

अर्चन पंडित चित्रकूट के उत्तरप्रदेश के हिस्से में पाठा के वनवासियों के बीच काम करते हैं।उनसे तफ्सील से बात नहीं हो पाई लेकिन प्रतिक्रिया बताती है कि धंधा निर्विघ्न जोरदारी से चल रहा है।

भगवान राम ने जिस तपोभूमि में तेरह बरस जप-तप करते हुए बिताए आज वह चित्रकूट अपराधियों का सेफ हैवेन है। यहां रम रहे अपराधी इच्छाधारी राक्षसों की भांति बहुरूपिए हैं। किसी भी शक्ल में दिख सकते हैं। कुछ साल पहले एक आश्रम से एक कतली को दिल्ली पुलिस पकड़ ले गई थी। वह यहां साधु बनके रह रहा था. साधुओं के कई बार गैंगवार हो चुका है। गए साल एक साधू रेप के आरोप में अंदर हुआ है। इनके डेरे में अवैध असलहे मिल जाएं, तो भी ताज्जुब मत करिए। हां, यहां सब ऐसे नहीं हैं, कुछेक पूज्य संत और ग्यानी हैं, पर चित्रकूट अब उनके बस का नहीं रहा।

चित्रकूट नशे के कारोबार का हब है। गांजे की धूनी तो सुलगती ही है, स्मैक का जोर है जो युवाओं की जिंदगी लील रहा है। चित्रकूट के नशे के कारोबार के टर्मिनल का कनेक्शन महानगरों से जुड़ा है, पुलिस यह सब जानती है। दो प्रदेशों के बीच जब कोई हिस्सा फंसता है तो स्थिति बड़ी विकट बन जाती है। एक बार सतना और बांदा की सीमा पर कतल हो गया। लाश तीन दिन तक इसलिये पड़ी रही, क्योंकि उस अभागे का सिर यूपी में था और टांगें एमपी में। चित्रकूट में ऐसी घटनाएं प्रायः होती हैं। पुलिस हाथ झाड़ती हैं, अपराधी मजे मारते हैं।

चित्रकूट की पावनधरा में आकर सभी तरना चाहते हैं. सो जरूरी है कि यहां आश्रम बने। यूपी की पुलिस में नंबरी नोटेरियस एक अफसर ने रिटायर होकर बीच मंदाकिनी में ही कब्जा करके आश्रम बना लिया था। खुद ही नाम बदलकर 10008 फला महराज, फला सरकार लिखने लगा था। अखबारों में रिपोर्ट छपने के बाद चित्रकूट की नगर परिषद जागी और उस फर्जी महाराज का बेजा कब्जा हटाया। संभव है वो अब किसी पार्टी का उपदेशक बन चुका हो, राम जाने।

चित्रकूट की एक-एक इंच जमीन पर नजर है। अंदाजा लगा सकते हैं कि एक बार भगवान कामतानाथ के मुखारबिंद की जमीन की रजिस्ट्री हो गई थी। जो पुराने आश्रम हैं धीरे-धीरे उनके मठाधीश बदलते जा रहे हैं। नए महंतों का कारोबार जम रहा है, पुराने सड़कों पर भीख मांगने लगे हैं। कालोनियां बन रहीं, गरीबों की जमीन किस तरह औने पौने बंदूक की नोक पर हड़पी जा रही हैं सबकुछ ऑन रिकार्ड है।

एक बार खबर रुकवाने बंदूक के साथ अटैची भर नोट लेके अखबार के दफ्तर पहुंचे यूपी निवासी लेकिन चित्रकूट में कार्यरत, बाहुबली नेता-कम-प्रॉपर्टी डीलर ने मुंह खोलकर नाम गिनाते हुए बताया था कि किस किस नेता को वह प्लाट दिलवा चुका है। वह चाहता था कि अखबार की रिपोर्टिंग उसका धंधा खराब न करे।

चित्रकूट के भूमाफियाओं का दम इसी से पता चलता है कि जमीन के विवाद में फंसे पटवारी का तबादला यूं चुटकी में कैंसिल करवा लिया, कलेक्टर बगली झाकते ही रह गए। चित्रकूट में प्लाटों की कीमत लखनऊ, भोपाल से ज्यादा ही हैंं, कम नहीं। एक बार जाकर देख आइए प्रॉपर्टी डीलरों के मोबाइल नंबर पानठेलों में चिपके मिल जाएंगे।

जमीन का धंधा करने वाले और खदान खोदने वाले यहां मौसेरे भाई हैं। सती अनसुइया तरफ मंदाकिनी के कैचमेंट में आने वाले पहाड़ सफाचट हो चुके हैं। जहां कभी विराध जैसे राक्षस विचरते थे वहां पोकलेन, हाइवा, डंपर विचरते हैं। हड्डियों के ढेर पर बने जिस सिद्धा पहाड़ को देखकर भगवान् राम ने रोष में आकर उद्घोष किया था कि… निसिचर हीन करहु महि भुज उठाइ प्रण कीन्ह… उस सिद्धा पहाड़ का अस्थिपंजर पोकलेन निकाल ले गई, क्योंकि उसमें उम्दा किस्म का बाक्साइट था

चौरासी कोसी परिक्रमा, राम वनगमन पथ… वाह वाह बाते हैं बातों का क्या। ये सिर्फ़ प्रवचन और बुद्धिविलास में बची हैं। सरभंग आश्रम की सभी वेदियां खदान वाले खोद ले गए। ढूंढते रहिये राम वनगमन पथ। तो जमीन और खदान वाले भाई लोगों का यहां राज है. ये जो कहें वो सही। यही नेता, यही महंत, यही प्रवचनकार, यही जजमान। व्यवस्था भी जाकर इन्हीं के पायताने बैठ जाती है। बोलो सियावर रामचंद्र की जय। सो राम के चित्रकूट में यही सबकुछ बचा है सरहंगई, ढोंग, फर्जीगीरी, गरीबी, बेबसी, कुपोषण, लाचारी और इन सबसे ऊपर मख्खन जैसे शब्दों से कानों में शहद घोलने वाले प्रवचन, भाषण।

राम जब चित्रकूट पहुंचे तो वनवासियों ने उन्हें घेर लिया. उनकी दशा पर प्रभु को दया आई और इन्हें अपना संगी साथी बना लिया. इस पर वनवसियों ने कहा- नाथ मोर एतनइ सेवकाई। लेहुं न बासन,बसन चोराई।।

…राम ने इन अभागों को अपने साथ बैठाकर जो सम्मान बख्शा था हम भक्तों ने उसे छीन लिया और धकेल दिया भुखमरी के अंधकूप में। मेरा यकीन न हो तो चले जाइए मझगवां ब्लाक के रामनगर खोखला, कैलाशपुर, पड़मनिया जागीर. कुपोषण और भूख से बिलबिलाते बच्चों की खोजखबर के लिए सुप्रीम कोर्ट यहां अपने आब्जर्वर भेज चुका है. चुनाव में आए हैं तो लगे हाथ आप भी हो आइए… मैं तो अपनी दादी वाले चित्रकूट के असली नक्शे को आज भी खोजने में जुटा हूं।