जाकी पेंट न फटी-फटाई

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प्रभात गोस्वामी

जब से नई पीढी ने फटी-पुरानी जींस पेंटें धारण कीं हैं तब से गरीबों के सामने से उनकी पहचान का संकट खड़ा होने लगा है . उनको भ्रम हो रहा है कि दुनिया में गरीबी का ग्राफ बढ़ने लगा है या ये उनका दृष्टि भ्रम ही है . ये फटे- पुराने कपडे तो उनको बड़ी दयाभाव से दिए जाते थे . क्योंकि ऐसे कपडे आम -आदमी जब-तब पहनने को मजबूर होता था तब-तब उसे शर्म से पानी-पानी होना पड़ता था . यही कपड़े इनकी पहचान भी बन गए थे .
गरीबी हटाओ का नारा सुनते -सुनते कई -कई बसंत गुजर गए . कई -कई जवानियाँ बुढ़ापे की दहलीज़ पार कर काल-कलवित हो चुकीं पर ग़रीबों की राष्ट्रीय पोशाक तो यही तार-तार कपडे हुआ करते थे . इन्हीं कपड़ों को पहनने पर गरीबों को सभ्रांत वर्ग की झिडकियां भी सुनने को मिलतीं रहीं . पर, अचानक ये फटे कपडे सभ्यता की पहचान बन गए हैं . अपने बच्चों को ये कपडे पहने देख कर माता-पिता गर्व से फूले नहीं समा रहे .
ये अचानक ऐसा क्या हो गया कि देश के नव-जवानों को गरीबी इतनी सुहाने लगी ? पेंट और टीशर्ट से झांकते जिस्म आज शर्म नहीं गर्व का विषय बन गए ? गरीबदास बड़े दिनों से इस गुत्थी को सुलझाने का प्रयास कर रहा है . उसने गरीब बस्तियों का दौरा कर यह खोजने का प्रयास भी किया कि कहीं हमारे ही साथी दान में मिले कपडे तो नहीं बेच रहे ? पर, उसे ऐसा कुछ भी नज़र नहीं आया . फिर ऐसा क्या हुआ कि आज- सड़कों , गलियों , बाज़ारों, बड़े-बड़े माल्स में युवक-युवतियों के साथ ही कुछ प्रौढ़ व बूढ़े लोग भी फटी हुई जींस में गर्व के साथ खड़े दिखाई पड़ रहे हैं .
ये फैशन भी कैसे -कैसे रूप दिखाता है ! आदमी कभी बहरूपिया , कभी जोकर तो कभी किसी नए रूप में घनचक्कर हो रहा है . घरों की आलमारियां अब अच्छे कपड़ों की जगह फटे-पुराने कपड़ों से भरी पड़ीं हैं . आम आदमी की तरह गरीब दिखाई न पड़े इसके लिए मल्टीनेशनल कंपनियों ने भी गज़ब की बाज़ार नीति अपनाई है . ये सारा काम एक सोची -समझी चाल के तहत किया जा रहा है . ऐसा गरीबदास को लगता है .
उसका सोच है कि अब शहर के प्रमुख स्थानों पर ” नेकी की दीवारें ” बनवा दी गईं हैं. जहाँ लोग गरीबों के लिए अपने बिना फटे, पुराने कपडे टांग सकें . इसके पीछे षड्यंत्र यही है कि सभी गरीब अब फटे कपडे नहीं पहनें ताकि धनाढ्य वर्ग के बच्चों की तरह दिखाई न पड़ें . अब ग़रीबों की पहचान भी बदल रही है . उनसे फटे-पुराने कपडे नई मार्केटिंग पालिसी के तहत छीन कर, “ नेकी की दीवारों” के जरिए नए से दिखने वाले पुराने कपडे दिए जा रहे हैं . इसका उद्देश्य यही है कि वे गरीब ही दिखें . अब बाज़ार में एक नया मुहावरा बन गया है – जाकी पेंट न फटी -फटाई , वो क्या जाने फैशन भाई !!
प्रभात गोस्वामी की फेसबुक वाल से साभार
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