ठंड रानी ऐसे पलटी जैसे बिदा लेती दुल्हन….

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ज़हीर अंसारी

इस बार की ठंड गजब ही ढा रही है। अपनी तय उम्र से ज़्यादा वक़्त तक ऐसे धमाल मचा रही है जैसे बाबुल के आँगन में बिटिया। पहले के सालों में ठंड रानी आती थी और कुछ दिनों ठहर कर बिदा हो जाती थीं। गर्म कपड़े के कारोबार अगरबत्ती लगाकर-लगाकर ठहरने की मिन्नते करते थे। रुक जा ठंड रानी मेरा माल बिक जाए तब तू वापस जाना। मगर ठंड रानी ऐसे भागती थीं जैसे फ़्लाइट टेक ओफ़्फ़ होने वाली हो। बीते सालों में इनके रहते आम जनमानस को कुछ ज़्यादा परेशानी न होती थी मगर इस बार ठंड रानी तो क़हर सा बरपा रहीं हैं। बीते दो-ढाई महीने में इन महारानी ने इतना कोल्ड फैलाया कि सैकड़ों बुज़ुर्गवार सहित कई जवान वक़्त से पहले इस दुनिया-ए-फ़ानी से रुख़सत हो गए। गर्म कपड़ों के कारोबारियों का बचा-खुचा माल तक ठिकाने लग गया।

शीत ऋतु से हलाकान लोगों ने मकर संक्रान्ति के दिन आटे, सेव और तिल के लड्डू भेंटकर ठंड रानी को बिदाई देने की कोशिश की फिर भी वो मानी। सोचा गया कि बसंत पंचमी तक हौले से चली जाएगी मगर हुआ इसके उलट। बसंत पंचमी के ही दिन ठंड रानी चिल्ड आइस से लेकर फिर से धमक पड़ी।

पिछले सप्ताह यह ज़रूर लगा कि ठंड रानी की छुट्टियाँ ख़त्म हो गई और वो वापस लौट गईं। लोग-बाग़ ने राहत की सांसें ली। बुज़ुर्गों को भी चैन आया। युवा वर्ग तो शर्ट की दो बटन खोलकर और हाफ़ टी शर्ट पहनकर फिरना भी शुरू कर दिया था। मानों उनकी चपटी छाती और मरियल बल्ले देखने लड़कियों की क़तार लगी हो। शायद यह सब ठंड रानी को पसंद नहीं आया और ऐसे लौट आईं जैसे बाबुल के आँगन से बिटिया दुल्हन के रूप में बिदा होकर कुछ क़दम आगे जाती है और फिर पलटकर अपने बाबुल से चिपट जाती है। ठंड रानी का हाल-फ़िलहाल का रूख देखकर तो यही लग रहा है कि ये हफ़्ता भर क़रीब और ठहरने के मूड में है।