गोदी मीडिया का बदला रूख……

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ज़हीर अंसारी

लोकसभा चुनाव के पहले जो सर्वे मूर्द्धन्य पत्रकार अपने-अपने चैनल्स पर बता रहे हैं उसके मुताबिक़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुर्सी खसकती नज़र आ रही है। चैनल्स द्वारा प्रस्तुत सर्वे रिपोर्ट में सारे गणित लगाकर यह बताया गया कि मोदी के लिए अगली बार पनघट की डगर मुश्किल है। सर्वे करने वाले ये वही चैनल्स हैं जिन्हें गोदी मीडिया के नाम से जाना जाता था। इन गोदी मीडिया वालों का अचानक पलटना आश्चर्य पैदा करने वाला है। चुनाव के तीन माह पूर्व गोदी मीडिया की आस्था और निष्ठा में बदलाव के मायने समझने की ज़रूरत है। ये वही मीडिया वाले हैं जो मोदी की छींक की बढ़ाई करते नहीं थकते थे। देश-विदेश की सभाओं/मिटिंग्स को कई दिनों तक तड़का लगा-लगाकर दर्शकों के बीच परस्ते थे। आज यही गोदी मीडिया के लोग ‘अगली बार फिर मोदी सरकार’ पर शंका-कुशंका फैला रहे हैं।

क्या मोदी जी वाक़ई इतने संकटग्रस्त हैं कि अगली बार सत्ता में वापस आना दूभर होगा। इस बात पर ग़ौर करने की ज़रूरत है। हालाँकि इस विषय पर बड़े-बड़े सर्वेयर और राजनैतिक विशेषज्ञ ग़ौर फ़रमाते आ रहे हैं। सर्वे और विशेषज्ञों के ग़ौर के बाद मोटे तौर पर यह निष्कर्ष तो निकाला ही जा सकता है कि मोदी के लिए सत्ता वापसी वाली डगर मुश्किल सी प्रतीत हो रही है।

पिछले चुनाव में मोदी को मोदी बनाने में कई कारकों ने अहम रोल अदा किया था। इनमें संघ तो प्रमुख था ही, अन्ना हज़ारे, बाबा रामदेव और अरविंद केजरीवाल के भरोसे खड़ी यूथ ब्रिगेड का महती भूमिका थी, और इन सब के पीछे सबसे बड़ी भूमिका देश की मीडिया ने निभाई थी। जिसकी वजह से बच्चा-बच्चा मोदी-मोदी की जयकारे करता था। अब वैसा वातावरण किंचिंत मात्र दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है। पिछले चुनाव को भाजपा के पक्ष में टर्न करने वाले अन्ना हज़ारे मुँह पर पट्टी लगाए रालेगन सिद्धी में बैठे हैं तो बाबा रामदेव व्यापारिक और राजनैतिक कारणों से तटस्थ बने हुए हैं, तो अरविंद केजरीवाल अपनी सरकार का गदा लेकर मोदी सरकार के ख़िलाफ़ ही भांज रहे हैं।

इन पौने पाँच सालों में मोदी सरकार ने इस देश को प्रयोगशाला मानकर हर वो प्रयोग कर डाला जिसकी कल्पना कोई नहीं कर सकता था, लेकिन एक भी प्रयोग ऐसा सफल नहीं हुआ कि मोदी सरकार दोबारा बड़ी आसानी से बन जाए। हर प्रयोग की बढ़ाई और स्तुतिगान करने वाली मीडिया ही आज बता रही है कि भाजपा के लिए 2019 की डगर आसान नहीं है।

ख़ैर मीडिया का सर्वे अंतिम सत्य नहीं होता। तीन महीने में बहुत से समीकरण बदलेंगे-बिगड़ेंगे और नए बनेंगे तब तक इंतज़ार करना चाहिए।