कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए

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जयराम शुक्ल

चपरासी और स्वीपर की नौकरी के लिए इंजीनियर,एमबीए,पीएचडी होल्डर्स की लंबी लाइनें अब नहीं चौकातीं। न ही यह सुनकर कोई अचरज होता कि कलेक्टर बनने की तैयारी करने वाले युवा पटवारी की परीक्षा में बैठतें हैं।

अपने देश की वोट कबाडू राजनीति, दिशाहीन शिक्षा,अधकचरी अर्थव्यवस्था के चलते युवाओं की अब यही नियति है। मैं सिर्फ एक मशवरा दे सकता हूँ वो यह कि युवा अपने देश की सरकारों से कोई उम्मीद न पालें। सरकार चाहे रामलाल की हो या भोगीलाल की उनके साथ बर्ताव और छलावे के मामले में सभी एक सी हैं।

मैं सतहत्तर के चुनाव में बालिग हुआ। तब से नेताओं के भाषण,राजनीतिक दलों के घोषणापत्र और फिर सत्ता में आने के बाद अपने वायदों से पल्टी मारते देखते आ रहा हूँ।

राजनीति को लेकर एक पक्का यकीन यह बना है कि यह मदारियों की बाजीगरी से ज्यादा कुछ नहीं। नागपंचमी में मदारियों के मजमें और बाद में उनकी हकीकत जानने की जिनने भी कोशिश की होगी वह अपने देश की राजनीति और नेताओं को भलीभाँति समझ सकता है।

एक मदारी उत्तर से आता है दूसरा दक्षिण से, फिर मजमें में बदी-बदा होता है। लच्छेदार संवादों और मंत्रों के साथ एक दूसरे पर आक्रमण करते हैं। फिर जिसको हारना होता है वो हारते हैं जिसको जीतना होता है जीतते हैं। पर असली काम खीसे से रूपिया निकलवाना, ताबीज बेचना होता है जिसमें वे सफल हो जाते हैं।

गाँव से बाहर निकलते ही दोनों में बराबरी की बाँट और मिलापटी हो जाती है। दोनों फिर किसी गाँव में ऐसा ही मजमा लगाकर दर्शकों को ठगते हुए निकल जाते हैं। ये सिलसिला वैसे ही चलता चला जाता है जैसे कि हर आमचुनावों में किसी का जीतना या हारना।

दरअसल सत्ता का सिंहासन एक तरह से बरमबाबा के चौरा की तरह होता है कि उसमें जो कोई बैठता है उसके अभुआने का अंदाज एक सा होता है।

सतहत्तर में सत्ता पलट के पीछे छात्र और युवाशक्ति थी। इंदिरा गांधी के निरंकुश शासन के खिलाफ जेपी के आह्वान पर यही लोग पहले कूदे। उस चुनाव का नारा मुझे आज भी याद है-हर खेत को पानी। हर हाथ को काम।

सत्ता में आने के बाद अपने हिस्से के सुख और रसूख के लिए लड़ते हुए सरकार को शहीद कर दिया। किसान और युवा ठगा रह गया। यही नारा 89 में जनमोर्चा ने दोहराया अपने प्रदेश में भाजपा की टैग लाइन यही थी। हुआ फिर यह कि सत्ता के एक साझीदार ने मंडल उठाया तो एक ने कमंडल फिर जो हुआ मदारियों की बाजीगरी वाले वृतांत से जोड़कर देखिए तो साफ हो जाएगा। युवा और किसान फिर ठगा रह गया।

91 में काँग्रेस की सत्ता लौटी तो उसने अर्थव्यवस्था का गोबराइजेशन(ग्लोबलाइजेशन) शुरू किया। देश के खिड़की, दरवाजे दुनिया के लिए खोल दिए। भाजपा इस बदलाव के पक्ष में थी और मुदित भी क्योंकि उसे अर्थव्यवस्था का पूँजीवादी माँडल शुरू से ही सुहाता रहा।

लोगों को याद होगा कि विपक्ष में रहते हुए लालकृष्ण आडवानी व मुरलीमनोहर जोशी के अमेरिका व यूरोपीय यूनियन के देशों में दौरे हुए थे दौरे का सबब ही यह था कि हम देश में विपक्ष की भूमिका में हैं इसलिये यह बताने आए हैं कि आप लोग भ्रम में न रहें अर्थव्यवस्था के इस बदलाव को लेकर हम सरकार के साथ मजबूती से खड़े हैं।

यह बात जार्ज फर्नाडीस जो तबतक भाजपा के बगलगीर नहीं बन पाए थे ने मुझे दिए गए एक लंबे इंटरव्यू में कही थी। उस इंटरव्यू को साभार के साथ देशभर के कई अखबारों ने छापा था। तब जार्ज ने संकेतों में यह भी कहा था कि अयोध्या के विवादित ढ़ाँचे का ढहाया जाना एक तरह से नरसिंहराव सरकार का भाजपा के लिए शुकराना था।

राजनीति के रंगमंच में दर्शक जो देखते हैं दरअसल वह आभासी होता है। असली खेल तो परदे के पीछे चलता है। वो पता नहीं कब से चलता चला आ रहा है। एफडीआई,जीएसटी,डिसइनवेस्टमेंट की जो पहल मनमोहनजी की यूपीए ने शुरू की थी आज वह दस गुने रफ्तार से आगे बढ़ रही है उस कार्यकाल में कोई एनडीए की कलाबाजियों को याद करे तो मदारियों की बाजीगरी का वृतांत जीवंत हो उठेगा।

आशय यह कि सभी ने युवाओं और किसानों को योजनाबद्ध ढंग से ठगा है। सभी के चुनावी नारों और वायदों में यही दो प्राणीवर्ग मुख्यरूप से रहते हैं, सत्ताओं की अलटापलटी के बाद सबसे ज्यादा यही मजाक बनते हैं।

लोकसभा के पिछले चुनाव में भी युवाओं को रोजगार बड़ा वायदा था। सतहत्तर की भाँति इस परिवर्तन में भी छात्रों व युवाओं की बड़ी भूमिका थी लेकिन एक बार वह फिर ठगा गया।

रोजगार से जुड़ा एक सांख्यिकीय विश्लेषण पढने को मिला। विस्तार में न जाते हुए मोटामोटी उसका निष्कर्ष यह है कि 2006 से 2012 के बीच संगठित क्षेत्र में लगभग एक लाख से ज्यादा नौकरियाँ घटी हैं।

2012 से 2017 के आँकड़े इस भय से जारी नहीं किए जा रहे हैं क्योंकि नौकरियों के अवसर में कटौती के भयावह आँकड़े सामने आ जाएंगे। सर्विस सेक्टर को निजी क्षेत्र में सौंपने की दिशा में सरकार तेजी से बढ़ रही है।

केंद्र सरकार में तीन से चार लाख रिक्तियां हैं पर भर्ती नहीं की जा रही है। आउटसोर्सिंग और संविदा के आधार पर नौकरियाँ दी जा रही हैं जो कि एक तरह से युवाओं के शोषण का पुख्ता चक्रव्यूह है। इसकी देखादेखी राज्य सरकारें भी चल रही हैं।

अर्थव्यवस्था को हाँकने वाली जो अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियाँ हैं उन्हीं के निर्देश में सबकुछ आगे बढ़ रहा है। सब्सिडी युग उन्हीं ने खत्म करवाया और अब सरकारी नौकरियों पर उन्हीं के इशारे मुश्के कसी जा रही हैं। अमेरिकी में रक्षा,न्याय,विदेश,आंतरिक प्रशासन जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण विभागों को छोड़कर सबकुछ निजी क्षेत्र के हवालें है। भारत भी उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है।

अमेरिका अब हमारा रोल माँडल है। युवा इस भुलावे में न रहें कि नौकरियों की बरसात होने वाली है। ये आरक्षण और धर्म-संप्रदाय से जुड़े जो करतब और शिगूफे हैं यह ध्यान बँटाने के लिए हैं कि कहीं सत्ता के चौथे साल संगठित होकर युवा नौकरी देने का हिसाब न माँगने लगे।

हार्दिक पटेल,जिग्नेश,परेश ये सबके सब जाने-अनजाने मूलमुद्दों से भटकाने में ही लगे हैं। मेरे भाई जब नौकरी ही नहीं रह जाएंगी तो आरक्षण किस बात का। सभी नौकरियों में शतप्रतिशत भी आरक्षण दे दिया जाए तो भी आरक्षित वर्ग को दस प्रतिशत से ज्यादा नौकरी मिलने से रही।

युवाओं को सभी भुलावे-छलावे में रखना चाहता है रामलाल की सरकार भी और भोगीलाल की पार्टी भी। आज फिर एक जेपी की जरूरत है जो युवा-छात्रशक्ति की पीड़ा को समझे और इस मुश्किल वक्त में उनकी अगुआई करे।