ईको-सिस्टम संतुलित रखने का संदेश देती है *जैन मुनियों की मयूर पिच्छीका

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*-सुरेन्द्र दुबे*

*जबलपुर/ मध्यप्रदेश।*शायद बहुत कम लोगो को इस बात की जानकारी होगी कि जैन साधुओं की मयूर पिच्छीका वर्तमान-युग की सबसे बड़ी त्रासदी पर्यावरण-प्रदूषण व पारिस्थितक-तंत्र को हो रहे नुकसान से बचाव के लिए ईको सिस्टम को संतुलित रखने का संदेश देती है ये पिच्छीकाएँ सिखा रही है कि प्रकृति का हरेक जीव आवश्यक है, सूक्ष्म से लेकर बड़े तक यदि एक भी लुप्त हो जाए तो धरती का, ऋत का सिस्टम गडबडा जाएगा, जिससे मौसम का चक्र बिगड़ जाएगा।
मयूर यानी मोर और पिच्छी यानी पंख। इस तरह मयूर-पिच्छी का अर्थ होता है-मोर के पंखों से बनी पिच्छिका। दरअसल, मोर पंख सकारात्मकता का प्रतीक है, जिसका शरीर व स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। इसलिए मोरपंखों को छोटे बच्चों के सिर पर लगाने या उनके बिस्तर के नीचे रखने की मान्यता पुरातन-काल से चली आ रही है। द्वापर के कान्हा भी इसीलिए मोरमुकुट से सुशोभित हुए। वस्तुत: मोर ही अकेला एक ऐसा प्राणी है, जो ब्रह्मचर्य को धारण करता है। जब मोर प्रसन्न् होता है तो वह अपने पंखों को फैलाकर नाचता है, और जब नाचते-नाचते मदमस्त हो जाता है, तो उसकी आँखों से आँसू गिरते हैं, और मोरनी इन आँसू को पीती है, तो इससे ही गर्भ-धारण करती है। मोर में कही भी वासना का लेश भी नही है, और जिसके जीवन में वासना नहीं, भगवान उसे अपने शीश पर धारण कर लेते हैं।दरअसल शहर में गजरथ महोत्सव चल रहा है, जिसमें संत शिरोमणि दिगम्बराचार्य श्री विद्यासागर महाराज के शिष्य मुनिश्री योगसागर महाराज का ससंघ सानिध्य मिल रहा है,
*आंख में भुनकुटी या तिनका चला जाए तो आसानी से निकल जाता है-* श्री वर्णी दिगम्बर जैन गुरुकुल के ब्रह्मचारी त्रिलोक भैया ने विशेष चर्चा के दौरान बताया कि मयूर पिच्छी अहिंसा-करुणा-मुदिता और मैत्री की प्रतीक है, वह जीवरक्षा के साथ-साथ शरीर व स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभदायक है। ऐसा इसलिए क्योंकि मोर के पंख में अत्यधिक सुकोमलता-लोचकता होती है, जिसके कारण यदि आंख के भीतर भुनकुटी या बारीक तिनका चला जाए तो वह आराम से निकल आता है, और भुनकुटी सलामत रहती है, जिससे जीवहिंसा नहीं होती। इसके अलावा अस्वेदता के गुण के कारण मोरपंख पसीना ग्रहण नहीं करता बल्कि उसे शरीर पर फैला देता है, जिससे कुछ देर बाद पसीना सूख जाता है और शारीरिक-स्वास्थ्य बना रहता है।
अरजगता के गुण के कारण मोरपंख धूल के ऊपर और भीतर के स्थूल व सूक्षम जीवों को भी आराम से बिना नुकसान पहुंचाए अलग कर देता है। इसलिए जैन मुनियों की मयूर पिच्छीका को साफ-सफाई का साधन झाडू समझने की भूल कतई न की जाए। गहरे अर्थ में यह आशीर्वाद देने का मृदुतापूर्ण स्प्रिचुअल एक्यूपमेंट है। यह जीवों की संयमपूर्वक रक्षा करने का उपाय है, जिससे मिट्टी में छिपे सूक्ष्मतर जीवों की भी रक्षा संभव होती है। ऐसा इसलिए क्योंकि अरजगता यानी चिपकाने की प्रवृत्ति न होने के कारण मयूर पिच्छीका सिर्फ अलग करती है।
ढ़ाई हजार वर्ष पूर्व हुए जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर महावीर स्वामी के बाद जैन मुनि जो मयूर पिच्छीका रखते थे, वह लंबे समय तक 1000 मोरपंखों से निर्मित हुआ करती थी। कालांतर में मोरपंखों की संख्या कम करते-करते 900 से 500 तक पहुंच गई। आजकल कोई-कोई मुनिश्री 800 तो कोई-कोई 600-700 तक मोरपंखों की मयूर पिच्छीका रखते हैं। क्षुल्लक 550 व ऐलक 500 मोरपंखों की मयूर पिच्छीका रखने लगे हैं। चाहे मोरपंखों की संख्या कितनी भी क्यों न हो किन्तु मयूर पिच्छीका इतनी सुंदरता से निर्मित की जाती है कि वह फूली हुई, नजर आती है। फिर भी लघुता, हल्कापन उसका वैशिष्ठ्य होता है।
* प्राचीन काल में जैन मुनि अपनी मयूर पिच्छीका स्वयं बनाते थे। इसके लिए वे मोर के शरीर से नैसर्गिक रूप से अलग होने वाले पंखों को सावधानी से एकत्र करते थे। बाद में श्रावक श्रद्धावश अपने गुरूवर के लिए मयूर पिच्छीका बनाकर भेंट करने लगे। दरसअल, मोर ऐसा परिंदा है, असाढ़ मास में जिसके शरीर से पंख अपने आप गिरने लगते हैं। इसके अलावा शेष पंखों को वह स्वयं पैरों में असहनीय पीड़ा के अलावा मौसम के कारण होने वाली प्रसन्न्ता की स्थिति में मनमोहक ‘मयूर-नृत्य करके अलग करने लगता है। ऐसा इसलिए क्योंकि वह शरीर का वजन कम करना चाहता है। कार्तिक मास तक मोर का पूरा शरीर पंख विहीन हो जाता है। भील-कोल और किरात उन पंखों को एकत्र करके गड्डियां बनाते हैं। जैन मुनिश्री उनके पंखों का पूछताछ व परीक्षण करने के बाद मयूर पिच्छीका बनाने के लिए क्रय करते हैं। दिगम्बर साधु सिर्फ अहिसंक तरीके से एकत्र मयूर पंख ही स्वीकार करते हैं, क्योंकि अहिंसा परमोधर्म जैन धर्म का मूल सिद्यांत है।
दिगंबर साधु की पहचान मोर पंख की पिच्छी है। मयूर पिच्छीका जीवों के प्रति दया-करुणा का उपकरण ही नहीं बल्कि धर्म की ध्वजा भी है। मयूर पिच्छी जिन-शासन की पहचान है, जैन साधु की आन-बान और मोक्ष-मार्ग की शान है। नियम का पालन करने वाले किसी श्रावक को संत की पिच्छी प्राप्त होना उसके व उसके परिवार के लिए अत्यंत सौभाग्य की बात होती है। दीक्षा के समय दिगम्बराचार्य संयम के उपकरण रूप मयूर-पिच्छीका को जीव-दया पालन के लिए शिष्यों को देते हैं। इसमें पाँच गुण होते हैं-धूलि को ग्रहण नहीं करना, पसीने से मलिन नहीं होना, मृदुता, सुकुमारता और लघुता।
( *लेखक जर्नलिस्ट, ऑथर, मोटिवेटर और सोशल वर्कर हैं*)