जी हाँ, ये वही पुलिस है….

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ज़हीर अंसारी

जबलपुर पुलिस की कड़ाई देखकर कोई यह नहीं कह सकता कि यह वही पुलिस है जो नई सरकार बनने के पहले थी। पुरानी सरकार के दौरान पुलिस पूरी तरह उजड्ड सी थी। जिले में खुले आम जुआ-सट्टा, स्मैक, मादक पदार्थ और कच्ची दारू का धंधा चल रहा था, तब यही पुलिस मौन हुआ करती थी। पुलिस के मौन के पीछे अवैध कमाई थी या राजनीतिक संरक्षण यह राज तो पुलिस ही जाने। पुलिस अवैध कारोबार की छूट देकर तत्कालीन नेताओं की चाकरी करती थी या फिर अपनी कमाई का हिस्सा उन तक पहुँचाती थी, यह भी वही जाने।

जनता तो सिर्फ़ यही जानती है कि सरकार बदलते ही पुलिसिंग में अचानक काफ़ी बदलाव आ गया। पहले समाज और क़ानून विरोधी धंधों की शिकायतों के बाद भी पुलिस हाथ पर हाथ धरे जुगाली करती थी, अब हर दिन खोज-खोज कर अवैध धंधा करने वालों को पकड़ रही है। हर दिन जुआ-सट्टा वाले पकड़े जा रहे हैं। हर दिन अवैध शराब या स्मैक पकड़ी जा रही। कमाल है भाई। पुलिस के न आला अफ़सर बदले, न निचले स्टाफ़ का ट्रांसफ़र हुआ फिर भी पुलिस कार्यप्रणाली में सख़्ती आ गई। शायद यह नई सरकार की बनिस्बत हुआ।

प्रदेश के नए मुखिया कमलनाथ ने सत्ता संभालते ही हिदायत दे दी थी कि मादक पदार्थों, अवैध शराब की बिक्री और जुआ-सट्टा पर लगाम कसी जाए। कमलनाथ की हिदायत को अमलीजामा पहनाने के लिए उनके क़बीने के दो मंत्री लखन घनघोरिया और तरुण भनोत ने जबलपुर जिले की पहली ही प्रशासनिक बैठक में एक स्वर से अधिकारियों को निर्देश दिया थी कि स्मैक सहित अन्य मादक पदार्थों, कच्ची शराब के ठिकानों, जुआ-सट्टा में लिप्त तत्वों पर कड़ाई से कार्यवाही की जाए। इसका नतीजा यह हुआ पुलिस चौराहे-तिराहे में खड़े होकर ‘टेरर’ फैलाने की बजाय अपने मूल कार्य अपराध की रोकथाम में जुट गई है और ताबड़तोड़ करवाई करने लगी, अपराध और अपराधियों पर नकेल कसने लगी। यहाँ तक कि पुलिस अब उन पुलिस कर्मियों को चाबुक चिपकाने लगी जिनकी अपराधियों से साँठगाँठ है। कल ही पुलिस कप्तान ने 24 पुलिस कर्मियों को इसलिए सस्पेंड कर दिया कि ये सभी एक सटोरिए से हफ़्ताबंदी लिया करते थे। एसपी के इस एक्शन की सराहना करते हुए सीएम हाउस ने ट्वीट किया है कि अपराध के ख़िलाफ़ ‘ज़ीरो टालरेंस’ दिखने लगा है।

पुलिस जिस तीव्रता से अपराध रोकने और अपराधियों को पकड़ने में जुटी है उससे तो यही लगता है पुलिस पर वैसा राजनैतिक दबाव नहीं है जैसे पहले हुआ करता था। बहरहाल पुलिस की वर्तमान वर्किंग देखकर यह तो कहा ही जा सकता है कि ‘हाँ यह वही पुलिस’। फ़र्क़ राजनेताओं की सोच में आया है। सोच बदली तो पुलिस का रवैया भी बदल गया।