प्यार हुआ हताश और निराश….

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ज़हीर अंसारी
प्यार की दास्तान भी अजीब है। आज के दौर में प्यार न हंस सकता है न रो सकता है, बस बेचारा क़ुढा जा रहा है। प्यार अब यह सोचने लगा है कि मेरा ये नाम किसने और क्यों रखा? मेरे नाम की वजह से कितनों को बदनामी और बेज्जती उठानी पड़ती हैं। अब हालात ये हैं कि मेरे नाम पर धड़ाधड़ जानें ली जाने लगी हैं। कभी मेरे नाम की मिसाल दी जाती रही। लैला मजनूँ, शिरिं-फारहाद, रोमियो-जूलिएट और हीर-रांझा के भावनात्मक लगाव को बेमिसाल प्यार का नाम दिया जाता था तो वहीं राधा और मीरा के आध्यात्मिक और भक्ति भाव को अद्भुत प्यार कहा गया। हज़ारों-लाखों स्तुतियाँ दुनिया भर में मेरे नाम पर और नाम से लिखीं गईं। अनेक स्थानों पर स्मारक बनाए गए। जहाँ आज भी मुझे समझने और महसूस करने वाले आते हैं।

क्या मैं वही प्यार हूँ, या सिर्फ़ मेरा नाम मात्र रह गया है। क्या मेरे ऊपर रंग-रूप, ऊँच-नीच, अमीर-ग़रीब और जात-सम्प्रदाय का मुलम्मा चढ़ा दिया गया है ? शायद इसलिए मेरा नाम आते ही नफ़रत उछलकर मेरे सामने खड़ा हो जाता है। नफ़रत मुझे ढकेल कर पीछे कर देता है और सामने आकर भिड़ जाता है। क्या प्यार की अब कोई हैसियत नहीं बची। या मेरी आत्मा पर नफ़रत की परत चढ़ाई जा रही है। मैं कुछ समझ नहीं पा रहा।

दुनिया के सभी मज़हबों ने मुझे आगे करके परमात्मा से जुड़ने का रास्ता प्रशस्त किया। कहा गया कि मैं एक ऐसा माध्यम हूँ जो अमन-चैन ला सकता हूँ, सीमाओं को तोड़ सकता हूँ, सारे भेद दूर कर सकता हूँ। अब ये सारी बातें मुझे बेमानी लगने लगी हैं। मुझे दिखावटी रूप से आगे करके नफ़रत के बीज बोए जा रहे हैं।

मैं प्यार हूँ, क़ुदरत ने मुझे ऐसा आशीर्वाद दिया है किसी भी माँ के गर्भ बच्चा आते ही मैं ख़ुद-बख़ुद पैदा हो जाता हूँ। मैं हर जीव के साथ रहता हूँ। सब मेरी ही वजह से आपस में खेलते-कूदते हैं, मेल-जोल रखते हैं। मूक-अमूक कोई भी मुझसे अछूता नहीं है। जीवों-जानवरों के बीच मैं आज भी पहले जैसा हूँ लेकिन इंसानों के बीच मैं स्वयं को असहज पाता हूँ। इंसान कितना बदल गया है। ज़ुबान पर मुझे रखता है फिर धीरे से छुरी घोंप देता है। वाह री इंसानी फ़ितरत।

लड़का या आदमी मेरे नाम पर किसी से जुड़े तो कोई बात नहीं। यदि लड़की या औरत किसी से बात करे या दोस्ताना ताल्लुक़ रखे तो यह चरित्रहीनता निरूपित कर दी जाती है। जो आगे चलकर झगड़े-झाँसे और क़त्ल की वजह बन जाती है। मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से लड़ाई-वडाई हो, मौतें हों। आजकल मेरी आड़ में हो रही हत्याओं से मैं बेहद हताश और निराश हो गया हूँ।

मैं ऊब गया हूँ अपने नाम से। सोचता हूँ नाम बदल लूँ, फिर सोचता हूँ इससे भी कुछ न होगा, बदलना तो इंसानों को पड़ेगा। परमात्मा ने जितनी निर्मल आत्मा बनाई है उसी के अनुरूप भाव बनाने होंगे तब कहीं जाकर इंसान और इंसान के बीच मेरा नाम सार्थक होगा।